पर्यावरण दिवस : मनुष्य एक वायरस है इसे खत्म करो

मनुष्य इस धरती का सबसे क्रूर और अनुपयोगी जानवर है। इसका इस धरती पर से अस्तित्व मिट जाना ही धरती के लिए अपनी जिंदगी बचाने जैसा होगा। धरती का हर पेड़ यही चाहता होगा, हर पक्षी यही चाहता होगा और हर पशु भी यही प्रार्थना करता होगा। 
 
मैं चाहता हूं कि धरती पर से मनुष्य का अस्तित्व मिट जाना चाहिए। हम एक नए मनुष्‍य और संस्कृति का निर्माण करेंगे। यह सुनकर कई संन्यासी हैरान रह गए थे। कुछ इसी तरह के वाक्य ओशो रजनीश ने तब कहे थे जबकि उन्हें गले से लेकर पैरों तक जंजीरों से जकड़कर जेल में जहर देने के लिए ले जाया जा रहा था।
 
इस धरती पर कोरोना वायरस से हजार गुना खतरनाक है 'मनुष्य' नाम का वायरस। सचमुच धरती के लिए तो यह वायरस ही है जिसे वह लाखों साल से झेल रही है और इससे मुक्त होने का उपाय खोज रही है। लॉकडाउन ने यह भलिभांति सिद्ध कर दिया है कि सचमुच ही धरती इस वायरस से ग्रस्त थी। जब से लॉकडाउन लगा है तब से लेकर अनलॉक वन तक धरती का पर्यावरण सुधर गया है। औद्योगीकरण के बाद पहली बार धरती खुद को इस वायरस से मुक्त महसूस कर रही थी लेकिन अब यह वायरस फिर से घरों से बाहर निकलने लगा है।
 
 
यदि गौर से देखा जाए तो धरती के लिए मनुष्य सबसे अनुपयोगी और खतरनाक जानवर है। यह धरती को तेजी से खा रहा है, कमजोर कर रहा है और इसी के कारण धरती के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इस वायरस ने धरती को गहराई तक छलनी कर दिया है, लाखों पहाड़ों को काट दिया है, जंगलों को टिड्डियों के दलों की तरह चट कर गया है और नदियों को पी गया है। अब देखना होगा कि धरती इस वायरस से कैसे मुक्त होती है या कि यह वायरस धरती को निगल जाएगा।

जो मनुष्‍य गर्भवती हथिनी को क्रूर तरीके से मार रहा है, हर वर्ष लाखों पेड़, सैंकड़ों पहाड़ों को काटकर अपने लिए सुख सुविधा जुटा रहा है। सर्प, कीड़े, मकोड़ों और चमगादड़ों को खा रहा है तो सोचिये क्या आप इन्हें पिशाच नहीं कहेंगे? यदि आप एक संवेदनशील मनुष्य हैं तो निश्‍चित ही पर्यावरण के प्रति सोचेंगे, लेकिन नहीं है तो आप एक वायरस हैं।

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