मणिपुर की स्तब्ध करने वाली तस्वीरों को कैसे देखें

मणिपुर से महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने, उन्हें अपमानित करने के वीडियो ने संपूर्ण देश को स्तब्ध किया है। हिंसा किसी प्रकार की हो, महिलाओं और बच्चों को ज्यादा त्रासदी झेलनी पड़ती है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वीडियो में जो लोग भी जघन्य अपराध करते दिख रहे हैं उनको उपयुक्त सजा मिलेगी। बावजूद इस घटना की चर्चा करते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मणिपुर में कई तरह की हिंसा जारी थी। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह का यह वक्तव्य वायरल है कि आपको एक घटना की चिंता है न जाने कितनी घटनाएं ऐसी हुई है।

यही सच है। यह घटना कूकी महिलाओं से संबंधित है। हमें पता है कि मैतेयी समुदाय की कितनी महिलाओं के साथ क्या-क्या हुआ होगा? जितनी संख्या में घर बार छोड़कर लोगों को विस्थापित होना पड़ा उसमें यह कल्पना आसानी से की जा सकती है अनेक महिलाओं के साथ भयानक दुर्व्यवहार हुए होंगे। जब तक हिंसा के पीछे के सच को और जिस तरह वो घटी उस तरह नहीं देखा जाएगा तो इसका निदान ढूंढना मुश्किल होगा। यह वीडियो मैतेई और कुकी समुदायों के बीच झड़प के एक दिन बाद यानी 4 मई की है। विचार करने की बात है कि यह वीडियो अब क्यों जारी हुआ? 
 
इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने स्वयं द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन और संसद सत्र आरंभ होने के एक दिन पूर्व वीडियो जारी किया। जाहिर है, समय का ध्यान रख यह वीडियो जारी हुआ। इससे देश और दुनिया भर में यह संदेश देने की कोशिश हुई कि मैतेयी हिन्दू उत्पीड़क हैं और‌ पीड़ित समुदाय केवल कूकी हैं, जिनमें ज्यादातर ईसाई हैं। यह सच नहीं है कि पुलिस ने पहले इसका संज्ञान नहीं लिया था। 4 मई को घटना हुई थी और मामले में 18 मई को कांगपोकपी जिले में जीरो एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इसके बाद मामला संबंधित पुलिस स्टेशन को भेज दिया गया। जब भी कहीं जातीय, नस्ली, सांप्रदायिक अलगाववादी हिंसा होती है तो सुरक्षाबलों व प्रशासन की पहली भूमिका उसे शांत करने की रहती है।

आप इंडीजीनस ट्राईबल फोरम के विरोध प्रदर्शन को देखिए तो सभी काला ड्रेस पहने हुए हैं। इतनी संख्या में काला ड्रेस मुफ्त नहीं मिल सकता। साफ है कि विरोध के पीछे ऐसी शक्तियां हैं जो कुछ अलग उद्देश्य पाना चाहती हैं। वस्तुतः मणिपुर की हिंसा का यह ऐसा पहलू है जिसको समझने की कोशिश करनी होगी। अभी तक के आंकड़ों के अनुसार मणिपुर में कुल 6000 हिंसा की घटनाएं हुईं, 5000 से ज्यादा प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है, 6700 से ज्यादा लोग गिरफ्तार हैं, 70 हजार के आसपास विस्थापित हैं, 10 हजार ने मणिपुर छोड़ दिया तथा 160 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। अनेक मारे गए लोगों के शव मोर्चुअरी में पड़े हैं जिन्हें ले जाने वाला कोई नहीं। उन हालातों में न जाने कितने भयावह और जघन्य अपराध हुए होंगे इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। उसमें एक वीडियो समय का ध्यान रखते हुए जारी करने का उद्देश्य क्या हो सकता है?

आने वाले समय में ऐसी और घटनाओं के भी विवरण आएंगे जो हमें आपको बार-बार अंदर से हिला सकते हैं। 4 जून को ही भीड़ ने एक एंबुलेंस को रास्ते में रोक उसमें आग लगा दी। एंबुलेंस में सवार 8 साल के बच्चे, उसकी मां और एक अन्य रिश्तेदार की मौत हो गई। मृतका मां मैतेई समुदाय से आती थीं और उनकी शादी एक कुकी से हुई थी। इस तरह की हिंसा को किस श्रेणी में रखेंगे? 
 
वीडियो जारी करने वाले विश्व भर को संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि मैतेयी हिंदुओं ने कूकी ईसाइयों के साथ इसी तरह की बर्बरता की। साफ है कि वह केंद्र एवं प्रदेश दोनों सरकारों को विश्व भर में अल्पसंख्यकों का खलनायक तो साबित कर ही रहे हैं ऐसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं ताकि वहां हिंसा कायम रहे और वे अपना लक्ष्य पा सके। 
 
इस संघर्ष को हिंदू बनाम ईसाई संघर्ष कहना गलत होगा। ईसाई संघर्ष होता तो इसमें नगा भी शामिल होते। हां, अलगाववाद और हिंसा के पीछे चर्च अवश्य मुख्य प्रेरक कारक है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद एवं हिंसक आंदोलनों के पीछे चर्च की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और आज भी है। मणिपुर में कूकियों का एक बड़ा समूह म्यान्मार से आया। इन्हें चिन कूकी कहा जाता है। इनके अनेक हथियारबंद समूह खड़े हैं। इनका लक्ष्य बांग्लादेश, म्यानमार और मणिपुर के हिस्से को मिलाकर एक स्वतंत्र देश बनाना है।

मैतेयी मणिपुर तक सीमित है लेकिन कुकी पूरे पूर्वोत्तर में फैले हैं जिनमें गैर ईसाई अब बहुत कम होंगे। 2008 में लगभग सभी कुकी विद्रोही संगठनों के साथ केंद्र सरकार ने सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन या एसओएस समझौता किया जिसका उद्देश्य इनके विरुद्ध सैन्य कार्रवाई रोकना था। कई संगठनों ने वादा नहीं निभाया। अंततः इस वर्ष 10 मार्च को मणिपुर सरकार ने दो संगठनों के साथ समझौता रद्द कर दिया। ये संगठन हैं जोमी रेवुलुशनरी आर्मी यानी जेडआरए और कुकी नेशनल आर्मी यानी केएनए।  बीरेन सिंह सरकार ने इनके विरुद्ध कार्रवाई शुरू की। एरियल सर्वे कराकर अफीम की खेती को नष्ट करना आरंभ हुआ।

मादक औषधियों के व्यापार के लिए कुख्यात म्यानमार, थाईलैंड, बैंकॉक का गोल्डन ट्रायंगल इससे जुड़ा है। दूसरे, जंगलों की भूमि पर इनके अवैध कब्जे को भी मुक्त कराने का अभियान चला। मणिपुर का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ी तथा 10 प्रतिशत मैदानी हैं। मैतेयी मणिपुर की लगभग 53 -54 प्रतिशत आबादी है, जो हिंदू हैं,लेकिन 10प्रतिशत मैदानी क्षेत्रों यानी इंफाल घाटी में रहते हैं। पहाड़ी इलाकों के 33 मान्य जनजातियों में मुख्यतः नंगा और कुकी हैं जिनमें ज्यादातर का ईसाई धर्म में धर्मांतरण हो चुका है। मैतेयी समुदाय 1949 तक आदिवासी माना जाता था।‌ इन्हें सामान्य जाति बना दिया गया। ये सारी सुविधाओं और विशेष अधिकारों से वंचित हो गए। दूसरी ओर पहाड़ी जनजातियों को संविधान से विशेषाधिकार मिले हैं। 

भूमि सुधार कानून के अनुसार कुकी और नगा तथा अन्य जनजातियां मैदानी क्षेत्र में जमीन खरीद सकते हैं लेकिन मैतेयी पहाड़ी क्षेत्र में नहीं खरीद सकते। कूकी और नगा धीरे-धीरे मैदानी इलाकों की जमीन खरीद कर इसमें बस रहे हैं, चर्चों की संख्या बढ़ रही है। परिस्थितियों में मैतेयी समुदाय के भी कुछ लोग ईसाई धर्म कर ग्रहण कर चर्च में जाने लगे हैं। इससे वहां सामाजिक तनाव बढ़ता गया है। वैसे मणिपुर में कूकियों के साथ अन्याय का आरोप लगाने वाले नहीं बताते कि राजनीति में अवश्य मैतेयी समुदाय का वर्चस्व है लेकिन पुलिस और प्रशासन मुख्यतः कूकियों के हाथ में है। घटना के दौरान पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस उप महानिदेशक दोनों कूकी थे। प्रदेश में 21भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी कूकी हैं।

सरकार द्वारा संरक्षित जंगलों और वन अभयारण्य में गैरकानूनी कब्जा करके अफीम की खेती करने के विरुद्ध अभियान जैसे-जैसे बढ़ा अलगाववादी समूहों ने कूकियों को भड़काया कि भाजपा केवल हिंदुओं के हितों के लिए काम कर रही है और तुम्हारी पुश्तैनी जमीन से तुम्हें हटा रहे है। 3 मई को कूकियों की रैली थी और इसी दौरान कांगपोकपी नाम की जगह पर पुलिस से उनका टकराव हुआ। महिलाओं को नग्न कर भीड़ द्वारा उत्पीड़न करने का वीडियो  वहीं के पास का है। टकराव में पांच प्रदर्शनकारियों के साथ पांच पुलिसवाले भी घायल हुए थे। कल्पना की जा सकती थी कि वहां क्या स्थिति रही होगी। 
 
बंद और विरोध प्रदर्शन चुराचंदपुर में हुआ जहां मुख्यतः कूकी और नागा आबादी है लेकिन हिंसा की घटनाएं इंफाल घाटी में हुई।  27-28 अप्रैल तक हिंसा कूकी और पुलिस के बीच थी। इसके बाद यह मैतेयी और कूकी टकराव में बदला। 3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ने यह आरोप लगाते हुए एकता मार्च' निकाला कि सरकार मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने जा रही है। उसके साथ हिंसा शुरू हो गई। महिलाओं का वीडियो ठीक इसके अगले दिन का है। वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए यह अवश्य ध्यान रखिए कि कूकी महिलाएं संघर्ष के अग्रिम मोर्चे पर रखी जाती हैं। इंडियन आर्मी गो बैक की तख्तियां लेकर आंदोलन के अग्रिम पंक्तियों में चलती महिलाओं की तस्वीरें वहां आम हैं।
 
ऐसे मामलों में कानून निष्पक्षता से कार्रवाई करें यह हम सब चाहेंगे। किंतु जितनी बड़ी खाई हो गई है उसको पाटने के लिए कई स्तरों पर लंबे समय तक काम करने की आवश्यकता है। ऐसे संवेदनशील मामले में अत्यंत सधे हुए तरीके से प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने एवं कदम उठाने की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से हमारी राजनीति क्षण भर के लिए भी ठहर कर इस दिशा में सोचने को तैयार नहीं है।
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