महायुद्ध पर कविता: सुलग रहा संसार है

पुष्पा परजिया

बुधवार, 25 मार्च 2026 (16:39 IST)
सुलग रहा संसार क्यों अब 
और छाया हा हकार है
पल में बदलेगी किसकी दुनिया  
इसका ना कोई ऐतबार है 
 
हो रही रक्त रंजित धरा 
आसमां पर धुएं का गुब्बार है 
 
अंत हीन है युद्ध बिगुल ये 
चीर कानों को भरता मन में भय,
अशांति का विश्व में साम्राज्य है 
 
कुछ की ज़िद और कुछ की अकड़न 
कर रही मानवता पर कुठाराघात है 
एक इंसा करें शुरू युद्ध बिगुल पर 
इससे पिसता सब संसार है 
 
दृश्य करून देख देख कर 
मन मेरा करे ये सवाल है 
क्या शांति से निकल नहीं सकता?
किसी भी समस्या का समाधान है 
 
महाभारत होते कान्हा ना रोक पाए 
ऐसा ही लंका युद्ध का भी इतिहास है 
दानव बन जाता जब मानव 
तब तब लिखा गया ऐसा ही इतिहास है 
 
चलो मित्रों परम पिता परमात्मा से करें गुहार हम  
थम जाए ये बर्बादी का आलम   
और हो विश्व में चैन और अमन 
जी सके हर कोई शांति से जो सबका अधिकार है। 

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