'यंग गुजरात' की युवा लेखिका प्रीति 'अज्ञात'

'यंग गुजरात' कार्यक्रम में युवा ‍लेखिका प्रीति 'अज्ञात' मशहूर शायर जावेद अख्तर और पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल को अपनी नवीनतम पुस्तक 'मध्यांतर' भेंट करेंगी। बड़ौदा मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रम में जावेद अख्‍तर 'युवा और साहित्य' विषय पर चर्चा करेंगे। प्रीति लंबे समय से लेखन में संलग्न हैं साथ ही वर्तमान में 'हस्ताक्षर' के नाम से एक वेब पत्रिका का भी संचालन कर रही हैं। 
 
छोटी उम्र में ही कलम थामने वालीं प्रीति तीन राज्यों की संस्कृति को करीब से जानती-समझती हैं। उनका जन्म मध्यप्रदेश के भिंड ‍शहर में हुआ, वहीं उत्तरप्रदेश के आगरा और बनारस से भी उनका करीब का रिश्ता है। पिछले 15 सालों से वे गुजरात के अहमदाबाद में रह रही हैं और अपना रचना संसार रच रही हैं। वे ब्लॉग लिखती हैं साथ सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं। वनस्पति विज्ञान में एमएससी प्रीति को बोनसाई का भी शौक है। विभिन्न राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, वेब पत्रिकाओं, ब्लॉग्स में उनकी कविताएं और आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 
 
गुजरात भूकंप ने बदली जीवन की दिशा : 2001 का गुजरात भूकंप उन हादसों में से था जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी। यूं पैसों को मैंने कभी अहमियत नहीं दी। स्त्रियों वाले ज्यादा शौक भी नहीं हैं। उस दिन मैं छठवें फ्लोर पर थी और बिल्डिंग का हिलना शुरू हुआ। वो पल कितना भयावह था, इसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसने इसे महसूसा हो। जैसे-तैसे हम नीचे तक आए और एक के बाद एक इमारतें ढहने और मौतों की ख़बर मिलने लगी। हर जगह से संपर्क टूट गया था और तब तक मोबाइल हमारे पास नहीं था। हमारी बिल्डिंग को भी काफी नुकसान पहुंचा था और दो रातें हमने बाहर जागकर ही गुजारीं। 
 
लेखन की प्रेरणा : जिंदगी और बदलते समय से बड़ा शिक्षक और कोई नहीं होता। लेखन की प्रेरणा, मुझे अपने अनुभवों और उन दिनों के सामाजिक वातावरण ने दी। अव्यवस्थाओं, अनुशासनहीनता, गंदगी, झूठ, बेईमानी और अपराधों को देख सुन बड़ी कोफ़्त होती थी। मैनें लेखनी कब थामी, ये तो याद नहीं पर 13 वर्ष की उम्र से ही प्रादेशिक समाचार पत्रों ने मुझे स्थान देना शुरू कर दिया था। 17 वर्ष की आयु में मध्यप्रदेश पत्रलेखक संघ की ओर से मिला तृतीय पुरस्कार मुझे बेहद उत्साहित कर गया। इसी दौरान सा. हिंदुस्तान और धर्मयुग के युवा स्तंभों में भी मुझे जगह मिल चुकी थी। उसके बाद मेरी सहेली, गृहशोभा और कई स्त्रीप्रधान पत्रिकाओं में छपती रही।
 
दंगों ने डाला गहरा असर : 1984 के दंगों ने मुझ पर गहरा असर डाला। संभवतः उस समय मैं नौवीं कक्षा में थी और हमारे शहर में एक पूरा मार्केट ही जला दिया गया था। भीड़ ने एक धर्म विशेष के लोगों को अपना निशाना बनाया। मेरी मित्र का घर भी उन्हीं दंगों की भेंट चढ़ गया था। ज़िद करके मैं उसके घर गई तो पहचान ही न पाई। घर सड़क पर आ चुका था। दरवाजे, खिड़कियां, रोशनदान, परदे, कुछ नहीं था वहां। बस एक जला हुआ पलंग और उस पर बैठे उदास चेहरे। मैं रोती बिलखती घर वापस आई और माँ से लिपट गई। हलकी सर्दियाँ शुरू हो चुकीं थीं। माँ ने मेरी दोस्त के लिए नया स्वेटर दिलवाया था ,उसे देते वक़्त मैं संकोच से गड़ी जा रही थी और न जाने क्यों दोषी महसूस कर रही थी। गुस्से में एक रात में डायरी ही भर डाली थी। तब से मैंने समझ लिया था कि धर्म की आड़ में प्रार्थना से अधिक लड़ाई हुआ करती है और मैं इस धर्म को गलत तरीकों से उपयोग न होने दूंगी।
 
रचनाएं और सम्मान : काव्य-संग्रह - मध्यांतर (हिन्द-युग्म प्रकाशन), साझा संग्रह- एहसासों की पंखुरियाँ, मुस्कुराहटें...अभी बाकी हैं, हार्टस्ट्रिंग्स "इश्क़ा", काव्यशाला, गूँज, सरगम TUNED, शब्दों के वंशज, पुष्पगंधा, 100 क़दम, सृजन शब्द से शक्ति का। संपादन - एहसासों की पंखुरियाँ, मुस्कुराहटें..अभी बाकी हैं, मीठी- सी तल्खियाँ (भाग-2), मीठी- सी तल्खियाँ (भाग-3)। तृतीय एवं चतुर्थ 'दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव' के लिए कविताएं चयनित एवं प्रकाशित। षष्ठम अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, बैंकॉक (थाईलैंड) में आलेख प्रस्तुति। सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के लिए 'परिकल्पना साहित्य सम्मान' 2015 (अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, थाईलैंड ) आदि। 

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