प्रेम काव्य : एक हफ्ते की मोहब्बत

एक हफ्ते की मोहब्बत का ये असर था,
जमाने से क्या, मैं खुद से बेखबर था।


 
शुरू हो गया था फिर, इशारों का काम,
महफिल में गूंजता था, उनका ही नाम।
 
तमन्ना थी बस उनसे, बात करने की,
आग शायद थोड़ी सी, उधर भी लगी थी।
 
वो उनका रह-रहकर, बालकनी में आना,
नजरें मिलाकर, नजरों को झुकाना।
 
बेबस था मैं अपनी, बातों को लेकर,
दे दिया दिल उन्हें, अपना समझकर।
 
सिलसिला कुछ दिनों, यूं ही चलता रहा,
कमरे से बालकनी तक, मैं फिरता रहा।
 
पूरी हुई मुराद, उनसे बात हो गई,
दिल में कहीं छोटी सी, आस जग गई।
 
एक हवा के झोंके से, सब कुछ बदल गया,
अचानक से उनका, यूं रुख बदल गया।
 
मागें क्या उनको, जो तकदीर में नहीं थी,
कुछ नहीं ये बस एक हफ्ते की मोहब्बत थी।
 

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