जिनके लिए
देर तक रुका रहा मैं
अपने ही समय की देहरी पर
अपनी धड़कनों को
धीरे धीरे समझाता हुआ
और वे
समय की सटीकता ओढ़े
मुझसे पहले ही निकल गए
जैसे संबंध नहीं
कोई नियत कार्यक्रम हो
जिसकी समाप्ति पर
भावनाएं स्वतः निष्क्रिय हो जाती हैं।
मैं ठहरा रहा
उन पलों के अवशेष समेटता
जहां कभी
आश्वासनों की ऊष्मा थी
और अब
केवल स्वार्थ की ठंडी परछाइयां बची थीं।
समझ में आया
कि अपेक्षाएं
अक्सर उन द्वारों पर जन्म लेती हैं जहां संबंध
सुविधा के अनुसार खुलते और बंद होते हैं।
वे मुस्कानें
जो कभी अपनत्व का प्रतीक थीं
दरअसल
एक सुनियोजित विन्यास थीं
अवसर के अनुकूल ढल जाने की
अभ्यासयुक्त कला
और मैं
अपने ही विश्वास की सरलता में
उन्हें सत्य मान बैठा।
अकेलापन
धीरे धीरे
मेरे भीतर उतरने लगा
जैसे संध्या का धुंधलका
बिना आहट के
दिन के उजास को निगल लेता है।
किन्तु इस निस्तब्धता में भी
एक सूक्ष्म कंपन शेष था
कर्तव्य का
जो मुझे पुकारता रहा।
कि जीवन
केवल साथ चलने वालों का नाम नहीं
वह उन पगचिह्नों का भी दायित्व है
जो अकेले आगे बढ़ते हैं।
मैंने
अपनी प्रतीक्षा को
पराजय नहीं बनने दिया
उसे संकल्प में रूपांतरित किया
अब
मैं किसी के ठहरने पर नहीं
अपने चलने पर विश्वास करता हूं।
जो चले गए
वे समय के थे
और जो शेष है
वह मेरा है।
मेरे भीतर
अब भी एक दीप जलता है
जो संबंधों की क्षीण होती लौ के बीच
कर्तव्य की दीर्घ आभा से प्रकाशित है।
मैं चलूंगा
चाहे साथ कोई हो या न हो
क्योंकि पथ
अपनी पूर्णता
यात्रियों की संख्या से नहीं
यात्री के धैर्य से प्राप्त करता है।
और मैं
अब धैर्य का पथिक हूं
जिसने सीख लिया है
कि प्रतीक्षा के उस पार
अकेलापन नहीं
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