उज्जैन के पिछले 10 सिंहस्थ की विशेष घटनाएं/विवाद

उज्जैन का सिंहस्थ 2016 विवादों में घिरता नजर आ रहा है। कहीं अव्यवस्था है तो कहीं साधु-संत नाराज है। कहीं जनता परेशान है तो कहीं मीडिया हैरान है। आइए नजर डालते हैं पिछले 10 सिंहस्थ की विशेष घटनाओं पर इनमें वर्ष 2004 का सिंहस्थ शामिल नहीं है। 





सन् 1732 (विक्रम संवत् 1789) 
 
प्राचीनकाल में अवन्तिका (उज्जैन) का कुंभ पर्व वृश्चिक राशि में गुरु के आने पर मनाया जाता था। सन् 1730-31 ईस्वीं में मालवा प्रांत पर मराठों का आधिपत्य हुआ, तब सिंधिया राजवंश की राजधानी उज्जैन के महाराजा राणोजी शिंदे की आज्ञा से सन् 1732 ईस्वीं में वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया गया और तब से सिंहस्‍थ पर्व के समय, संवत्, तिथि आदि का निर्णय इस पर्व के 3-4 वर्ष पूर्व ही ज्योतिषियों द्वारा करवाने की परंपरा शुरू हुई। पर्व समाप्ति पर राज्य की ओर से पद गरिमानुसार शॉल, नकद भेंट आदि से महात्माओं को सम्मा‍नित किया जाता रहा है। 

सन् 1885 (विक्रम संवत् 1942)
 
सिंहस्थ में वैष्णवों से नागा संन्यासियों की लड़ाई हुई। शिप्रा के पास दत्त अखाड़े में नागों की रसोई हो रही थी। यह अवसर अनुकूल देखकर शिप्रा के तट पर इस पार लक्खी घाट पर स्‍थित नागों के मठ पर हमला कर दिया और मठ लूट लिया। मठ में दत्तात्रयजी का स्वर्णमंडित मंदिर था। उसका सारा सोना लूट लिया गया। तब दशनामी पंडे ने हल्ला कर शिप्रा पार नागाओं को सूचना दी जिसके कारण उसका भी कत्ल कर दिया गया। इसके विरोधस्वरूप नागाओं ने वैष्णवों पर हमला बोल दिया।





हजारों की संख्या में बैरागी मारे गए। नागा भी काफी संख्या में मरे जिनकी समाधियां शिप्रा नदी के किनारे आज भी शिवलिंगों के रूप में बनी हैं। उक्त मठ में काफी समय तक नित्य आटे के 5 बैरागी बनाकर हरिहर से पहले तलवार से काटे जाते हैं। दशनामी शंभू भैरव अखाड़े ने उसके बाद उज्जैन के कुंभ का परित्याग कर दिया, जो बाद में 1909 में पुन: प्रारंभ किया गया।

सन् 1897 (विक्रम संवत् 1954)
 
वर्ष 1897 में उज्जैन में भीषण अकाल पड़ा। लोग अन्न-जल को तरस गए। ऐसे में सिंहस्थ के दौरान स्नान तो ठीक साधुओं के लिए अन्न-जल की व्यवस्था के लिए प्रश्न उठ खड़े हुए। तत्कालीन सिंधिया रियासत ने इंदौर होलकर रियासत के मार्फत साधुओं को कहलवाया कि वे सिंहस्थ‍ हेतु उज्जैन न आएं। चूंकि सिंहस्थ पर्व का सीधा संबंध उज्जैन से है इसलिए साधुओं की नाराजगी और जिद की बात उठी। सिंधिया रियासत ने आपातकालीन व्यवस्था न पाने की बात के साथ सख्ती के संकेत भी दिए। उस वक्त इंदौर से उन्हेल होकर महिदपुर का रास्ता था। महिदपुर में होलकर रियासत का राज था।





शिप्रा की एक डगाल (पानी का बड़ा हिस्सा) महिदपुर के गंगवाड़ी क्षेत्र में थी। होलकर रियासत ने साधुओं के सिंहस्थ स्नान की व्यवस्था गंगवाड़ी में की और जमातों की व्यवस्था भी। इस मार्ग से साधुओं के गंगवाड़ी पहुंचने पर सिंहस्थ मेला भरा और साधुओं ने शिप्रा स्नान किया। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी, जब शिप्रा के रामघाट पर सिंहस्थ स्नान नहीं हुआ। 

सन् 1909 (विक्रम संवत् 1966)
 
इस सिंहस्थ में श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के रमता पंच के श्रीमहंत रामगिरिजी, श्रीमहंत शंकरपुरीजी, कारबारी पूर्णागिरि व शिवदयालपुरी आदि बड़वाई में चातुर्मास कर रहे थे। उनसे महाराजा शिवाजीराव होलकर ने उज्जैन कुंभ पुन: प्रारंभ करने की प्रार्थना की तथा महाराजा माधवराव शिंदे (सिंधिया) मालवा संस्थान के रेजीडेंट अंगरेज बहादुर तथा काशी के अखाड़ों के अन्य श्रीमहंतों को बुलाकर सबके मतानुकूल ठहराव किया। इस तरह सन् 1909 में उज्जैन में सिंहस्थ मनाया गया।




 












 

सन् 1921 (विक्रम संवत् 1978)
 
इस सिंहस्थ में उज्जैन में शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा दिनांक 21 मई, शनिवार के दिन स्नान के समय से ही महामारी का भयंकर प्रकोप हुआ। इसमें हजारों साधु मृ्त्यु को प्राप्त हुए। शासन द्वारा तत्काल शहर खाली करवाने का ऐलान किया गया और लोगों को जो भी साधन प्राप्त हुए, उनसे बाहर भेजा गया। बाद में महामारी से बचने के लिए आगामी सभी सिंहस्थों में केवल वैशाख पूर्णिमा का मुख्य स्नान ही मनाने का निर्णय लिया गया, तब से अब तक उज्जैन में एक ही शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा को होता आया है।





इस सिंहस्थ की एक और अविस्मरणीय घटना है। दिनांक 9 मई, 1921 के दिन श्री शिप्राजी की साक्षी में रामानुजी व रामानंदी संप्रदाय में शास्त्रार्थ हुआ। ये शास्त्रार्थ संस्कृत में लिखित हुआ। इसमें 11 मई को रामानंद संप्रदाय विजयी घोषित हुआ। तभी से रामानंद संप्रदाय श्री रामानुज संप्रदाय से भिन्न है और उनकी गुरु परंपरा भी अलग है। 

सन् 1945 (विक्रम संवत् 2002)
 
विश्वयुद्ध के कारण ग्वालियर स्टेट की तरफ से इस सिंहस्थ को न मनाए जाने का आदेश निकाला गया। इस आदेश को साधु-संतों, अखाड़ों और उज्जैन की धार्मिक जनता ने नहीं माना और श्री दत्त अखाड़े के गादीपति सिद्ध महापुरुष श्रीमहंत पीर, श्री संध्यापुरीजी महाराज की अध्यक्षता में संतों-महंतों और नागरिकों की एक बैठक बुलवाई गई जिसमें निर्णय लिया गया कि 15 दिन की व्यवस्था पीरजी तथा 15 दिन की सारी व्यवस्‍था उज्जैन में धार्मिक भक्तगण करेंगे और इस प्रकार सिंहस्थ संपन्न हुआ। अगले कुंभों से अपनी सारी व्यवस्था अखाड़े स्वयं करने लगे। शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा विक्रम संवत् 2002 दिनांक 27 मई 1945 को हुआ। 





 
 

 

सन् 1957 (विक्रम संवत् 2014)
 
श्री करपात्रीजी व दंडी स्वामियों ने सन् 1956 ईस्वी में उज्जैन का सिंहस्थ मनाने का निर्णय लिया किंतु षड्दर्शन अखाड़ों ने इन्हें 1957 में सिंहस्थ करने को कहा। विवाद चला और दंडी स्वामियों ने 1956 में और षड्दर्शन अखाड़ों ने 1957 में सिंहस्थ मनाया।






इसी सिंहस्थ में शाही स्नान को जुलूस के रूप में जाने के विषय में 4 प्रमुख संन्यासी अखाड़ों- जूना, दत्त, महानिर्वाणी व निरंजनी ने 13 मई 1957 के सिंहस्थ स्नान के लिए समझौता किया कि सबसे आगे दत्त अखाड़े का निशान, फिर तीनों अखाड़े के निशान घोड़ों पर समान श्रेणी में, फिर तीनों अखाड़ों के साइन बोर्ड, फिर बैंड, फिर भाले तीनों अखाड़ों के एकसाथ बराबर-बराबर, तीनों अखाड़ो के देवताओं की पालकियां बराबर-बराबर, फिर गुरु दत्त अखाड़े के पीरजी का हाथी अकेला, उसके पीछे तीनों अखाड़े के आचार्य हाथियों पर बराबर-बराबर, फिर नागे महापुरुषों के चलने का निर्णय हुआ। इस संबंध में हस्ताक्षर करने वालों में श्रीमहंत विष्णुगिरि, श्रीमहंत मंगलपुरी, महंत ओंकारपुरी, महंत दत्तगिरि व महंत किशोरपुरी थे।

सन् 1969 (विक्रम संवत् 2026)
 
इस सिंहस्थ को लेकर वैष्णव ‍अणि अखाड़ों में विवाद उत्पन्न हो गया। वैष्णव ‍अणि अखाड़ों ने 1968 में कुंभ मनाया, जबकि अन्य समस्त अखाड़ों ने 1969 ईस्वी में सिंहस्थ मनाया। मुख्य शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा,‍ विक्रम संवत् 2026 दिनांक 2 मई 1969 ईस्वी को हुआ।




सन् 1980 (विक्रम संवत् 2037)
 
इस सिंहस्थ कुंभ का मुख्य शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा विक्रम संवत् 2037 दिनांक 30 अप्रैल को था। वैष्णव, अणि अखाड़ों ने इस कुंभ में 3 शाही स्नान 13, 17 व 30 अप्रैल को करने की मांग की। चूंकि सन् 1935 ईस्वी से एक ही शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा को करने की परंपरा थी इसलिए केवल 30 अप्रैल को एक ही शाही स्नान करने का निर्णय लिया गया। बहुत समझाने पर भी वैष्णव, अणि अखाड़ों ने 3 शाही स्नान की जिद नहीं छोड़ी।





इस पर मेला प्रशासन ने धारा-144 लगा दी। 13 अप्रैल को जुलूस निकालने पर पाबंदी लगा दी। 13 अप्रैल को वैष्णवों ने पाबंदी तोड़कर अपने निशानों के साथ घाट पर स्नान हेतु जाने की कोशिश की। आखिर में 3 अलग-अलग भागों में रामघाट जाकर साधारण रूप से स्नान करने की अनुमति प्रशासन ने दी।

सन् 1992 (विक्रम संवत् 2049)
 
इस सिंहस्थ में मेले के समापन के समय दिनांक 17 मई को अखाड़ों ने मेले के समापन समारोह का बहिष्कार कर दिया। इस बहिष्कार के कई कारण थे, जैसे- स्वागत समारोह में प्रशासन द्वारा अखाड़ों के अलावा कई संस्थाओं और महात्माओं को आमंत्रित करना, माल्यार्पण का प्रारंभ अखाड़ों व महामंडलेश्वरों की उपेक्षा करते हुए प्रवचनकर्ता गृहस्‍थ आसारामजी को मुख्यमंत्री द्वारा गले लगाते हुए करना, माइक से एक संत का दूसरे संत से मिलन होने की उद्घोषणा करना, ब्रह्माकुमारियों व अन्य साधारण महत्व वाले अखाड़ों के संतों को आगे की पंक्ति में बैठाना आदि।



 
इस समारोह में राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी उपस्‍थित थीं। अंत में मेला प्रभारी व मेला अधिकारी ने 21 मई को लिखित में क्षमा मांगी और विवाद शांत हुआ। 18 मई को मेला प्रशासन व अखाड़ों की एक बैठक में यह निर्णय लिया गया कि भविष्य में होने वाले सिंहस्थों की स्‍थानीय समिति में 13 अखाड़ों के 2-2 सदस्य रखे जाएंगे। भूमि आवंटन हेतु बनने वाली पड़ाव समि‍ति में भी 26 सदस्य अखाड़े के होंगे, मेला प्रारंभ होने से पहले ही मेला प्रशासन और अखाड़ा परिषद की बैठकें बुलाकर व्यवस्था की रूपरेखा बनाई जाएगी। स्वागत समारोह समिति में भी सभी 13 अखाड़ों के प्रतिनिधि रखे आएंगे। सम्मान पत्र दिए जाने से पूर्व प्रशासन व अखाड़ा परिषद की बैठक कर चर्चा की जाएगी। मेले में होने वाली सारी व्यवस्थाएं शाही स्नान के बाद भी अमावस्या तक जारी रहेंगी तथा पेशवाई व स्नान के जुलूसों में घुड़सवार पुलिस आगे-पीछे रखी जाएगी।

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