महिला दिवस के मायने सही हो...

- राजश्री

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नारी यानी महिला जो कि बचपन में बेटी, बाद में बालिका-छात्राएँ फिर टीनएज में आने के बाद युवती और फिर शादी के बाद नारी का रूप धारण कर अपनी उम्र के हर पड़ाव को गौरवान्वित करती है ऐसी है यह महिला। लेकिन क्या आपने इस बात पर विचार किया है कि किस प्रकार, किस हद तक, किसी तरह उसे प्रताड़ित करने, उसके साथ अन्याय करने के बाद वह इस मुकाम तक पहुँच पाती है।

आज देश को आजाद हुए 60 साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी महिला या बालिका के साथ अन्याय, अत्याचार का अंत खत्म नहीं हुआ है। हम बात तो आजाद देश की करते हैं लेकिन यहाँ पर चाहे वो किसी की बेटी हो या बहू, लेकिन आज भी क्या वह सही मायने में स्वतंत्र है या पूरी स्वतंत्रता के साथ जी पा रही है। आज भी बेटियों को हर स्तर पर शोषण होता है। यह कहना और इसका प्रतिशत निकालना बहुत ही मुश्किल है।

आज भी एक बच्ची को इस दुनिया में आने से पूर्व ही गर्भ परीक्षण कर कोख में खत्म कर दिया जाता है। आम आदमी यह भूल चुका है कि उसका अस्तित्व सही मायने में एक महिला द्वारा दी गई सबसे बड़ी पहचान है। अगर इस प्रकार हर कोई बेटी को जन्म देने से इन्कार कर दे तो फिर पुरुष की परिभाषा भी जल्द ही खत्म हो जाएगी क्योंकि महिला के पीछे ही पुरुष का महत्व है। हर जगह महिला पुरुष की हमकदम बनकर उसका साथ निभाती है, लेकिन बदले में पुरुष क्या देते हैं, लड़के की चाह रखने वाले परिवार बेटी को कोख में मौत की नींद सुला देते हैं।
  नारी यानी महिला जो कि बचपन में बेटी, बाद में बालिका-छात्राएँ फिर टीनएज में आने के बाद युवती और फिर शादी के बाद नारी का रूप धारण कर अपनी उम्र के हर पड़ाव को गौरवान्वित करती है ऐसी है यह महिला। लेकिन क्या आपने इस बात पर विचार किया है।      


बहुतेरे घरों और परिवार में आज भी बेटी को बोझ समझकर उसके साथ ज्यादतियाँ की जाती हैं, उस पर अन्याय किया जाता है। कई जगहों पर तो पिता और पड़ोसी भी अपनी बेटी के साथ तो कई जगहों पर ससुर बहू के साथ भी बलात्कार करने में नहीं चूकते। आज हम कितने भी प्रोफेशनल क्यों न बनें, लेकिन आम आदमी की यह मानसिकता जो कि कभी सुधर नहीं सकती तो फिर क्या हो सकता है। बेचारी बेटियाँ कभी तो कोख में ही खत्म की जाती हैं या कभी कहीं कोई 2 साल की बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूकता। ऐसे हालातों में यह कहना कितना मुश्किल है आज भी महिलाएँ कितनी सुरक्षित हैं।

आज इस पुरुष प्रधान समाज में दुनिया की कई महिलाओं ने काफी प्रगति कर ली है। एक से एक बड़े ओहदों पर वे अपना कार्य कर रही हैं। जिसमें देश की प्रथम भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी 'किरण बेदी', मासूम उम्र में ही कई झंझावातों को झेलने वाली 'ऑपरा विन्फ्रे', पहली अग्निशमन अधिकारी 'हर्षिनी कान्हेकर', पेप्सीको की ग्लोबल सीईओ 'इंदिरा नुई', तो कहीं बुरका पहनकर स्त्री यौन संबंधी समस्याओं पर चर्चा करने वाली 'हेबा कोत्ब' और हाल ही में जर्नलिस्ट ऑफ ईयर से सम्मानित हुई बरखा दत्त आदि... आदि....। ऐसी कई महिलाओं का हम उल्लेख कर सकते हैं जिन्होंने अपने देश, दुनिया का नाम गौरवान्वित किया है।

देश में कई महिलाएँ ऐसी भी हैं जो आजकल बढ़ती महँगाई और अच्छे से अच्छा दिखने, रहने और दिखाई देने की चाह में अपना अस्तित्व कहीं खोती जा रही हैं। आज अधिकतर कम पढ़ी-लिखी लड़कियाँ समय से हारते हुए और महँगाई के बोझ तले दबते हुए अपने कदम वेश्यावृत्ति की ओर बढ़ा रही हैं या फिर कुछ सामाजिक तत्व उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर देते हैं जो कि सही नहीं है।

यह एक महिला का, देश में उन देवियों का जिनकी हम पूजा करते हैं उनका बड़ा अपमान है। आओ 8 मार्च, महिला दिवस पर हम देश को और ऊपर उठाने के लिए अपने कदमों को सही दिशा देकर महिला (नारी) होने पर गर्व करें, अपना सिर और ऊँचा कर देश, दुनिया में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का मान बढ़ाएँ, सम्मान बढ़ाएँ।