हमारा लोकतंत्र और हमारी हिन्दी

- जितेन्द्र वेद
 
आजादी के बाद भारत में जो शासन व्यवस्था अपनाई गई वह है - लोकतंत्र। इस शब्द के कई समानार्थी शब्द भी उपलब्ध हैं - यथा प्रजातंत्र, जनतंत्र इत्यादि नाम कुछ भी हो, पर एक बात जो इन शब्दों में ध्वनित होती है - वह है आम आदमी की शासन व्यवस्था' पर जब तक आम आदमी की भाषा शासन व्यवस्था की भाषा नहीं बनेगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा ही रहेगा।

इसी के साथ अब्राहम लिंकन की 'जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता की' वाली परिभाषा सिर्फ किताबी, ख्यालों में, बसने वाली परिभाषा बनकर रह जाएगी।
 
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि आजादी के 68 वर्षों बाद भी हिन्दी संवाद नहीं, सिर्फ अनुवाद की भाषा बनकर रह गई है। तमाम संवैधानिक अनुच्छेदों और उपबंधों के बावजूद हिन्दी हाशिए पर ही रह रही है। उसे फुटपाथ पर गुजर-बसर करना पड़ रहा है, जबकि अँग्रेजी वाले तीन, चार, पाँच सितारों वाली होटलों में ऐश कर रहे हैं।
 
संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 343 (1) में देवनागरी लिपि में लिखी गई हिन्दी को संघ की भाषा का दर्जा दिया है। पर क्या बीती अर्धशती में हिन्दी संघ की भाषा बन सकी है? आज भी, अधिकांश काम हिन्दी के बजाय अँग्रेजी में हो रहे हैं। कई सरकारी महकमों में तो अधिकारियों को हिन्दी की चिंदी करने में गर्व की अनुभूति होती है।
 
यदि आप कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोलकाता (उत्तर-पूर्व भी शामिल) तक देखें तो क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभाव वाली टूटी-फूटी ही सही, पर सबको हिन्दी आती है। यानी हिन्दी इस देश के कोने-कोने में रच-बस गई है अत: संवाद का माध्यम बनने में पूर्णतया समर्थ है। यदि कोई कहता है कि दक्षिण वाले हिन्दी का विरोध करते हैं तो शायद यह भी मान्य नहीं है। कम-से-कम, कर्नाटक, केरल और आंध्रप्रदेश के प्रमुख शहरों में तो ऐसा कहीं देखने को नहीं मिला। 

तिरुअनंतपुरम में तो एक दुकानदार ने मेरी टूटी-फूटी मलयालम सुनकर यह कहा कि यदि आप उत्तर भारतीय हैं तो आप हिन्दी में बात कर सकते हैं। क्या यह इस बात का सूचक नहीं है कि दक्षिण भारतीय अच्छी हिन्दी जानते हैं और वक्त-बेवक्त हिन्दी में गपशप भी कर सकते हैं।

जहाँ तक तमिलनाडु का सवाल है, उसके बारे में भी भ्रांति ही ज्यादा है। वहाँ भी उतना हिन्दी विरोध नहीं है, जितना सोचा जाता है। दरअसल 'बद अच्छा, बदनाम बुरा' वाली कहावत इस राज्य के मामले में अक्षरश: सत्य है। '‍हिन्दी की तमाम लोकप्रिय फिल्में दक्षिण भारत में रिलीज हुई हैं, देखी गई हैं, सराही गई हैं। दक्षिण भारतीयों के हिन्दी ज्ञान के लिए और क्या सबूत चाहिए? वास्तव में, दक्षिण भारत में हिन्दी मुख्य भाषा के रूप में तो नहीं, पर पूरक भाषा के रूप में संवाद का माध्यम बन चुकी है। यदि कहीं कोई समस्या है तो वह है - सरकारी दफ्‍तरों में और सायबर संस्कृति में, जहाँ हिन्दी, अँग्रेजी की दासी के रूप में पेश की जा रही है।
 
यूँ तो अनुच्छेद 343 (1) में हिन्दी को संघ की भाषा बनाया गया है। फिर इसे गति देने के लिए राजभाषा अधिनियम-1963 बनाया गया है। पर इन कागजी घोड़ों के दौड़ाने के बावजूद हिन्दी का घोड़ा, क्षिप्र गति से ही आगे बढ़ रहा है 'वेस्ट मिनिस्टर सिस्टम' संसदीय व्यवस्था पर लगातार हावी रहा है। 
 
मुझे इस बात से कतई गिला-शिकवा नहीं है कि अँग्रेजी क्यों पढ़ी-पढ़ाई जा रही है। अंतत: अँग्रेजी देशवासियों के लिए ज्ञान की खिड़की खोलती है; उन्हें ज्यादा सोचने-समझने का अवसर प्रदान करती है। दुनिया भर के लोगों से संवाद का माध्यम है अत: अँग्रेजी पढ़ी-पढ़ाई जानी चाहिए। 
 
पर जब अँग्रेजी, हिन्दी को प्रतिस्थापित कर ऊँचे सिंहासन पर बैठने लगती है तो आत्म ग्लानि होने लगती है। मलयालम के प्रसिद्ध कवि वल्लतोल नारायण मेनन के अनुसार मातृभाषा माँ होती है तो अन्य भाषा मौसी, मौसी अच्छी तो होती है पर माँ का स्थान कदापि ग्रहण नहीं कर सकती।
 
विश्व की एक समृद्ध भाषा के रूप में अँग्रेजी नि:संदेह रूप से आदर की पात्र है, पर भारतीयों के मानसिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक व न्यायिक हितों के संवाहक के रूप में वह भारतीयों की भाषा कदापि नहीं बन सकती और अँग्रेजी को लगातार इतना ऊँचा स्तर दिया जाता रहा तो वह जनतंत्र के अवमूल्यन के अलावा कुछ नहीं है।

भारत, रूस, कनाडा जैसे विशाल और बहुभाषी देशों की अपनी भाषाई समस्याएँ हैं। 'पेरेस्गाइका' और 'ग्लासनोस्त' के पूर्व वाले वर्षों में तत्कालीन सोवियत संघ में ढेर सारी भाषाएँ बोली जाती हैं। कनाडा में आज भी, फ्रेंच व अँग्रेजी दोनों बोली-समझी जाती है। पर इन देशों ने दूसरों की भाषा नहीं अपनाई। 

अपनी ही भाषा को पल्लवित, पुष्पित, विकसित कर महाशक्ति के रूप में तब्दील हुए हैं। तो भारत में क्या परेशानी है? शायद कमी है धुन की, जुनून की, इच्छाशक्ति की।
 
एक अँग्रेजी भाषी अल्पसंख्यक वर्ग, बहुसंख्यक वर्ग पर अपनी सत्ता जमाए रखने के लिए अँग्रेजी को लाठी की तरह इस्तेमाल कर रहा है और हिन्दी वाले निरीह भेड़-बकरियों की तरह धकियाए जा रहे हैं, हड़काए जा रहे हैं। अँग्रेजी में पढ़ने वाले अपने आपको तीसमारखाँ समझते हैं, गोया उन्हें सुरखाब के पर लगे हों।
 
संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुसार 'केंद्रीय सरकार का यह कर्तव्य है कि वह हिन्दी भाषा का 
प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।' पर ईमानदारी से स्वतंत्रता के बाद केंद्रीय सरकारों ने कितनी कोशिशें की है? कितने लोग संसद में अपनी बात हिन्दी में कहते हैं?
 
दरअसल, प्रजातंत्र के तीनों अंगों यानी कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में हिन्दी की अवहेलना हो रही है। न सांसद हिन्दी बोलते हैं, न नौकरशाह, बोलते भी हैं तो 'ललु्आ हिन्दी' जिसको सुनकर अपनी भाषा पर गर्व कम होता है, हँसी ज्यादा आती है। न्यायपालिका की स्थिति तो और भी ज्यादा बदतर है। वहाँ वालों ने तो शायद हिन्दी से कट्‍टी कर ली है।
 
न्यायपालिका में तो कभी-कभी यह स्थिति हो जाती है कि वादी और प्रतिवादी दोनों को अँग्रेजी नहीं आती है, पर जिरह अँग्रेजी में होती है। क्या इस हालत में अपराधी अपना बचाव कर पाएगा? और यदि वह नहीं कर पाता है तो यह जनतंत्र का निषेध नहीं तो क्या है?
 
दरअसल, हिन्दी और स्थानीय भाषाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह न्याय के क्षेत्र में है क्योंकि यदि हम अपराधी को पूरी प्रक्रिया समझाकर उसे अपना पक्ष रखने ही नहीं दे रहे हैं तो न्याय व्यवस्था का मतलब ही क्या रह जाएगा और कोई व्यक्ति अपना पक्ष जब ही रख सकता है जब न्यायिक प्रक्रिया हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में हो, अन्यथा अँग्रेजी की बीन बजती रहेगी और निर्दोष मुर्गे हलाल होते रहेंगे। 
 
भारतीय भाषाओं की रस्साकसी के बीच अँग्रेजी 'बंदर' का काम अंजाम दे रही है। बेलगाँव में मराठी और कन्नड़ खींचतान करती है तो रायचूर में तेलुगू और कन्नड़। कहीं पंजाबी और हिन्दी की खींचतान है। स्वाभाविक ही, दो पड़ोसी बिल्लियों के झगड़े में सबसे ज्यादा भला अँग्रेजी का हो रहा है। वह लगातार 'देशी रोटी' को 'विदेशी केक' में बदलने के लिए आतुर है।
 
भारत की राजभाषा अधिनियम भले ही यह कहता हो कि कार्यालयीन हिन्दी सरल, सहज, आम बोलचाल की भाषा होना चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है। सरकारी हिन्दी इतनी क्लिष्ट है कि कई बार समझने के लिए हिन्दी भाषियों को भी शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता है।
 
कुल मिलाकर हिन्दी की अवमानना, अवहेलना के कारण हिन्दी अपने घर में ही दासी बन गई है। भले ही रूस, जापान, अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों में इसके पठन-पाठन के बावजूद इसकी स्थिति शोचनीय है। 
 
तब हमारे लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण पक्ष को शनै:-शनै: अँग्रेजी चूहे कुतरते जा रहे हैं। यदि ऐसा होता रहा तो लोकतंत्र की चूलें हिलने में देर नहीं लगेगी। सिर्फ भाषा ही नहीं, लोकतंत्र भी रसातल में जाने लगेगा। 
 
जरूरत है हिन्दी को पल्लवित, पुष्पित करने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की। यदि हम ऐसा नहीं कर सकते तो हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाने का कोई अर्थ नहीं होगा।
आइए एक बार फिर 
 
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती,
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि हो नागरी।

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