Makar Sankranti: हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का पर्व बहुत ही महत्व रखता है। यह प्रमुख उत्सवों में से एक है। इस दिन सूर्यदेव और भगवान विष्णु की आरती और चालीसा पढ़ने का खास महत्व है। इसी दिन उनकी पूजा करने से मिलते हैं कई तरह के लाभ। आओ जानते हैं मकर संक्रांति के पावन पर्व पर अर्थ, पूजा विधि, आरती, चालीसा, लाभ और पूछे जाने वाले प्रश्नों के बारे में विशेष जानकारी।
'संक्रांति' शब्द संस्कृत की 'सं' और 'क्रांति' से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'प्रवेश करना' या 'स्थान परिवर्तन करना'। सूर्य का मकर राशि में संक्रमण करने को मकर संक्रांति कहते हैं। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण (उत्तर की ओर गमन) होता है, जिससे दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। इसे अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है।
2. मकर संक्रांति पूजा विधि
संक्रांति के दिन पुण्य काल में दान, स्नान व श्राद्ध करना शुभ माना जाता है।
इस दिन तीर्थों में या गंगा स्नान और दान करने से पुण्य प्राप्ति होती है।
मकर संक्रांति के दिन पावन नदियों में श्रद्धापूर्वक स्नान करें।
इसके बाद, पूजा-पाठ, दान और यज्ञ क्रियाओं को करें।
प्रातःनहा-धोकर भगवान शिव जी की पूजा तेल का दीपक जलाकर करें।
भोलेनाथ की प्रिय चीजों जैसे धतूरा, आक, बिल्व पत्र इत्यादि को अर्पित करें।
भविष्यपुराण के अनुसार सूर्य के उत्तरायन या दक्षिणायन के दिन संक्रांति व्रत करना चाहिए।
इस व्रत में संक्रांति के पहले दिन एक बार भोजन करना चाहिए।
संक्रांति के दिन तेल तथा तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए।
इसके बाद सूर्य देव की स्तुति करनी चाहिए। ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
संक्रांति के पुण्य अवसर पर अपने पितरों का ध्यान और उन्हें तर्पण अवश्य प्रदान करना चाहिए।
सूर्यदेव को अर्घ्य दें। आदित्य हृदय स्तोत्र का 108 बार पाठ करें।
मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त में सिद्ध सूर्य यंत्र को सूर्य मंत्र का जप करके पहनने से सूर्यदेव तरक्की की राह आसान बना देते हैं।
तिल युक्त खिचड़ी, रेवड़ी, लड्डू खाएं एवं दूसरों को भी खिलाएं।
ब्राह्मण को गुड़ व तिल का दान करें और खिचड़ी खिलाएं।
वेदों में वर्जित कार्य- जैसे दूसरों के बारे में गलत सोचना या बोलना, वृक्षों को काटना और इंद्रिय सुख प्राप्ति के कार्य इत्यादि कदापि नहीं करना चाहिए।
जरूरतमंद को कंबल, वस्त्र, छाते, जूते-चप्पल इत्यादि का दान करें।
3. मकर संक्रांति आरती
श्री सूर्यदेव- ॐ जय सूर्य भगवान।
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी।।
अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे। तुम हो देव महान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते। सब तब दर्शन पाते।।
फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा। करे सब तब गुणगान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान...।।
संध्या में भुवनेश्वर अस्ताचल जाते। गोधन तब घर आते।।
गोधूलि बेला में, हर घर हर आंगन में। हो तव महिमा गान।।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।स्वरूपा।।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
4. मकर संक्रांति चालीसा
श्री सूर्य चालीसा
दोहा
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।
चौपाई
जय सविता जय जयति दिवाकर,
सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर,
सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
विवस्वान, आदित्य, विकर्तन,
मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते,
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि,
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर,
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
मंडल की हिमा अति न्यारी,
तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते,
देखि पुरन्दर लज्जित होते।
मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,
आदित्य, नाम लै,
रण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं,
मस्तक बारह बार नवावै।
चार पदारथ सो जन पावै,
दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह,
विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
सेवै भानु तुमहिं मन लाई,
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते,
सहस जनम के पातक टरते।
उपाख्यान जो करते तवजन,
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है,
प्रबलमोह को फंद कटतु है।
अर्क शीश को रक्षा करते,
रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,
कर्ण देश पर दिनकर छाजत।
भानु नासिका वास करहु नित,
भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे,
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,
तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर,
त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
युगल हाथ पर रक्षा कारन,
भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर,
कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।
जंघा गोपति, सविता बासा,
गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी,
बाहर बसते नित तम हारी।
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै,
रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं,
भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै,
जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता,
नव प्रकाश से आनन्द भरता।
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,
कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके,
धर्मराज सम अद्भुत बांके।
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,
किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,
दूर हटत सो भव के भ्रम सों।
परम धन्य सो नर तनधारी,
हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,
मध वेदांगनाम रवि उदय।
भानु उदय वैसाख गिनावै,
ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता,
कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,
पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।
दोहा
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।
5. मकर संक्रांति लाभ
सकारात्मक ऊर्जा: सूर्य देव की पूजा करने से जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है।
ग्रह दोषों से मुक्ति: इस दिन सूर्य और शनि (मकर राशि के स्वामी) का मिलन होता है, जिससे कुंडली के संबंधित दोष शांत होते हैं।
मानसिक शांति: पूजा और ध्यान से चित्त शांत रहता है और एकाग्रता बढ़ती है।
पुण्य की प्राप्ति: शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति पर किया गया दान 100 गुना फल देता है।
त्याग की भावना: काले तिल, गुड़, खिचड़ी और ऊनी कपड़ों का दान करने से व्यक्ति के अहंकार का नाश होता है।
पाप मुक्ति: ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया दान पिछले जन्मों के दोषों और पापों को कम करता है।
सूर्य चालीसा: इसके नियमित पाठ से आत्मविश्वास और तेज (Glow) बढ़ता है। विद्यार्थियों के लिए यह बुद्धि प्रदाता माना गया है।
आरती: समूह या व्यक्तिगत रूप से आरती करने से घर का वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं।
आरोग्य: सूर्य की स्तुति करने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है, विशेषकर हड्डियों और आँखों से जुड़ी समस्याओं में।
6. मकर संक्रांति पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न- FAQs
प्रश्न 1. मकर संक्रांति हमेशा 14 या 15 जनवरी को ही क्यों पड़ती है?
उत्तर: अधिकांश हिंदू त्योहार चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं और उनकी तारीखें बदलती रहती हैं, लेकिन मकर संक्रांति सौर चक्र (Sun's movement) पर आधारित है। सूर्य हर साल 14 या 15 जनवरी को ही मकर राशि में प्रवेश करता है। पृथ्वी के अपनी धुरी पर झुकने (Precession) के कारण, हर 70-100 साल में यह तारीख एक दिन आगे खिसक जाती है।
प्रश्न 2. इस दिन खिचड़ी क्यों खाई और दान की जाती है?
उत्तर: खिचड़ी को सुपाच्य और पौष्टिक भोजन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार। चावल को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है। दाल (उड़द) को शनि का। हल्दी को गुरु का और घी को सूर्य का। इन सबको मिलाकर खाने से सभी प्रमुख ग्रहों की कृपा प्राप्त होती है। इसे 'उत्तर प्रदेश और बिहार' में मुख्य पर्व के रूप में मनाया जाता है।
प्रश्न 3. तिल और गुड़ का ही महत्व क्यों है?
उत्तण: वैज्ञानिक कारण: जनवरी में कड़ाके की ठंड होती है। तिल और गुड़ की तासीर गर्म होती है, जो शरीर को ऊर्जा और गर्माहट प्रदान करती है।
आध्यात्मिक कारण: शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं और तिल शनि का प्रतीक है। सूर्य (पिता) का अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि) में तिल के साथ स्वागत करना 'कड़वाहट को भुलाकर प्रेम से रहने' का संदेश देता है।
प्रश्न: 4. उत्तरायण और मकर संक्रांति में क्या अंतर है?
उत्तर: अक्सर लोग इन्हें एक ही मानते हैं, लेकिन खगोलीय दृष्टि से थोड़ा अंतर है।
मकर संक्रांति: वह क्षण जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।
उत्तरायण: वह प्रक्रिया जब सूर्य उत्तर की ओर बढ़ना शुरू करता है, जिससे दिन लंबे होने लगते हैं। प्राचीन काल में ये दोनों एक ही दिन होते थे, लेकिन अब इनमें कुछ दिनों का अंतर आ गया है।
प्रश्न: 5. क्या इस दिन पतंग उड़ाने का कोई वैज्ञानिक कारण है?
उत्तर: पतंग उड़ाने का मुख्य उद्देश्य धूप (Sunlight) के संपर्क में आना है। सर्दियों में शरीर में विटामिन-D की कमी हो जाती है और त्वचा संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। पतंग उड़ाते समय लोग लंबे समय तक सुबह की धूप में रहते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होती है।
प्रश्न 6. इस दिन क्या करना वर्जित (मना) है?
उत्तर: संक्रांति के दिन तामसिक भोजन (मांसाहार, लहसुन, प्याज) से बचना चाहिए। किसी को खाली हाथ घर से नहीं भेजना चाहिए (दान का विशेष महत्व)। इस दिन अपशब्दों का प्रयोग न करने की सलाह दी जाती है।