कपड़ों के बिना ज़िंदगी जीने की वकालत

बुधवार, 27 जुलाई 2016 (15:38 IST)
लिंडसे बेकर
 
लंदन में इन दिनों एक ख़ास नुमाइश लगी हुई है। ये नुमाइश स्टूडियो वॉल्तेयर गैलरी में लगी है। जो अस्सी के दशक में महिलाओं के एक आंदोलन की याद दिलाती है। ये आंदोलन 'नियो-नैचुरिस्ट्स' ने चलाया था। ये लोग क़ुदरत से नज़दीकी और बिना कपड़ों के ज़िंदगी बसर करने के पैरोकार हैं।
80 के दशक में क्रिस्टीन बिनी, उनकी बहन जेनिफ़र और विल्मा जॉनसन नाम की तीन महिलाओं ने बिना कपड़ों के कई जगह प्रदर्शन करके लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश की थी।
 
विल्मा जॉनसन उन दिनों को याद करके कहती हैं कि सबसे मज़ेदार वाक़या लंदन के रॉयल ओपेरा हाउस में हुआ था। वहां मशहूर बैले डांसर माइकल क्लार्क ने उन्हें अपने एक कार्यक्रम में बुलाया था। ये कार्यक्रम कुछ लोगों की मदद के लिए पैसे जमा करने के लिए हो रहा था।
 
जब रॉयल ओपेरा हाउस में विल्मा जॉनसन, क्रिस्टीन बिनी और जेनिफ़र बिनी अपने बदन पर सिर्फ़ बॉडी पेंट लगाकर लोगों के सामने आईं, तो सन्नाटा पसर गया। विल्मा कहती हैं कि वो सन्नाटा बेहद मज़ेदार था।
 
अस्सी के दशक में 'नियो-नैचुरिस्ट्स' के इस ग्रुप ने ऐसे कई कारनामे किए थे। कभी सड़क पर प्रदर्शन, तो कभी, नाइट क्लब या आर्ट गैलरीज़ में नंगे बदन की नुमाइश।
उन्हें इस हालत में देखकर अक्सर लोग हैरत में पड़ जाते थे। कुछ लोगों तो महिलाओं का यूं नंगे बदन खुले में घूमना सदमा दे गया।
 
इनका मक़सद ज़माने के चलन को, समाज के क़ायदों को चुनौती देना था। इसीलिए ये गुरिल्ला युद्ध के अंदाज़ में कभी भी, कहीं भी पहुंचकर अपनी नुमाइश करने लगते थे। लेकिन कुछ वक़्त बाद लोग उन्हें भूल गए।
 
अब उसी पुरानी याद को ताज़ा कर रही है स्टूडियो वॉल्तेयर गैलरी में लगी इन 'नियो-नैचुरिस्ट्स' के कारनामों की नुमाइश। इसमें तस्वीरें हैं, वीडियो है और दूसरी यादगार चीज़ें हैं।
 
वैसे 'नियो-नैचुरिस्ट्स' के इस ग्रुप की हरकत बेहद बचकानी होती थीं, इसमें कोई शक नहीं कि उन पर हंसी आती थी। इस समूह की सदस्य क्रिस्टीन बिनी एक ऐसे ही मौक़े को याद करके बताती हैं कि उन्होंने सेंट्रल लंदन में एक बार मछुआरों और जलपरियों के नाटक को पेश किया था। क्रिस्टीन कहती हैं कि एक पुलिसवाला वहां आकर उन्हें क़रीब दस मिनट तक समझाता रहा। लेकिन उसने उन तीनों को गिरफ़्तार नहीं किया। बस ये गुज़ारिश की कि वो कपड़े पहन लें।
 
'नियो-नैचुरिस्ट्स' समूह की तीनों महिलाओं ने लंदन के कई कलाकारों के साथ मिलकर अपना संदेश देने की कोशिश की। इनमें माइकल क्लार्क, बॉय जॉर्ज, डेरेक जारमैन, जॉन मेबरी और ग्रेसन पेरी जैसे अपने अपने क्षेत्र की मशहूर हस्तियां शामिल हैं।
 
उनके आंदोलन में कलाकारों के अलावा, छात्र, क्लब जाने वाले लोग भी शामिल हुए थे। इसे न्यू रोमांटिक आंदोलन का नाम दिया गया था। समूह के सदस्यों को 'ब्लिट्ज किड' के नाम से भी जाना जाता था।
 
'नियो-नैचुरिस्ट्स' समूह की सदस्य जेनिफर बिनी कहती हैं कि वो लोग समलैंगिकों के ज़्यादा क़रीब रहे। उनके बीच का खुला माहौल उन्हें वो करने का हौसला देता था, जो उन्होंने कर के दिखाया।
 
'नियो-नैचुरिस्ट्स' का ये ख़्याल क्रिस्टीन को 70 के दशक में जर्मनी के दौरे से आया था। जहां उन्होंने देखा था कि जर्मनी में समाज से बग़ावत कर रहे लोग खुलेआम नंगे टहलते थे।
 
उनके मुक़ाबले ब्रिटेन में नया चलन चलाने की कोशिश कर रहे लोग कमज़ोर मालूम होते थे। वो काले कपड़े पहनते थे और अक्सर घरों के भीतर ही रहना पसंद करते थे।
लेकिन, क्रिस्टीन ने ब्रिटेन में जर्मनी से लाकर इंक़लाब का पौधा रोप दिया। इसमें उन्हें अपनी बहन जेनिफर और दोस्त विल्मा से मदद मिली।
 
हालांकि कोई उनके कारनामों को गंभीरता से नहीं लेता था। मगर क्रिस्टीन कहती हैं कि वो नंगे बदन की नुमाइश करके समाज को एक संदेश देना चाहते थे। वो कहती हैं कि उस दौर में ही क्या, आज भी औरतों पर सज-संवरकर रहने का दबाव है। ज़्यादातर महिलाएं इसी दबाव में बन-ठनकर रहती हैं। लेकिन ज़रूरी नहीं कि औरत की सच्चाई हमेशा तस्वीरनुमा बनावटीपन के पर्दे में छुपी रहे।
 
क्रिस्टीन का कहना है कि औरत का क़ुदरती रूप दुनिया को दिखाई देना चाहिए। यही उनका और साथियों का मक़सद था, अपने बदन की खुली नुमाइश के पीछे। अस्सी के दशक का वो दौर अब पीछे छूट चुका है। आज विल्मा जॉनसन सर्फ़िंग करती हैं। उस पर एक क़िताब भी लिख चुकी हैं। वहीं बिनी बहनें अब सिरैमिक का काम करती हैं। लेकिन तीनों की दोस्ती अब भी क़ायम है। 
 
क्रिस्टीन कहती हैं कि एक उम्र के बाद लोग औरतों की तरफ़ देखते तक नहीं। वो पास से गुज़र जाती हैं और लोग ध्यान नहीं देते। वैसे, समाज में आज भी किसी को नंगे बदन देखकर लोगों को झटका लगता है। कई बार ऐसे नज़ारे हमें उकसाते हैं। कभी हंसाते हैं। और कभी सोचने पर मजबूर कर देते हैं। हालांकि नंगे बदन कि नुमाइश करने वालों का हमेशा मज़ाक़ बनता रहा है।
 
जैसे कि अमरीकी फोटोग्राफर स्पेंसर ट्यूनिक जो अक्सर बड़ी संख्या में नंगे लोगों को जमा करके उनकी तस्वीरें लेते हैं। अभी हाल ही में उन्होंने ब्रिटेन के हल शहर में तीन हज़ार नंगे बदन लोगों की तस्वीर खींची थी। इसका मक़सद, हल शहर को 2017 के सिटी ऑफ कल्चर का दर्जा मिलने का प्रचार करना था।
 
ब्रिटन के चैनल 4 पर एक शो भी हुआ, जिसका नाम था, 'लाइफ स्ट्रिप्ड बेयर' जिसमें लोगों को अपने बदन के सारे कपड़े और जूते-जुराबें उतारनी होती थीं। उसके बाद उन्हें अपने एहसास बयां करने को कहा जाता था।
 
रूस का पुसी राइट ग्रुप और यूक्रेन का फेमेन समूह भी अपने कपड़े उतारकर किए जाने वाले प्रदर्शनों की वजह से चर्चा में रहे हैं। आज की तारीख़ में कपड़े उतारकर विरोध दर्ज कराने का तरीक़ा, शोहरत की गारंटी देता है।
 
लंदन की 'नियो-नैचुरिस्ट्स' नुमाइश की देख-रेख करने वाली जेसिका वॉन कहती हैं कि बिनी बहनें और विल्मा जो अस्सी के दशक में कर रही थीं, वो अपने वक़्त से बहुत आगे की बात थी। आज फेमेन और पुसी राइट ग्रुप के सदस्य सिर्फ़ ऊपर के कपड़े उतारकर विरोध करते हैं। मगर 'नियो-नैचुरिस्ट्स' तो पूरी तरह कपड़े उतारकर प्रदर्शन करते थे।
 
सिका कहती हैं कि 'नियो-नैचुरिस्ट्स' का अस्सी के दशक का संदेश आज और प्रासंगिक हो गया है। आज महिलाएं और भी कारोबारी चीज़ बनती जा रही हैं। उन पर हमेशा ख़ूबसूरत, बन-संवरकर रहने का दबाव है। उनके बदन की कमी का मज़ाक़ बनाया जाता है। अगर उनके बदन पर बाल हैं और वो दिख जाते हैं तो लोग मखौल उड़ाते हैं। बेशऊर, बेसलीक़ा ठहराते हैं।
 
'नियो-नैचुरिस्ट्स' ज़माने के इसी चलन को तो चुनौती दे रही थीं। आख़िर औरत पर इतना दबाव क्यों हो? वो क़ुदरतन जैसी हैं वैसी ही दुनिया के सामने क्यों नहीं आ सकतीं? उन पर बनावटी होने का दबाव क्यों डाला जा रहा है? मीडिया में और सोशल मीडिया के हिसाब से हर वक़्त सजना ज़रूरी क्यों हो गया है? क्रिस्टीन बिनी, विल्मा जॉनसन और जेनिफ़र के उठाए इन सवालों के जवाब समाज आज तक नहीं दे पाया है।
 

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