मोदी चाय... मनमोहन कोल्ड्रिंक... सोनिया सूप...!

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को खां, ये इंडियन पोलिटिक्स का हाकर्स एंगिल हे। तूफानी मुद्दों की जहरबुझी धार अब चाय तक आन पोंची हे। एक-दूसरे पे हमलों के वास्ते सियासी बारूद तलाशते नेता एक तरफ चाय की प्यालियों में तूफान उठाने में लग गए हें तो दूसरी तरफ खुद चाय-काफी के बिरांड बनने लगे हें।

चाय-काफी बेचने वालों के लिए ये वाकई फख्र करने का मोसम हे। उनकी इत्ती पूछ- परख तो आज तक कोई चुनाव में नई हुई। देसी चाय में पीएम बनने का फिलेवर भी हो सकता हे ये तो कभी सोचा ई नई था। मगर अब उम्मीदें जाग गई हें। मामला मोदी चाय से आगे बढ़ता दिख रिया हे। चाय की ताजगी में वोटों की तलाश जारी हे।

खां, इस मुल्क में कांग्रेस 'गरीबी हटाओ' का नारा देके जब-तब चुनाव जीत जाती हे। हकूमत में आने के बाद वो इस बात का पूरा खयाल रखती हे के गरीबी कहीं हकीकत में ब्याहता बीवी की माफिक घर न छोड़ जाए। क्योंके गरीबी के बने रेने में ई हटाने का होसला भी बना रेता हे।

चुनाव जीतने का ये शर्तिया फार्मूला आजकल दूसरी पार्टियों ने भी कुछ-कुछ पकड़ लिया हे। सो, वो भी गरीबी को दाना डालते रेते हें। ये दाना चुगते-चुगते कभी वो चाय बेचने लगता हे तो कभी चाट। लेकिन गरीबी हे के जहां के तहां बनी रेती हे। उसके हटने की आस में गरीब जरूर हट जाता हे।

मियां, गरीब को लेके इसी हिकारत का जज्बा तब नुमाया हुआ, जब एक कांग्रेसी नेता ने मोदी को 'चायवाला' बताया। मोदी ने ये सोचकर के घोड़े बेचके सोने से चाय बेचके जागते रेना लाख अच्छा हे, इस ताने का बुरा नई माना। उधर चाय वालों में भी खुसर-पुसर शुरू हो गई।

चाय बेचने की बेचारगी पे अचानक कड़क चाय-सी रंगत आ गई। समझ आया के चाय की चुस्की में नेतागिरी की लज्जत हे। किस्मत मेहरबान हुई तो चाय की केतली भी पीएम की चाहत का प्याला भर सकती हे। भोपाल की नमक डली सुलेमानी चाय मशहूर हे। अब सियासी चाय में भी यह उम्मीदों का नया नमक हे।

दरअसल, मुल्क के रहनुमा इन नेताओं को भी कभी अंदाज नई रिया होगा कि उनकी मेहनत कभी चाय-काफी की शकल भी अख्तियार करेगी। बात मोदी चाय की चटकाने वाली बात से शुरू हुई थी, अब दूर तलक जाएगी।

सुनने तो ये भी आ रिया हे के डायबिटीज वालों के वास्ते बिना शकर की राहुल चाय ओर 'सबकी पसंद' शिवराज कॉफी भी धड़ल्ले से बिक रई हे। ये सिलसिला अभी ओर जोर पकड़ सकता हे। कल को मनमोहन कोल्ड्रिंक, सोनिया सूप, आडवाणी काढ़ा, केजरीवाल जल-जीरा टाइप बिरांड भी सियासी ठेलों पे बिक सकते हें।

वेसे इस फेहरिस्त में नेताओं की निजी पसंद के मुताबिक इसमें भांग घोटा, दारू ओर मधुर मुनक्का के आयटम भी जोड़े जा सकते हें। लेकिन वो मुद्दा आगामी चुनावों में बनने का इमकान हे।

बहरहाल, चाय की इस चालू सियासत से मल्टीनेशनल वाले डरे हुए हें। खतरा इंटरनेशनल मार्केटिंग पे लोकल बिरांड की दबंगई का हे। हर चाय बेचने वाला अगर इसी चमक के साथ धंधा करने लगा तो 'ऊपर' से उतारे हुए बिरांडों का क्या होगा?


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