देहरी के अक्षांश पर : नारी मन को सुव्यक्त करती कविताएं

देहरी के अक्षांश पर.....यह शीर्षक है संवेदनशील और प्रखर युवा लेखिका डॉ. मोनिका शर्मा के काव्य संग्रह का। नारी अंतर्मन की धूप-छांव को उकेरती सुंदर कविताओं के इस संकलन की कोमल दस्तक का साहित्य संसार में दिल से स्वागत हुआ है।   

इनमें गृहणी के मन और जीवन का संवेदनशील यथार्थ है। यह कविता संकलन हर स्त्री के जीवन का देखा-जिया और भोगा सच है, जिसे लेखिका ने सधे हुए शब्दों में ढालकर चिंतनपरक बना दिया है। संकलन की रचनाओं में ऐसे कई प्रश्न शामिल हैं, जो हमें नारी के नाजुक मन की कच्ची देहरी के भीतर झांकने को बाध्य करते हैं। 
 
कविताओं में जीवन के ऐसे कई अनकहे-अनछुए पहलू हैं, जो स्त्री को उसकी हर भूमिका में असाधारण बनाते हैं। 
 
साधारण स्त्री की असाधारण भूमिका को प्रतिबिम्बित करती हैं यह कविताएं एक खूबसूरत प्रयास है अविराम गतिशील गृहणी की दिनचर्या में झांकने का। जिसकी व्यस्तता और जटिल भूमिका दोनों को हम जानते-समझते हुए भी अनजान बने रहते हैं। यही वजह है यह कविताएं मन के कहीं भीतर तक उतर कर असर करती हैं। 
 
सबके जीवन को सहज और सरल बनाने के प्रयास में गृहणी के एक भीतर कितना कुछ बनता-बिगड़ता, बिखरता-संवरता है, इसका बोध किसी को नहीं होता। पुस्तक में प्रस्तुत रचनाओं के भाव यह बात बहुत सहजता और सार्थकता के साथ कहते हैं। मन की ना कह सकने वाली गृहणी के मौन को शब्द और मंच देती हैं कवयित्री की भावुक कविताएं।  
      
पुस्तक में शामिल कविताएं गंभीर वक्तव्य नहीं लिए हैं पर सहजता से स्त्री जीवन से जुड़ी गहन बातों को सामने रखती हैं। मां पर लिखी रचनाएं जहां मर्म को छूती हैं वहीँ बेटियों पर लिखी रचनाएं मजबूती की प्रेरणा देती है। पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ी होने के कारण कवयित्री की रचनाएं प्रश्न भी उठाती हैं और चिंतन भी सुव्यक्त करती हैं।
 
 साहित्यकार नंद भारद्वाज ने उनके लिए लिखा है, मोनिका शर्मा की कविताएं अपने पहले ही पाठ में बांध लेने की अनूठी क्षमता रखती हैं। अपने समय और समाज को लेकर कितना कुछ विलक्षण और विचारणीय कहने की समझ और सलीका है उनके पास। एक ओर जहां स्‍त्री को लेकर हमारी समाज-व्‍यवस्‍था की जकड़बंदी को लेकर उनके भीतर गहरी अन्तर्वेदना और छटपटाहट है, घर-परिवार और सामाजिक नियम-कायदों में एक मानवी के रूप में स्‍त्री के विकास की सारी संभावनाओं को अवरुद्ध कर देने की पीड़ा है, वहीं दूसरी ओर इस बात का अहसास भी कि उसे घर-परिवार और जीवन को सहेजने संवारने की अपनी वृहत्तर भूमिका भी निभानी है। 
 
वह जितनी अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित दिखाई देती है, उतनी ही इस बात को लेकर आत्मसजग भी कि उसे सारी विरोधी स्थितियों के बीच किस तरह अपना रास्‍ता बनाना है, उसे स्‍वाभिमान के साथ अपना जीवन जीना है और एक मानवी के रूप में विकसित भी होना है। बहुत-सी ऐसी बातें भी हैं जो सामान्य कथन की तरह हम आम तौर पर कहते सुनते आए है, पर ऐसा भी बहुत कुछ है, जो नितान्त नया और अनकहा है। कविताओं के बीच से गुजरते हुए यह अनुमान कर पाना मुश्किल नहीं है कि अभी उन्‍होंने बहुत कुछ कहने से अपने को रोक भी लिया है। शायद उपयुक्त समय पर और कहना जरूरी लगे। 


 
गृहणी के संघर्ष और उससे जुड़ी भाव-भूमि पर जो अन्य कविताएं हैं, चाहे वे मां पर केन्द्रित हों, बेटी पर हों या सामान्य स्‍त्री पर, वे प्रकारान्तर से उस लंबी कविता का ही विस्‍तार हैं, जिसमें हर नारी  स्वयं को एक स्त्री होने के नाते केवल देह तक समेटने वाले भावों और विचारों से परे देखना चाहती है। हमारे ही परिवेश और परिवार के विन्यास को रेखांकित करती इन कविताओं में सृजित आम से भाव भी विशेष प्रभाव रखते हैं, जो  मर्मस्पर्शी भावबोध लिए हैं।   
 
पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त तथा प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सक्रिय रूप से जुड़ीं मोनिका, महिलाओं और बच्चों से जुड़े सार्थक विषयों और समसामयिक मुद्द्दों पर नियमित रूप से लेखन कर रही हैं। उनकी कविताओं में पत्रकारिता के तेवर और कुशल संप्रेषण कला का संयोजन स्पष्ट नजर आता है।  
 
 पुस्तक :  देहरी के अक्षांश पर
कवयित्री : डॉ. मोनिका शर्मा 
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन 
संस्करण -प्रथम
 
मूल्य : 120 रुपए 

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