कविता : कासा थामें चला कलंदर

WD

नरपत आशिया"वैतालिक"
 
कासा थामे चला कलंदर
चौखट, गांव, गली, दर, घर-घर!
सहरा, जंगल, परबत,बस्ती,
गाहे-गाहे मंजर मंजर!











बाहर-बाहर दिखै भिखारी,
भीतर- भीतर शाह सिकंदर!
रेत कौड़ियां गौहर मछली
अपने भीतर लिए समंदर!
 
खोजे क्यूं जा-जाकर बाहर,
जब रब बैठा उसके अंदर!
 
कतरा-कतरा बरसा उस पर,
कैसे कह दूं उसको बंजर!
 
नरपत तुझमें कौन समाया,
इत्र-इत्र सा रहे तरबतर!

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