मार्मिक कहानी : समाधि‍

प्रलय ही आ गया था जैसे। किसी ने शायद ही कभी प्रलय देखा था, लेकिन हर कोई कह रहा था प्रलय आ गया है। जो बुजुर्ग थे बता रहे थे कि उन्होंने ऐसी घनघोर बारिश पिछले साठ बरसों में नहीं देखी थी। बच्चे डर भी रहे थे और बारिश का मजा भी ले रहे थे। मजा तो यह था कि स्कूलों की छुट्टी कर दी गई थी। लेकिन दानवी शक्ल के काले बादलों की गड़गड़ाहट के बीच बिजली चमकती, तो वे सिहर जाते थे। दिन के अभी बारह भी नहीं बजे थे, लेकिन अंधेरा ऐसा हो गया था जैसे शाम के सात बज गए हों।

 
ऐसे में रहमान ने किसी तरह अपने को फटी बरसाती से थोड़ा बचा रखा था। हाथ में औजारों की पेटी लिए, सड़क के गड्ढों से बचता-बचाता वह कोठी की ओर चला जा रहा था। ठाकुर साहब का हुक्म टालने का तो वह कभी सोच ही नहीं सकता था। न सिर्फ पुरानी बरसाती उनकी दी हुई थी,  बल्कि कई बार ठाकुर साहब ने उसकी बहुत मदद भी की थी। और आज जब उनका संदेशा आया तो, उसने मौसम की परवाह किए बगैर तुरंत कोठी का रुख कर लिया था।
 
ठाकुर साहब बड़े अफसर थे और हर तरह से बड़े थे। उनके पिताजी भी बड़े अफसर रहे थे, उनकी कोठी बड़ी थी, नाम बड़ा था, शरीर भी कोई पचासी-नब्बे किलो का रहा होगा। ठाकुर साहब नगर पालिका के स्वच्छता अधिकारी या शिक्षा विभाग के निरीक्षण अधिकारी की तरह केवल नाम के अफसर नहीं थे। वे अफसर शब्द का बोझ ढोते नहीं थे बल्कि उसे जीते थे। उनकी अफसरी का आभा मंडल उनके साथ-साथ चलता था। ठाकुर साहब में वे सब गुण थे, जो किसी अफसर को बड़ा अफसर बनाते हैं। मसलन वे इतने सख्त थे कि दफ्तर में उनके कैबिन के आगे से भी गुजरने से कर्मचारी कतराते थे। उनकी मौजूदगी मात्र से दफ्तर के सारे काम-काज बड़े व्यवस्थित रूप से चलते-होते दिखाई देते थे।
      
लेकिन बहुत से ऐसे कारण भी थे जिनके कारण ठाकुर साहब की दफ्तर की सख्ती घर-परिवार में विनम्रता की गंगा बन जाती थी। अफसरी के पहाड़ को घर में अक्सर पिघलते देखा जा सकता था। यों तो रहमान को उनके दफ्तर में मरम्मत आदि के काम से बुलाया जाता था, मगर ठाकुर साहब की कोठी पर जरूरत होती तो वहां भी वह पहुंच जाता था। धीरे-धीरे जैसे वह ठाकुर साहब की कोठी का ही एक कर्मचारी हो गया था। शौकीन तबि‍यत के तो थे ही ठाकुर साहब और रहमान मुर्गा साफ करने पकाने में भी माहिर था। पार्टियों आदि में उसके पकाए मुर्गे की बड़ी तारीफ होती थी। आज कोठी ही पहुंचना था रहमान को।
 
आज कोई दावत आदि भी नहीं होनी थी...फिर क्यों बुलवाया था ठाकुर साहब ने...अब तो सूमो भी नहीं है कोठी में..रहमान सोंचने लगा। कहीं ऐसा तो नहीं, कि बारिश को देखते हुए गोष्ठी वगैरह का इंतजाम करना हो। शायर-लेखक आ रहे हों...महफि‍ल जमने वाली हो कोठी पर...साहित्य और कला से ठाकुर साहब का विशेष लगाव रहा था। कभी-कभी उन्हें अफसोस भी होता था कि वे इस महकमे में गलत आ गए हैं। उन्हें तो किसी कॉलेज में हिन्दी का प्रोफेसर होना था या किसी कला अकादमी का अध्यक्ष, मगर ऐसा होता कहां हैं। वे यह सोंचकर संतोष कर लेते थे कि यह केवल उनके साथ तो नहीं हो रहा। जिन्हें परचून की दूकान में पुड़ि‍या बांधना था, वे कालिदास और शेक्सपियर पढ़ा रहे थे। जिन्हें ठेकेदारी करते हुए सड़कें बनानी थीं, वे प्रजातंत्र की बिसात पर शतरंज खेल रहे थे। इसलिए उन्होंने अपने को कुछ ऐसे एडजस्ट कर लिया था, कि अब वे एक तरफ सख्त अफसर थे, तो दूसरी तरफ एक संवेदनशील कवि और कलाप्रेमी व्यक्ति की छवि शहर के प्रबुद्ध वर्ग में बनाने में सफल हुए थे।
 
कोठी अभी दूर थी। बारिश जरूर कम हुई, लेकिन हवा बहुत तेज चल रही थी। रहमान की बरसाती थोड़ी-सी और फट गई इस हवा में। किसी तरह वह सड़क किनारे ‘साहित्य भवन’ के बरामदे में बरसाती को ठीक से अपने शरीर पर लेने के लिए आ खडा हुआ। साहित्य भवन के निर्माण में भी ठाकुर साहब की महती भूमिका रही थी। ठाकुर साहब के प्रयासों से नगर की कला और साहित्यिक संस्थाओं को लगातार सहयोग मिलता रहा था।उनके कहने भर से स्मारिकाओं और फोल्डरों के लिए विज्ञापनों और प्रायोजकों की व्यवस्था बड़ी आसानी से हो जाया करती थी। अनियतकालि‍क तथा अव्यावसायिक लघु मगर महत्वपूर्ण साहित्य पत्रिका ‘साहित्य ऋतु’ के वे अवैतनिक व आजीवन प्रधान संपादक भी थे। बाकी संपादन का जहां तक सवाल है कवि ‘निडर’ जी सब देख लेते थे। निडर जी उनके महकमें के हिन्दी अधिकारी थे।
 
‘ठाकुर साहब जैसे मर्मज्ञों के कारण ही साहित्य और कलाओं को प्रोत्साहन मिलता है’, इस एक वाक्य के निरंतर उपयोग से नगर को ‘साहित्य भवन’ उपलब्ध हुआ था। जिसमें साहित्य और कला का सरंक्षण हो रहा था, गोष्ठियां हो रही थीं। बेशक, अध्यक्षता करना ठाकुर साहब की एक बड़ी जिम्मेदारी हुआ करती थी।
 
बारिश फिर तेज हो गई थी। साहित्य भवन पर रहमान अब ज्यादा रुक नहीं सकता था। वह सड़क पर आ गया। सूमो होता, तो आज बारिश में कितना मजा करता वह... रहमान को भी भीगते हुए दौड़ लगानी पड़ती उसके पीछे-पीछे। उसके ही बस में था सूमो। बहुत प्यार करते थे साहब सूमो से। यों अफसरों के कुत्ता-प्रेम के अनेक किस्से प्रचलित हैं, मगर सूमो और ठाकुर साहब की बात ही कुछ और थी। नगर के लोग भी सूमो से बहुत प्यार करते थे। जितना साहब से करते उतना सूमो से भी करते। ठाकुर साहब लोगों की कमजोरी थे और सूमो ठाकुर साहब की कमजोरी था। कहा जाता है, ठाकुर साहब के सूमो से अनुराग के बड़े गहरे कारण थे।
 
दरअसल सूमो के पूर्वज ठाकुर साहब के ससुराल पक्ष के थे। जब ठाकुर साहब का प्रेम विवाह हुआ था, तब मैडम अपने साथ एक गर्भवती कुतिया भी लेती आईं थी। कालांतर में इधर बाबा का जन्म हुआ उधर सूमो धरती पर अवतरित हो गए। एक संयोग और घटित हुआ, सूमों के जन्म के तेरह दिन पहले मैडम के पिताजी हृदयाघात से चल बसे। मैडम के मन में कुछ ऐसी बात जम गई कि वे सूमो में अपने डैडी की छवि देखने लगीं। मैडम की खुशी साहब की खुशी। ठाकुर साहब अपने और कुतिया के पिल्ले से सामान रूप स्नेह करने लगे।
 
नगर के लोग साहब और सूमो के जरिये नगर को संवारने में लगे हुए थे। कुत्ता शहर में साहब की तरह ही लोकप्रिय हो गया था। जैसे शहर की जान उस कुत्ते में आ बसी थीअ कला और साहित्य जैसी विधाओं का विकास हो ही रहा था, कि अचानक नगर को गहरे आघात का सामना करना पड़ा।एक सुबह सूमो अपने घर में मरा हुआ पाया गया। यह रहस्य ही था कि उसने आत्महत्या की या किसी दुश्मन ने उसकी हत्या कर डाली थी।
 
बरसात में भीगते हुए रहमान के भीतर भी संवेदनाओं की बरसात हो रही थी। कैसा गमगीन दिन था वह...सूमो के असामयिक निधन से न सिर्फ मैडम और साहब पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, नगर के लोग और संस्थाएं भी उनके दुःख में उनके सहभागी बने हुए थे।
 
जैसे-जैसे कुत्ते के निधन की खबर फैल रही थी, नागरिकों की भीड़ भी कोठी में जमा होती गई। एक-एक करके लोग शव के करीब जाते और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर कुछ ऐसे लौटते कि उनका गमगीन चेहरा किसी तरह मैडम और साहब की नजरों में आ जाए। कुछ संस्थाओं ने तो सूमो पर ’पुष्प-चक्र’ भी अर्पित किए, ज्यादातर ने फूल मालाएं चढ़ाई। दुख की घड़ी में बहुत देर तक किसी को ध्यान ही नहीं रहा कि शव का अंतिम संस्कार भी किया जाना है। शव को इस तरह तो रखा नहीं जा सकता। साहब से बात की गई, उन्होंने मैडम को रेफर किया। पहले तो मैडम सूमो को अपनी आंखों के सामने से हटाने को तैयार ही नहीं हुईं, लेकिन जब उन्हें लगा कि कब तक ऐसी ही बैठी रहेंगी, किटी पार्टी और शॉपिंग के लिए भी देर हो रही है सो वे अंतत: राजी हो गईं।
 
सूमो को पूरे सम्मान के साथ कोठी परिसर में दफना दिया गया। दो मिनट के मौन के बाद श्रद्धांजलि दी गई। दुखी मन से लोग अपने-अपने घर लौट गए थे। मगर साहब के मन में भावनाओं का ज्वार बहुत देर तक उठता रहा।
 
रहमान कोठी पहुंच गया था। गेट पार कर वह अब सूमो की समाधि के सम्मुख था। उसे याद है सूमो की तेरहवी के दिन मार्बल और ग्रेनाईट पत्थरों से निर्मित उसकी समाधि का लोकार्पण साहब के करकमलों से ही हुआ था। आज तेज बरसात में वह भीग रही थी।
 
कोठी के पोर्च में साहब खड़े थे, रहमान को देखा तो बोले - ‘रहमान, ये कुछ चद्दरें मंगवाईं हैं, इन्हें सूमो की समाधि पर लगाना है...बरसात से बेहाल हो रही है..हो सके तो आज ही लगा दो।’ ‘जी, साहब’ कहकर वह अपने काम में जुट गया। बारिश अब कम हो गई थी।
 
कोई चार घंटों में अपना काम ख त्म करके वह घर पहुंचा तो उसकी आंखें फटी रह गईं। नाले के किनारे बनी उसकी झोपड़ी तेज बहाव में बह गई थी। यास्मिन किसी तरह नाले के बीचों-बीच मलबे पर खड़ी, ठिठुरती बकरी को बचाने के प्रयास में जुटी थी।

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