अर्धनारीश्वर के बहाने बदलते जमाने के फसाने

सृष्टि के आगे बढ़ने में स्त्री और पुरुष की भूमिका है। पूरी तरह आधी-आधी। जितना हिस्सा पुरुष का उतना ही स्त्री का। यह एक सच्चे दंपति का, एक सही परिवार का, एक सभ्य समाज का रूपक है। पर जैसे ही इनके गुणों की अभिव्यक्ति ‘मानव मानक’ के घट-बढ़ को बिगाड़ दे तो वो इंसान समाज में हंसी का पात्र हो जाता है। खासकर पुरुषों में स्त्रियोचित गुणों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तरीकों को ले कर।

अनेक ‘उपनामों’ के साथ उनका उपहास करना, ‘अपशब्दों’ से उनकी पहचान रखना, अनेक संबोधनों का सृजन कर उनके नामों को बिगाड़ना। महिला चरित्रों को आदर्श मानने वाले, उनके गुणों का महिमामंडन करने वाले और उससे भी बढ़ कर “अर्धनारीश्वर” के आराधक भी इसमें खुद के मनोरंजन के लिए शामिल होते हैं। 
 
आजकल रील, टिकटोक, यू-ट्यूब और भी न जाने क्या क्या नित नए माध्यम पैदा हो रहे जिनमें लड़के-लड़कियां अपनी भरपूर फूहड़ता के साथ साथ अपनी छबि को भी नर-नारी के अलावा अजीबोगरीब एप के इस्तेमाल से प्रस्तुत कर रहे। जिसमें लड़के तो चुटकी बजाते ही बेहद खूबसूरत, कमसिन, नाजुक लड़कियों में तब्दील होते, नाचते कमर मटकाते, लटके झटके देते, अदाएं मारते नजर आते हैं। ये सब करना उन्हें भरपूर प्रसिद्धी और पैसा भी दे रहा है। इसके बावजूद इनका “परिवार का नाम रोशन करते कुलदीपक” के केप्शन से मजाक उड़ाया जाता है। महिलाओं की तरह नाचना इनको कलंकित करता है। इनके वीडियो आज भी हास्य का विषय हैं।
आधुनिक युग में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसे तथाकथितरूप से केवल महिलाओं के लिए निर्धारित माना जाता रहा उसमें पुरुषों का जबर्दस्त दखल न हो।रसोई से लेकर बिस्तर तक में उपस्थिति है।सामाजिक महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में, उत्सव, त्यौहार, फैशन, लालन-पालन और तो और स्त्रीरूप धरकर राष्ट्रीय- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तगड़ा पैसा कूट रहे हैं। देवियों की अपनी शक्ति है।मैक्सिको की अनाज की देवी, टोंगा द्वीपसमूह की आलोआलो, ग्रीस की दिमित्तर, रोम की देवी सेरीस। सब देवियां हैं। अपने यहां भी अन्नपूर्णा को जोड़ सकते हैं। मैंने कहीं पढ़ा कि इतिहासकारों का कहना है कि कृषि की‌ खोज पुरुषों ने नहीं, स्त्रियों ने की है। वे ही समझ सकती थीं धरती के गर्भ में बीज के जाने का असर। कथा कहती है कि जब ब्रह्मा ने सृष्टि की, तो वह उतनी‌ कि उतनी ही रह गयी। उसमें प्रवाह नहीं था वह आगे नहीं बढ़ रही थी। तब शिव ने अपना अर्द्धनारीश्वर रूप प्रकट किया। यह नर-नारी के संयोग का रूपक है।
 
 ईश्वर की अनगिनत छबियों योद्धा, प्रेमी, पालक, संहारक सुरूप, विरूप, प्राकृतिक, अप्राकृतिक सब मिले, लेकिन अर्द्धनारीश्वर कहीं नहीं मिला। कौन पुरुष है जो जीवन संग्राम में पत्नी से कहे कि चलो संग प्रस्थान करें? पुरुष का अहं इससे आहत होता है। संग्राम में स्त्री से सहायता? कभी नहीं। यह संयोग नहीं है कि शक्ति की परिकल्पना शिवा (भद्रकाली) से ही जुड़ती है।अन्य कौन-सी देव-पत्नी इस तरह याद आती है?
 
अपनी भक्ति में कोई अर्द्धनारीश्वर शिव का जितना बड़ा भक्त हो, उसे किसी अन्य प्रसंग में कहिए कि वह तो आधा औरत दिखता है।वह तिलमिला जाएगा। वह कैसे स्वीकार कर सकता है? वह छाती पीटकर बताएगा, कोई दुस्साहस कर बताएगा कि वह तो मर्द है, मर्द। उसमें औरत का अंश देख लेना उसकी बेइज्जती है, क्योंकि हमारा समाज पूरी तरह इस छवि को स्वीकार भी नहीं सका।
 
अनेक युगल छवियों में इतना एकाकार और कहां? उसपर यह समानता। शंखचूड़ के युद्ध करने जाते शिव का प्रसंग याद आता है। वह अपने गणों के बाद शिवा(भद्रकाली?) को भी प्रस्थान करने को‌ कहते हैं। एक तरफ़ उलझे जटा-जूट, दूसरी तरफ घनी रेशमी घुंघराली लम्बी काली केशराशि। एक तरफ त्रिनेत्र पालित ललाट, एक तरफ़ सिंदूर तिलकित चमकता भाल। एक ओर भस्म-अर्चित, दूसरी ओर चंदन-चर्चित। एक तरफ़ चौड़ा वृषभ-स्कंध, दूसरी तरफ़ साड़ी में छिपा रम्य सुकोमल कंधा। एक तरफ पत्थर-सी मांसपेशियों की मज़बूत मछलीदार बांह, दूसरी तरफ कोमल और गोल सुगढ़ बाहु।एक तरफ सर्प और रुद्राक्ष, दूसरी तरफ़ स्वर्ण और मोती की माला। एक तरफ विस्तृत खुला वक्ष, दूसरी तरफ उन्नत उरोज।एक तरफ़ मृगचर्म तो दूसरी ओर पीत चुनरी।मनोहारी छबि पर कौन न मुग्ध होगा?
 
तो बंद कीजिए अपने कटाक्ष, जनाना-मरदाना का मखौल उड़ाना, उनकी बेइज्जती करना, उनका जीना दूभर करना। वे भी इंसान हैं।जमाना बदल रहा है।पति अपनी पत्नी के लिए करवाचौथ का व्रत भी रख रहा है। जागिए...समझिए...ज़माने की रग पकड़िए और जियो और जीने दो की तर्ज पर जिंदगी आसान कीजिए। 

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