विपक्षी एकता की राह में कई तरह के अगर-मगर

अनिल जैन

बुधवार, 9 मई 2018 (18:16 IST)
अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कुछ प्रमुख क्षेत्रीय दलों के बीच भाजपा और कांग्रेस से इतर तीसरे मोर्चे या कि फेडरल फ्रंट को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है। इस सिलसिले में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पिछले दिनों तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव से मुलाकात कर लंबी बातचीत की है।
 
 
राव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पिछले 1 महीने से तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद में जुटे हुए हैं। इस सिलसिले में चन्द्रशेखर राव ने 10 मई को हैदराबाद में इन सभी नेताओं की औपचारिक बैठक बुलाई है। इस बैठक के लिए बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती को भी बुलाए जाने की संभावना है। तीसरे मोर्चे के गठन की दिशा में पहलकदमी कर रहे नेताओं की कोशिश भाजपा के असंतुष्ट नेताओं का समर्थन हासिल करने की भी है। इस सिलसिले में पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा और अरुण शौरी की ममता बनर्जी से मुलाकात हो चुकी है।
 
तीसरा मोर्चा या विकल्प बनाने की कवायदें हर लोकसभा चुनाव के पहले इसी तरह होती रही हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब अपने-अपने हितों को लेकर एकजुट होने वाले विपक्षी दल तात्कालिक स्वार्थों के फेर में एकता को तोड़ने में जरा भी मुरव्वत नहीं दिखाते। इसीलिए आज तक कोई तीसरा विकल्प स्थायी शक्ल नहीं ले पाया। इस समय भी तमाम क्षेत्रीय नेताओं की गतिविधियों और बयानों को फौरी तौर पर देखा जाए तो लगता है कि बस तीसरा मोर्चा अब बनने ही वाला है, लेकिन हकीकत में मामला इतना आसान नहीं है। 
 
देश की राजनीति में तीसरे मोर्चे की अवधारणा का उदय 1989 के लोकसभा चुनाव के समय हुआ था। उस समय भाजपा को उसके उग्र हिन्दुत्ववादी आग्रहों के चलते बाकी गैरकांग्रेस दलों ने राजनीतिक तौर पर अछूत मान लिया था। उस समय भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस से विद्रोह कर बाहर आए विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में जनता दल का गठन हो चुका था जिसका उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, ओडिशा, कर्नाटक, हरियाणा आदि राज्यों में खासा जनाधार था। इस नाते वह तीसरे मोर्च की धुरी था। उसकी अगुवाई में ही दक्षिण और पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय दलों ने मिलकर राष्ट्रीय मोर्चा बनाया था। वह राष्ट्रीय मोर्चा भाजपा और वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन से अल्पकाल के लिए सत्ता में भी आया, लेकिन सत्ता से हटते ही बिखर भी गया।
 
उस प्रयोग के बाद 1996 के आम चुनाव के बाद एक बार फिर गैरकांग्रेस और गैरभाजपा दलों का संयुक्त मोर्चा बना। उस मोर्चे की धुरी भी जनता दल ही था। वह मोर्चा भी सत्ता में आया लेकिन थोड़े ही समय बाद न सत्ता रही और न ही वह मोर्चा रहा। सिर्फ संयुक्त मोर्चा ही नहीं बिखरा बल्कि उसकी धुरी बना जनता दल भी कई टुकड़ों में बिखर गया। इस प्रकार देश में अखिल भारतीय स्वरूप वाली 2 ही पार्टियां रह गईं- कांग्रेस और भाजपा। अन्य क्षेत्रीय दल अपनी सुविधा के मुताबिक इन्हीं दोनों पार्टियों की छतरी तले बनने वाले गठबंधन में अपना ठौर तलाशते रहे।
 
अभी जो क्षेत्रीय पार्टियां तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिशों में जुटी हैं, वे सभी अपने-अपने सूबे में असर रखने वाली पार्टियां हैं। उनमें एक भी पार्टी ऐसी नहीं है जिसका कि अपने सूबे से बाहर थोड़ा भी जनाधार हो। फिर इन पार्टियों में कोई ऐसा नेता भी नहीं है जिसका नेतृत्व सबको सहज रूप से स्वीकार हो जाए। ऐसे में तीसरे मोर्चे की कवायद के परवान चढ़ने को लेकर शंका करने की पूरी-पूरी गुंजाइश बनती है।
 
विपक्षी खेमे में इस वक्त कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसकी सत्ता महज 4 राज्यों तक सिमट जाने के बावजूद उसकी मौजूदगी अखिल भारतीय है और इस नाते व्यापक और कारगर विपक्षी एकता की धुरी भी वही बन सकती है। हालांकि ऐसी किसी एकता में भी कई पेंच हैं। जो पार्टियां तीसरा मोर्चा बनाने के लिए आतुर हैं उनमें ज्यादातर ऐसी हैं, जो कांग्रेस से हाथ नहीं मिला सकतीं, क्योंकि उनके अपने राज्यों में ही उन्हें चुनावी दो-दो हाथ कांग्रेस से ही करना है।
 
लेकिन हैरानी की बात कि जिन पार्टियों के साथ कांग्रेस का सीधा मुकाबला नहीं होना है, उनको साथ लेकर भी वह नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिए उत्साहित नजर नहीं आ रही है जबकि वह ख्वाब बुन रही है 2019 में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का। गुजरात के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन तथा कुछ उपचुनावों में मिली जीत से शायद कांग्रेस के रणनीतिकार बौरा गए हैं। उन्हें लगता है कि विभिन्न मोर्चों पर नाकाम रही मोदी सरकार से हताश-निराश जनता एक फिर कांग्रेस को अपनाने को बाध्य हो जाएगी और चुनाव बाद जरूरत पड़ने पर बाकी विपक्षी दलों की भी मजबूरी हो जाएगी कि वे कांग्रेस की छतरी के नीचे आ जाएं। कांग्रेस की यही सोच उसे विपक्षी एकता की दिशा में पहलकदमी करने से रोके हुए है।
 
कोई 3 महीने पहले कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ देने के बावजूद सोनिया गांधी ने जरूर विपक्षी एकता को लेकर 18 दलों की बैठक बुलाकर यह संकेत देने की कोशिश की थी कि कांग्रेस विपक्षी एकता को लेकर गंभीर है। लेकिन उनकी वह पहल भी शरद यादव और शरद पवार जैसे नेताओं के दबाव का ही नतीजा थी। उस बैठक में शामिल सभी विपक्षी नेता इस बात तो एकमत थे कि एकता होनी चाहिए, मगर इस एकता को व्यावहारिक कैसे बनाया जाए, उसकी धुरी और स्वरूप क्या हो, इन सवालों पर कोई चर्चा नहीं हुई। जब तक सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष थीं, तब तक यह सवाल गौण था, लेकिन पार्टी की कमान राहुल गांधी के हाथों में आने के बाद स्थिति बदल गई है। वैसे सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का मुखिया होने के नाते व्यावहारिक तौर पर विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व का दावा तो राहुल का ही बनता है। लेकिन उनको नेता मानने के मामले में कुछ विपक्षी क्षत्रपों का अहम आड़े आता है।
 
गठबंधन की राजनीति को लेकर कांग्रेस के साथ एक समस्या यह भी है कि वह आमतौर पर उन्हीं राज्यों में गठबंधन करने की इच्छुक रहती है, जहां वह संगठनात्मक तौर पर बहुत कमजोर है और उसका जनाधार छीज चुका है, मसलन उत्तरप्रदेश और बिहार। जिन राज्यों में उसका भाजपा से सीधा मुकाबला है, वहां सीमित प्रभाव क्षेत्र वाली छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन में उसकी कोई रुचि नहीं होती।
 
उसकी इस प्रवृत्ति का उसे अक्सर खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। इस सिलसिले में पिछले दिनों हुए गुजरात विधानसभा के चुनाव ताजा उदाहरण हैं। अगर वहां उसने शरद पवार की एनसीपी, बसपा और भारतीय ट्राइबल पार्टी के साथ ठीक-ठाक गठबंधन कर लिया होता तो वह गुजरात में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने की अपनी हसरत पूरी कर सकती थी। गुजरात जैसी गलती ही उसने असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी से गठबंधन न करके की थी और सत्ता गंवाई थी। कोई आश्चर्य नहीं कि जो गलती उसने गुजरात और असम में की उसे वह मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी दोहराए।
 
दरअसल, देश की राजनीति में गठबंधन का युग शुरू हुए लगभग 3 दशक हो चुके हैं और उसमें 10 साल तक कांग्रेस भी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर चुकी है, इसके बावजूद पिछले 5 वर्षों के दौरान जीर्ण-शीर्ण हो चुकी कांग्रेस का नेतृत्व और उसके सलाहकार अभी भी इस जमीनी हकीकत को हजम नहीं कर पा रहे हैं कि केंद्र में किसी एक पार्टी के अकेले राज करने के दिन अब लद चुके हैं। वे इस बारे में उस भाजपा से भी सीखने को तैयार नहीं है जिसने पिछले 3 दशक में अपने प्रभाव क्षेत्र का व्यापक विस्तार कर लेने के बावजूद गठबंधन की राजनीति को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। चुनाव में सीटों का बंटवारा हो या सत्ता में साझेदारी, किसी भी मामले में वह अपने गठबंधन के सहयोगियों के प्रति उदारता दिखाने में पीछे नहीं रहती।
 
बहरहाल, अगले आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकता होगी या नहीं और होगी भी तो उसकी शक्ल क्या होगी, कौन उसकी धुरी बनेगा? इन सारे सवालों का जवाब कर्नाटक के चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा। अगर वहां कांग्रेस जीतती है तो विपक्षी एकता की अगुवाई वही करेगी, अगर नतीजे उसकी उम्मीदों के विपरीत रहते हैं तो उसे अपने चुनिंदा सहयोगियों के साथ ढीला-ढाला गठबंधन करके ही लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरना होगा।
 
जहां तक तीसरे मोर्चा बनाने की कोशिशों का सवाल है, उसका भी कोई ठोस शक्ल लेना आसान नहीं है। उसके गठन में भी सबसे बड़ी बाधा नेतृत्व का सवाल ही रहेगा!

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