श्री राम वन गमन पथ यात्रा के दौरान 10 राज्यों के 200 से अधिक पवित्र स्थलों पर जाने का अवसर मिला, इन स्थलों पर श्री राम जी के चरण पड़े थे, उन पावन स्थलों की चरण रज को माथे पर लगाने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। इनमें से ऐसे 10 मंदिरों की जानकारी दी जा रही है जो अपनी विशिष्टताओं, उल्लेखनीय घटनाओं, पौराणिक महत्व, स्थान महत्व, पुरातात्विक महत्व, भव्य निर्माण व ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती है। 9 प्रदेशों के यह 10 मंदिर इसमें शामिल किए गए हैं।ALSO READ: अयोध्या से धनुषकोडी, राम वन गमन पथ की यात्रा, 45 दिन, 8700 किलोमीटर
मध्यप्रदेश के खरगोन निवासी शिक्षाविद दिलीप कर्पे और उनकी पत्नी स्वाति ने अयोध्या से धनुषकोडी तक राम वनगमन पथ की 45 दिनों में 8700 किलोमीटर की यात्रा की थी। इस यात्रा के मार्ग में उन्होंने श्रीराम से जुड़े सैंकड़ों प्राचीन स्थानों के दर्शन किए। इन्हीं में से राम के मंदिरों में 10 प्रमुख मंदिरों के बारे में संक्षिप्त जानकारी।
1. श्री राम मंदिर, अयोध्या उत्तर प्रदेश:
अयोध्या जी के राम मंदिर के संबंध में हम सब जानकारी रखते हैं, मंदिर निर्माण की दो शैलियाँ हैं नागर व द्रविड़। अयोध्या में बन रहा राम मंदिर, भगवान राम की जन्मभूमि पर स्थित है, जो नागर शैली में बन रहा है। इसमें 392 खंभे और 44 द्वार हैं। मुख्य गर्भगृह में भगवान श्री राम का बाल रूप का विग्रह है। हम प्रथम तल से ऊपर 32 सीढ़ियां चढ़कर सिंहद्वार से प्रवेश करते हैं। मंदिर के परिसर में सूर्य, गणेश, शिव, दुर्गा, विष्णु और ब्रह्म देवता को समर्पित मंदिर हैं। निर्माण में ग्रेनाइट पत्थर और राजस्थान के गुलाबी बलुआ पत्थर का उपयोग किया जा रहा है। बहुत ही विशाल व भव्य मंदिर है। श्री राम जी विग्रह बहुत ही दिव्य है, यह मंदिर अपने आप मे विशिष्टता रखता है।
2. सुतीक्ष्ण मुनी आश्रम सलेहा सतना मध्यप्रदेश:
यहीं पर राक्षस विहीन करने की प्रतिज्ञा ली थी। सुतीक्ष्ण मुनी ने अपने गुरू ऋषि अगस्त्य जी को प्रभु श्री राम के दर्शन करवाये थे,इस प्रकार ब्रह्मांड में ऐसा पहला उदाहरण है जिसमें एक शिष्य अपने गुरु को ईश्वर के दर्शन करवाता है।
भुज उठाय प्रण कीन्ह
सकल मुनीन्ह के आश्रम हि
जाई जाई सुख दीन्ह।।
यहाँ पर एक श्री राम मंदिर भी बना है।
3. राम टेकरी रतनपुर, छत्तीसगढ़:
छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम कौशलपुर था। यह पावन भूमि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की माता कौशल्या की भूमि है। रतनपुर कई पहाड़ियों व तालाबों से घिरा प्राकृतिक क्षेत्र है, कई बड़े बड़े ऊँचे भव्य मंदिर हैं। पहाड़ी पर बहुत ऊंचाई पर राम टेकरी पर गिरियाबन्द हनुमानजी का मंदिर व सीता राम मंदिर भी है। कहते हैं कि यह मंदिर मराठाओं के शासन काल में बनवाया गया था। यहाँ सभी मूर्तियाँ ग्रेनाइट की है। यहाँ कई देवी देवताओं की मूर्तियाँ भी हैं, यहाँ भगवान विष्णु व काल भैरव को भी देखा जा सकता है।
4. श्री राम रेखा धाम, झारखंड:
यह स्थल झारखंड के जिला जशपुर से लगभग 45 कि.मी. की दूरी पर तथा सिमडेगा से लगभग 30 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। स्थल घोर जंगल में एक बड़े पहाड़ पर स्थित होकर अति विरान स्थान पर है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम अपने वनवास काल के समय यहाँ आए थे। दंडकारण्य के इस वीरान स्थल में श्री अग्नि जिह्वा मुनि तपस्या करते थे जो कि अगस्त्य ऋषि के गुरु भाई भी है। अग्नि जिह्वा मुनि को दर्शन देने हेतु ही श्री राम जी यहाँ आए थे। यह स्थल एक अति विशाल लंबी चट्टान से बना है जिस पर कुछ रेखाएँ देखी जा सकती है। कहा जाता है कि यह रेखाएँ श्रीराम द्वारा खींची गई थी इसलिए इस स्थान का नाम राम रेखा धाम पड़ा। यहाँ प्रभु श्री राम ने चातुर्मास भी किया था। यहाँ श्री राम दो बार आये थे, लक्ष्मण गुफा, सीता रसोई, सीता वेदी व अग्नि कुंड भी यहाँ है।
5. सीता रामचन्द्र स्वामी मंदिर भद्राचलम, आन्ध्रप्रदेश:
गोदावरी नदी के किनारे बसे भद्राचलम में श्री सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि अपने भक्त भद्र को आशीर्वाद देने के लिए स्वयं भगवान राम स्वर्ग से उतरकर नीचे आए थे। भगवान राम ने भद्र को आश्वासन दिया था कि वे इसी जगह पर अपने श्रद्धालुओं के बीच मौजूद रहेंगे। तभी से इस जगह का नाम भद्राचलम पड़ गया। यह मंदिर भगवान विष्णु के प्रमुख अवतार राम को समर्पित है। इसे भद्राचलम या भद्रगिरि, भद्राद्री के नाम से जाना जाता है। तीर्थ क्षेत्र गोदावरी के दिव्य क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यह दक्षिण की अयोध्या के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता अनुसार पास में पर्णशाला है। यहीं तीनों ने लम्बा समय गुजारा था। यहाँ सुंदर पर्णकुटी भी है और बड़ी चट्टान भी, जिस पर श्री राम जी विश्राम करते थे।
6. श्री राममंदिर कन्दकुर्ति तेलंगाना:
गोदावरी हरिद्रा एवं माजरा नदी के त्रिवेणी संगम पर एक प्राचीन स्कंद आश्रम है जहाँ पर कंदा देवी (पार्वती) का एक मंदिर है, जिनके नाम पर ही इस गांव का नाम कंटकूर्ती हुआ है। मान्यता अनुसार इस स्कंद आश्रम में श्री रामजी वनवास काल में आए थे। यहाँ एक प्राचीन राम मंदिर भी है तथा एक शिव मंदिर भी है। यह एक अति प्राचीन मंदिर है।
यहाँ के पंडित श्री योगेश हारगे जी जो आठवीं पीढ़ी के पुजारी हैं, ने बताया कि यह तीन सौ साल पुराना मंदिर है इसकी सेवा का कार्य श्रीधर स्वामी को स्वप्न में स्वयं श्री राम जी ने सौपा था। यहाँ की मुर्ति रामजी ने स्वयं बनाई है। इस संदर्भ में एक कथा बताते हुए वे कहते हैं कि रामजी के मंदिर निर्माण की सामग्री थी, पर कोई मूर्तिकार नहीं मिल रहा था। तब एक दिन दो व्यक्ति आए और बोले कि "हम मूर्तिकार हैं, उत्तर से आए हैं हम यहाँ श्री राम, लक्ष्मण जी और सीताजी के साथ हनुमानजी जी की मूर्तियाँ बना देवेंगे।' साथ ही उन्होंने सचेत किया कि "इस कक्ष को सात दिनों के लिए बंद कर दें, कोई भी यहाँ प्रवेश न करें। पानी का एक घड़ा भरकर दे देवें'। ग्राम वासियों ने ऐसा ही किया। परन्तु चार दिवस बीतने पर भी किसी प्रकार की कोई आवाज नहीं आ रही थी, ग्रामवासी चिंतित हो गए। न भोजन पानी की मांग आई तब पुजारी जी ने दरवाजा खोला तो वहाँ श्री राम, माता सीता व लक्ष्मण जी की मूर्तियाँ तो पूर्ण थी पर हनुमान जी की मुर्ति अपूर्ण थी और वहाँ कोई नहीं था। रात में पुजारी जी के स्वप्न में आकर भगवान ने कहा कि सात की जगह चौथे दिन पट खोले इसलिए मुर्ति अपूर्ण रही। आज भी उस मंदिर में हनुमानजी की मुर्ति की पूंछ नहीं है। जब हम मंदिर में दर्शन करने गए तो इतनी सुंदर संगमरमर की मूर्तियाँ देखकर मन प्रसन्न हो गया।
7.रामटेक स्थित राम मंदिर, रामगिरी-अर्थात गडमंदिर रामटेक:
रामटेक महाराष्ट्र के नागपुर के पास है। राम टेकरी पर स्थित रामटेक में जो मंदिरों का क्रम है वह अपने आप में क्रमबद्ध है। सबसे पहले गणेश जी, फिर हनुमान जी, फिर लक्ष्मण जी और अंत में सीताराम जी का मंदिर है। गणेश शुभता के प्रतीक है तो हनुमान जी सुरक्षा का, लक्ष्मण जी सुरक्षा की दूसरी चौकी है और अंत में श्री राम जानकी जी का मंदिर है जिनकी रक्षा हेतु यह अद्भुत है। यहाँ पर कौशल्या माता का मंदिर भी है, प्रभु श्री राम को जन्म देने वाली जननी का यह मंदिर देखकर अच्छा लगा। सीता जी का और राम जी का अलग-अलग स्नान कुंड है। राम कुंड का पानी केवल बारिश में कुछ समय भरा रहता है, बाद में सूख जाता है तो सीता माता का कुंड ऊँची पहाड़ी पर स्थित होने के बावजूद उस कुंड में पूरे वर्ष पानी भरा रहता है। यहाँ पर ऋषि-मुनियों के कई सारे आश्रम है। यहाँ पर अगस्त्य ऋषि का आश्रम भी है। हमने मठ में अखंड ज्योति देखी। त्रेतायुग के समाप्ति काल में याने साढ़े नौ लाख वर्ष पूर्व भगवान श्री रामचंद्र वनवास मे भ्रमण कर रहे थे उस समय रामगिरी पर आये थे। यहाँ अगस्त मुनी का आश्रम भी था।
8. कालाराम मंदिर,नासिक महाराष्ट्र:
श्री राम, लक्ष्मण एवं सीताजी ने गोदावरी के किनारे पर स्थित इसी पंचवटी में उनके चौदह वर्षों के वनवास का समय बिताया। इस चौदह वर्षों के बनवास की अवधि में दस वर्ष के पश्चात करीबन ढाई वर्ष श्री प्रभुराचंद्रजी इसी परिसर में रहे है। ऐसी मान्यता है, कालाराम मंदिर में तीन मूर्तियाँ स्वयंभू है और काली रेत से बनी हुई और श्यामवर्ण होने के कारण इसे कालाराम कहा जाता है। श्री छत्रपति शिवाजी महाराज के आदिगुरू श्री समर्थ रामदास स्वामीजी की इस मूर्ति पर अगाध श्रध्दा थी। श्री समर्थ रामदास स्वामी टाकली में रहते हुए बारह वर्षों तक प्रति दिन मंदिर आते और इसी मूर्ति की उपासना करतें । यह काल इ.स. 1620 से 1632 तक। और इसी मूर्ति का श्री समर्थ रामदास स्वामी को साक्षात्कार भी हुआ।
वनवास में रहते हुए श्री रामचंद्रजीका निवास स्थान होने से पवित्र होने के कारण उसी स्थान पर मंदिर बनाया गया आज जहाँ एक नयनरम्य मंदिर है पहले वहाँ लकड़ी का छोटा सा मंदिर था। यही मूर्ति प्रतिस्थापित थी। यह मंदिर शिल्पकला का अद्भुत नमुना है। मंदिर का निर्माण 1780 मे प्रारंभ हुआ और 1792 में बनकर तैयार हुआ।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारूतिर्यस्य तं वंदे रघुनन्दनम्।।
रामरक्षा के श्लोक के अनुसार गर्भगृह में श्री प्रभु रामचंद्र उनके दाये और लक्ष्मण और बाईं और सीताजी की मूर्ती है और ठीक सामने श्रीराम जयराम जय जय राम का जाप करते हुए प्रभु सेवक महाबली हनुमानजी खड़े हैं। ऋषि मुनियों के अनुरोध पर, खर, दुषण आदि चौदह हजार राक्षसों का वध कर इस तपोवन को भय मुक्त किया था और शरणागत मुनियों को अभय दिया और उसी स्वरूप में खड़े हुए श्री प्रभु रामचंद्रजी का दायां हाथ छाती पर और बायां हाथ सीथे स्वयं के चरणों की और है।
सकृदेव प्रपत्राय तवा स्मीतिच याचते
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतदन्व्रतं मम
अभय मुद्रा में शरणागत वत्सल्य श्री प्रभुरामचंद्र जी ऐसे समझा रहे है कि एक बार जो मेरी शरण में आकर चरणलीन होकर मुझसे रक्षा की प्रार्थना करता है ऐसे सेवक की सर्व प्राणि मात्र की रक्षा करने का वचन देता हूँ।
9. माल्यवंत रघुनाथ मंदिर, हम्पी, कर्नाटक:
कर्नाटक के हम्पी क्षेत्र प्राचीन काल में किष्किंधा कहलाता था। माल्यावंत रघुनाथ मंदिर अपने आप में बहुत विशेषताएँ लिए हुए है। यहाँ के प्रमुख पुजारी श्री मधुसूदन रामायण दास से चर्चा की। उन्होंने बताया कि सीता जी की खोज में श्री राम जी यहाँ पर आए थे और लंबे समय तक यहीं पर निवास किया था। इस मंदिर में चार मूर्तियाँ हैं जो अपनी-अलग पहचान रखती है। श्री रामजी के हाथ में हमेशा धनुष बाण रहता है, परंतु यहाँ पर वह शांत भाव से ध्यानस्थ मुद्रा में है। श्री लक्ष्मण जी के हाथ मे धनुष बाण दिखाई देता है, पर यहाँ पर वह नमस्कार की मुद्रा में हैं। जैसे श्री रामजी की बातें सुन रहे हों। हनुमान जी भी यहाँ पर चूड़ामणि लेकर के लौटे हैं और वह श्री राम जी को इस संबंध में विवरण दे रहे हैं, इस प्रकार दिखाई दे रहे हैं।
एक देवी का विग्रह है जिसे कमली देवी कहा जाता है। गुरुजी ने बताया कि यहाँ पर लंका जाने की पूरी विस्तृत योजना भी बनाई गई थी क्योंकि दोनों भाई यहाँ पर चातुर्मास किए थे। स्फटिक शिला है, जिस पर बैठकर बातें भी करते थे और वानर, रीछ, भालू आदि को निर्देश भी देते थे,कहते हैं हनुमान जी ने जब सीता माता का पता लगा लिया था तब वापिस आकर इसी शिला पर बैठे दोनों भाइयों को यह खबर दी थी।
रामनाथपुरम् के पास त्रिपुल्लाणी में स्थित है जिसे दिव्य देशम भी कहा जाता है। मान्यता है कि यह वह स्थल है जहां रामजी ने सागर के उस पार जाने के लिए दर्भ पर बैठकर मार्ग देने के लिए सागर से तीन दिन प्रार्थना की थी। किंतु सागर द्वारा मार्ग न दिए जाने पर रामजी ने सागर को सुखाने का फैसला किया था, इसलिए इस स्थल का नाम शयनम् है। श्री रामजी का किष्किंधा से वानर सेना को साथ लेकर चलने के पश्चात किष्किंधा से समुद्र तट एक इस यात्रा में यहाँ दर्भशयनम् में उनका पांचवां विश्राम स्थल रहा है। यहीं पर मारियूर शिवालय, श्री पट्टाभिशेक रामार सन्निधि व संदाल सन्निधि भी है, (सन्निधि यानी मंदिर)
- श्री दिलीप कर्पे एवं श्रीमती स्वाति दिलीप कर्पे
जनमानस में रामत्व का भाव जागृत करने के उद्देश्य से श्रीराम वन गमन पथ यात्रा, अयोध्या से धनुषकोडी करने वाले रामभक्त निवासी- खरगौन, मध्य प्रदेश।