Shravan maas 2020 : भगवान भोलेनाथ के विशिष्ट नामों की पौराणिक कथाएं

भगवान शिव शंकर के अनेक नाम हैं।  पर कोई भी नाम निरर्थक नहीं है।  सभी के साथ नाम के गुण, प्रयोजन व तथ्य भरे हैं।  सभी नाम सार्थक हैं।  उनका अर्थ सोचा जाए और उसका मूल सोचा जाए तो सभी नाम भ्रम-निवृत्ति, मोह नाश और सौभाग्य लाभादि होते है।  उनमें से कुछ नाम ये भी हैं जिनका स्मरण पुण्य हम श्रावणमास में ले सकते हैं-
 
भक्तों के समस्त पाप और त्रिताप के नाश करने में सदैव समर्थ हैं और जो समस्त कल्याणों के निधान हैं उनको “शिव” कहते हैं। 
 
जो सबको अति विशेष स्वरूप में देखते हों वे भी पशु कहाते हैं।  ज्ञानशून्य अवस्था में सभी पशु माने गए हैं ‘ज्ञानेन हीना: पशुभिस्समाना:’अतः ब्रह्मा से ले कर स्थावरपर्यंत सभी पशु माने जा सकते हैं और शिव सबको ज्ञान देने वाले तथा उनको अज्ञान से बचाने वाले हैं इसलिए यह “पशुपति” कहाते हैं। 
 
यह तय है कि मृत्यु को कोई नहीं जीत सकता।  स्वयं ब्रह्मा भी युगांत में मृत्युकन्या के द्वारा ब्रह्म में लीन होते हैं।  उनके अनेक बार लीन होने पर शिव का एक बार निर्गुण में लय होता है।  अनेक बार मृत्यु की पराजय होती है इसीलिए इन्हें “मृत्युंजय” कहते हैं। 
 
एक बार भगवन शांत रूप से बैठे हुए थे।  हिमाद्रितनया भगवती पार्वती ने विनोदवश हो पीछे से उनके दोनों नेत्र मूँद लिए पर वो नेत्र तो शिवरूप त्रैलोक्य के चन्द्र सूर्य थे। नेत्रों के बंद होते ही विश्व भर में अंधेरा छा गया। संसार अकुलाने लगा।  
 
तब शिव जी के ललाट से तीसरा नेत्र प्रकट हुआ।  उसके प्रकट होते ही दसों दिशाएं प्रकाशित हो गई। अन्धकार तो हटा ही पर हिमालय जैसे पर्वत भी जलने लगे।  यह देख पार्वती जी घबरा कर हाथ जोड़ स्तुति करने लगीं।  तब शिवजी प्रसन्न हुए और संसार की स्थिति यथापूर्व बना दी।  तभी से वे “चंद्रर्काग्निविलोचन” अर्थात् “त्रिनेत्र” कहलाने लगे। 
 
मन में प्रश्न उठता है कि शिव को गजचर्म के वस्त्र धारण करने की क्या आवश्यकता पड़ी? ऐसे वस्त्र धारण करने वालों को “कृत्तिवासा” कहते हैं।  इसकी कथा स्कन्द पुराण में मिलती है।  
 
उसमें कहा गया है कि जिस समय महादेव पार्वती को रत्नेश्वर का महात्म्य सुना रहे थे उस समय महिषासुर का पुत्र गजासुर अपने बल के मद में उन्मत्त हो शिवगणों को कष्ट देता हुआ शिव के समीप पहुंच गया।  उसे ब्रह्मा का वर था कि कंदर्प के वश होने वाले किसी से भी उसकी मृत्यु नहीं होगी।  शिव ने तो कंदर्प के दर्प का नाश किया था।  सो उन्होंने इसका भी शरीर त्रिशूल में टांग कर आकाश में लटका दिया।  उसने वहीं से भोले की स्तुति शुरू कर दी।  शिव प्रसन्न हुए वर मांगने को कहा।  इस पर गजासुर ने विनती की कि हे दिगंबर कृपा कर के मेरे चर्म को धारण कीजिए और अपना नाम “कृत्तिवासा” रखिये और भोले ने ‘एवमस्तु’ कहा। 
 
एक बार भगवान विष्णु ने किशोरावस्था का अत्यंत मनमोहक रूप किया।  उनको देखने ब्रह्मा जैसे चतुर्मुख तथा अनंत जैसे बहुमुख अनेक देवता आए और उन्होंने एक मुख वालों की अपेक्षा अत्यधिक आनंद लिया।  
 
एकमुखी शिव को बड़ा क्षोभ हुआ।  उन्हें लगा मेरे भी अनेक मुख, नेत्र होते तो मैं भी भरपूर आनंद लेता।  अधिक दर्शन करता।  बस फिर क्या था इस विचार का उदय होते ही वे पंचमुख हो गए।  प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र हो गए तभी से भोले “पंचवक्त्र” हो गए। 
 
किसी समय नर-नारायण बद्रिकाश्रम में तप कर रहे थे।  उसी समय दक्ष यज्ञ का विध्वंस कर शिव त्रिशूल नारायण की छाती भेदता हुआ वापिस शिव के पास पहुंच गया।  आकाश मार्ग से शिव जब नारायण के समीप गए तब उन्होंने शिव का गला घोंट दिया तभी से वे “शितिकंठ” कहलाने लगे। 
 
उसी अवसर पर नर ने भी परशु के आकार के एक त्रणखंड को इषिकास्त्र से अभिमंत्रित कर शिव पर छोड़ा।  शिव ने अपने महात्म्य से उसे खंड-खंड कर दिया।  तबसे शिव “खंडपरशु” कहाए। 
 
कालिकापुराण में लिखा है कि 36 कोटि प्रमथगण शिव सेवा में लीन रहते हैं।  इनमें से 13 हजार भोग विमुख, योगी व इर्ष्या आदि से रहित हैं।  बाकि के कामुक तथा क्रीड़ा विषय में सहायता करते हैं।  उनके द्वारा प्रकट में किसी का कुछ भी अनिष्ट न होने पर भी लोग उनकी विकटता से भयकंपित रहते हैं अत:शिव को “प्रमथाधिप” कहा गया है। 
 
संसार के हित के लिए त्रिभुवन व्यापिनी गंगा को भागीरथ की प्रार्थना से गौरीशंकर ने अपनी जटामंडल में धारण किया इसी से इन्हें “गंगाधर” कहा गया। 
 
संपूर्ण देवों के प्रधान होने से जो कि वेदों आदिकाल में ओंकाररूप से माने गए हैं व वेदांत में निर्गुण रूप से स्थित रहते है, वे यही शिव “महेश्वर” नाम से विख्यात हैं। 
 
दुःख और उसके समस्त कारणों का नाश करने से तथा संहारादि में क्रूर रूप धारण करने से इन्हें “रूद्र” भी जानते हैं। 
 
जिनमें पंच महाभूतों का सदैव वास हो उसे ही विष्णु कहते हैं।  यही गुण भगवान शिव में भी सर्वदा व्याप्त रहते हैं अतः गंगाधर को “विष्णु” भी कहते हैं। 
 
आर्यमा आदि पितरों के तथा इन्द्रादि देवों के पिता होने से, ब्रह्मा के भी पूज्य होने से “पितामह” नाम से विख्यात है। 
जिस प्रकार निदान और चिकित्सा के जानने वाले वैद्य उत्तम प्रकार की महाऔषधियों और अनुभूत प्रयोग से समस्त शारीरिक रोग दूर करते हैं वैसे ही भोले अपनी स्वाभाविक दयालुता से संसारियों को भवरोगों से मुक्ति दिलाते हैं।  वेदादि शास्त्रों में भी यह सिद्ध किया है कि शिव अनेक प्रकार की अद्भुत, अलौकिक और चमत्कृत कर देने वाली औषधियों के ज्ञाता व मालिक हैं।  इसीलिए ये “संसार वैद्य” के नाम से जाने जाते हैं। 
 
वैसे अविनाशी, अजर, अमर शिव के अनंत नामों से भक्तों ने अपना नाता जोड़ रखा है।  जिस भावना से आप उनको प्रेम व श्रद्धा से पुकारेंगे वे अपनी कृपा बरसा देंगे। 

नाम से भोले शिव, कर्म से भी भोले व आडम्बर रहित  हैं। बस जरूरत है प्रेम से, निश्छल मन से उनकी आराधना की जिसमें सम्पूर्ण आस्था का वास हो। वो गंगाधर अपना आशीर्वाद सृष्टि के सभी जीवों पर एक समान बरसाता है। 

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