Shri Krishna 5 August Episode 95 : जब सत्यभामा को मिलता है चिरयौवन का वरदान, नारदमुनि भर देते हैं उनके कान

अनिरुद्ध जोशी

बुधवार, 5 अगस्त 2020 (22:11 IST)
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 5 अगस्त के 95वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 95 ) में इंद्रदेव जब श्रीकृष्ण से नरकासुर के आतंक से देवलोक को मुक्त करने के लिए सहायता मांगते हैं तब श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरूढ़ पर सवार होकर उसकी नगरी प्राग्जोतिषपुर पहुंच जाते हैं और वहां भौमासुर अर्थात नरकासुर को युद्ध की चुनौती देते हैं। अब आगे....
 
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 
श्रीकृष्ण गरुढ़ से कहते हैं कि पक्षीराज तुम नरकासुर की इस नगरी को हमारे आगमन की सूचना दो। तनिक अपने पंखों की शक्ति का इन्हें आभाष कराओ। गरुढ़ ऐसा ही करता है। वह अपने पंखों से तूफान खड़ा कर देता है तो नगर में भगदड़ मच जाती है। फिर श्रीकृष्ण के पांचजन्य शंख की ध्वनि से संपूर्ण नगर हिल जाता है। नरकासुर अपने महल में यह भयानक ध्वनि सुनकर भयभित हो जाता है। वह चीखते हुए कहता है- ये किसकी शंख ध्वनि है? कौन मुझे युद्ध के लिए ललकार रहा है? किसकी मृत्यु उसे मेरे नगर तक घसिटकर ले आई है। फिर नरकासुर अपने एक दैत्य सेनापति धूमकेतु से कहता है- जाओ देखो अपने प्राणों की आहूति देने कौन मेरे नगर में आ गया है। उसे उसकी इस धृतष्टता का दंड दो, मृत्युदंड। उसके सभी सैनिक चले जाते हैं। 
 
गरूढ़ ही उन सभी सैनिकों को मार देता है। जैसे-तैसे बचकर सेनापति धूमकेतु जाकर इसकी सूचना नरकासुर को देता है कि स्वामी अनर्थ हो गया। द्वारिक के कृष्ण ने आकर हमारी सारी सेना का नाश कर दिया। यह सुननकर वह भड़क जाता है और कहता है अब मैं स्वयं ही उसका वध करूंगा। यह कहकर वह अपने गदा लेकर रथ पर सवार हो युद्ध भूमि में जाकर श्रीकृष्‍ण को ढूंढता है तब कहीं उसकी नजर आसमान में पड़ती है। यह देखकर वह भी अपनी माया से आसमान में पहुंच जाता है।
 
वह कहता है- मूर्ख कृष्ण क्या तू जानता नहीं कि देवताओं का राजा इंद्र भी मेरी भुजाओं के बल से थर्राकर भाग चुका है। क्या तुझे अपने प्राणों का भय नहीं जो अपनी भार्या के साथ अपने प्राणों की आहूति देने के लिए मेरी नगरी में आ गया है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि भयभीत तो वो होते हैं जिन्हें कोई मोह सताता है नरकासुर। हां तेरा या अट्टाहास स्वयं बता रहा है कि तू डर रहा है।
 
यह सुनकर कहता है कि देख ये देख मेरे कानों के कुंडल, इनमें संपूर्ण देवताओं का सम्मान गिरवी रखा हुआ है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं ये जानता हूं। इस पर वह कहता है- तो फिर तूने अकारण मेरी सेना का वध क्यों किया? यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि अकारण नहीं ये सब तेरे अधर्म के साथी थे। फिर श्रीकृष्ण उसके अपराध गिनाते हैं और कहते हैं कि मैं तो अधर्म का नाश करने और धर्म की स्थापना करने ही आया हूं।
 
फिर दोनों में घमासान मायावी युद्ध होता है। नरकासुर पर किसी भी अस्त्र का असर नहीं होता है। फिर नरकासुर अपनी माया से गादा को फेंककर श्रीकृष्ण के धनुष की डोर तोड़ देता है और उसकी गदा पुन: उसके पास लौट जाती है। तब श्रीकृष्ण धनुष की डोर को पुन: बांधने लगते हैं तभी नरकासुर प्रहार करता है तो उस प्रहार को सत्यभामा अपने हाथ की हथेली पर झेल लेती है जिसके कारण हथेली से लहू बहने लगता है। यह देखकर श्रीकृष्ण आखिरकार मजबूर होकर अपनी अंगुली आसमान में करते हैं और तुरंत ही उनकी अंगुलियों पर सुदर्शन चक्र घुमने लगता है।
 
यह देखकर सत्यभामा अचंभित हो जाती है और नरकासुर भयभित। वह सुदर्शन चक्र तक्षण की नरकासुर को दो टूकड़े करके पुन: प्रभु की अंगुलियों पर लौटकर अदृश्य हो जाता है। तभी श्रीकृष्ण देखते हैं कि नरकासुर का शरीर भूमि पर गिरने के पहले भूमि फटती है और उसमें उसका शरीर समा जाता है। भूमि के अंदर से एक देवी हाथों में कुंडल लेकर निकल पर आसमान में आती है और प्रभु श्रीकृष्ण को प्रणाम करके कहती हैं- मैं भूदेवी हूं, ये नरकासुर मेरा ही पुत्र था। भगवन! पूर्वकाल में आपने वराह अवतार के समय मुझे वरदान देकर ही आपने इस पुत्र को दिया था। अच्छा हुआ कि इसकी मुक्त आपके ही हाथों से हुई है। लीजिये ये कुंडल इन्हें देव माता अतिति को भेंट कर दीजियेगा। वह देवी कुंडल देकर पुन: भूमि में चली जाती है और श्रीकृष्ण वह कुंडल लेकर स्वर्ग लोग चले जाते हैं।
 
स्वर्गलोक में सभी देवता उनका सम्मान और स्वागत करते हैं। इंद्र प‍त्नी शचि भी सत्यभामा का स्वागत करती है। फिर इंद्र कहते हैं कि आपने नरकासुर का वध करके देवलोक को चिंता मुक्त कर दिया है द्वारिकाधीश। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसमें तो सत्यभामा ने भी हमारी बड़ी ही सहायता की है देवराज। यह सुनकर सत्यभामा गर्वित हो जाती है। तब इंद्र कहते हैं कि इसके लिए हम देवी सत्यभामा का भी अभिनंदन करते हैं। अब हमारी प्रार्थना है कि इस कठोर परिश्रम के बाद कुछ समय देवलोक में ही विश्राम करें। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये बातें तो बाद में होगी देवराज, इस समय तो हमें माता अदिति के दर्शन की लालसा है। हम उनके लिए कुछ भेंट लाएं हैं। इंद्रदेव कहते हैं- अवश्य। 
 
फिर वे देवमाता अदिति के महल की ओर जाते हैं तो वहां सत्यभामा को बहुत ही मनमोहक सुगंध आती है तो वह जोर-जोर से सुंघने लगती है और तब जब उनसे रहा नहीं जाता है तो वह देवराज से पूछती हैं- देवराज ये दिव्य सुगंध कहां से आ रही है? इसने मेरे शरीर को रोमांचित कर दिया है। मेरी सारी थकान चली गई।...यह सुनकर इंद्रदेव कहते हैं- देवी ये सुगंध तो हमारे पारिजात वृक्ष के पुष्पों की है। यह सुनकर सत्यभामा कहती है- पारिजात! ये पारिजात वृक्ष कहां है? तब इंद्र अंगुली से बताते हैं कि वो उस उद्यान में हमारा पारिजात वृक्ष लगा है।
 
उसे देखकर सत्यभामा कहती है मैंने पहले कभी पारिजात जैसा सुंदर वृक्ष नहीं देखा। इस पर शचि कहती हैं- तो आइये ना देखते हैं। फिर चारों उस वृक्ष के पास जाते हैं। सत्यभामा पास जाकर उस वृक्ष की सुंदरता और उसके फूलों की सुगंध से मंत्रमुग्ध जैसी हो जाती है। तब शचि कहती है- सत्यभामा हम देवताओं को इसी पारिजात ने चिरयौवन की शक्ति प्रदान की है। इन्हीं फूलों के कारण हमारी आयु कभी क्षीण नहीं होती है, हम सदैव जवान बने रहते हैं। फिर इंद्र कहते हैं कि हमें ये समुद्र मंथन से प्राप्त हुआ था। मेरी पत्नी शचि तो इस वृक्ष के नीचे ही अपनी क्रीड़ा करती हैं। इनकी ये सुंदरता इन वृक्ष के पुष्पों से ही है।
 
यह सुनकर सत्यभामा कहती हैं- यदि ये सत्य है तो आप देवता लोग ही इसका लाभ क्यों उठा रहे हैं? तब इंद्र कहते हैं- क्योंकि यह देवताओं की ही संपत्ति है। एक बार महादेव शंकर ने भी इसकी मांग हमसे की थी। परंतु हमने उनसे हाथ जोड़कर क्षमा मांग ली थी। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- संभवत: इसीलिए भगवान शिव ने माता पार्वती के लिए स्वयं एक पारिजात वन की रचना कर डाली है।
 
यह सुनकर सत्यभामा हंसते हुए कहती हैं- अपनी पत्नी की इच्छापूर्ति के लिए कौन क्या नहीं करता द्वारिकाधीश? यह सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कुरा देते हैं तब शचि कहती हैं- आपके स्वर से तो ऐसा लगता है कि आपको द्वारिकाधीश से कोई शिकायत है? यह सुनकर सत्यभामा कहती है- देवी हर पत्नी को अपने पति से कोई न कोई शिकायत रहती ही है। आप अपने मन से ही पूछ लीजिये। यह सुनकर सभी हंसने लगते हैं। फिर इंद्र कहते हैं- आइये, देवमाता आपकी प्रतीक्षा कर रही है। 
 
फिर श्रीकृष्ण देवमाता से मिलते हैं तो देवमाता कहती हैं- तुमने नरकासुर का वध करके देवलोक के सम्मान की रक्षा की है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह तो मेरा धर्म था। नरकासुर के वध में सत्यभामा भी मेरे साथ रही है। यह सुनकर देवमाता कहती है कि तो मैं सत्यभामा की भी आभारी हूं। इस पर सत्यभामा कहती हैं- इसमें आभार की क्या बात है, यह तो मेरा धर्म था देवमाता। फिर सत्यभामा श्रीकृष्ण की ओर देखकर कहती है- प‍त्नी तो सदैव पती की सहायक होती है। फिर सत्यभामा श्रीकृष्ण के हाथों से कुंडल लेकर देवमाता को देते हुए कहती हैं कि आपके ये कुंडल द्वारिकाधीश उस पापी से वापस ले आएं हैं। 
 
देवमाता ये कुंडल लेकर प्रसन्न हो जाती है और कहती है कि इसके लिए मैं तुम्हें किन शब्दों में धन्यवाद दूं? मैं तुम्हारी पति भक्ति से प्रसन्न हूं इसलिए मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूं कि तुम देवलोक की देवांगनाओं की तरह अक्षय यौवन की स्वामिनी बनोगी। जब तक तुम मृत्युलोक में रहोगी बुढ़ापा तुम्हें स्पर्श भी नहीं करेगा। यह सुनकर सत्यभामा अतिप्रसन्न हो जाती है और देवमाता के चरणों में झुक जाती है।
 
इस पर शचि सत्यभामा से कहती हैं- धन्य है देवमाता। ऐसा आशीर्वाद किसी पृथ्‍वीवासी को नहीं दिया जैसे आपको दिया है। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- सचमुच युद्ध का असली फल तो तुम्हें ही मिला है सत्यभामा। 
 
फिर सत्यभामा और श्रीकृष्ण देवलोक से पुन: द्वारिका लौट आते हैं। रुक्मिणी श्रीकृष्ण का स्वागत करती है। उसके बाद श्रीकृष्ण बताते हैं कि किस तरह सत्यभामा ने युद्ध में साथ दिया और बाद में देवमाता ने प्रसन्न होकर उन्हें चिरयौवन बने रहने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर रुक्मिणी मुस्कुराते हुए कहती हैं- अरे वाह! यह तो बड़ी अच्छी बात है। अब निश्चय ही सत्यभामा इस पृथ्‍वी पर अपने समान किसी को भी नहीं समझेंगी, आपकी लीला बड़ी अद्भुत है प्रभु। यह कहकर रुक्मिणी हंसने लगती है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- हंस क्यों रही हो रुक्मिणी मैं तुम्हारे लिए उस दिव्य पारिजात का एक पुष्प लाया हूं। यह सुनकर रुक्मिणी प्रसन्न हो जाती है। फिर श्रीकृष्ण वह पुष्प बताकर कहते हैं- जिसके कारण चिरयौवन की प्राप्ति होती है। यह देख और सुनकर रुक्मिणी प्रसन्न हो जाती है तब श्रीकृष्ण उस पुष्प को रुक्मिणी के बालों में लगा देते हैं। 
 
फिर रुक्मिणी कहती हैं कि इसे देखकर सत्यभामा की प्रतिक्रिया क्या होगी ये सोचा है आपने? यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं प्रतिक्रिया क्या होगी उसे तो पहले ही चिरयौवन होने का आशीर्वाद मिला है। देवलोक से लौटते वक्त मुझे एक पुष्प देवराज ने भेंट किया था सो मैंने तुम्हें दे दिया। अब इसमें किसी को कुंठित होने की कौनसी बात हो सकती है। तब रुक्मिणी कहती हैं- भोले मत बनिये द्वारिकाधीश आपने मुझे ये पुष्प देकर मुझे भी स्पर्धा में खड़ा कर दिया है। वैसे भी सत्यभामा का अहंकार कुछ कम था क्या। हम तो उस दिन उसके अहंकार को नष्ट करने के बात कर रहे थे परंतु आपने ये सब लीला रचाकर उसके अहंकार को और भी बड़ा दिया है लीलाधर। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि परंतु तुम मेरे बारे में सबकुछ जानती हो। तब रुक्मिणी कहती हैं- हां आप किसी के अहंकार का हरण करने के पहले उसके अहंकार को चरम तक ले जाते हैं। सत्यभामा के इस वक्त पांव तो धरती पर पड़ नहीं रहे होंगे। वह तो खुशी के मारे पागल हो रही होगी। 
 
उधर, सत्यभामा अपनी दासियों को खुश होकर देवलोक की घटना बताती है और वह अपने चिरयौवन के वरदान की बात बताती है और कहती है कि अब में कभी बूढ़ी नहीं हो सकती, सदा जवान रहूंगी। संसार की किसी भी स्त्री को अपने रूप और सौंदर्य को स्थिर रखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है मेरे अतिरिक्त।
 
तभी वहां पर नारदमुनि प्रकट हो जाते हैं- नारायण नारायण करते हुए। सभी दासियां उन्हें प्रणाम करके वहां से चली जाती हैं तब सत्यभामा प्रणाम करती हैं और कहती हैं- पथारिये मुनिराज सत्यभामा का प्रणाम स्वीकार करें। यह सुनकर नारदजी कहते हैं- देवी सत्यभामा आज इतनी प्रसन्न दिख रही हैं, हां देवलोक की यात्रा करके जो लौटी हैं। यह सुनकर सत्यभामा गर्व से देवमाता के वरदान को बताती हैं और कहती हैं कि अब इस धरती पर मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं। तब नारदजी कहते हैं- अच्छा अच्छा तो ये बात है परंतु... यह सुनकर सत्यभामा कहती है परंतु क्या?
 
तब नारदजी कहते हैं कि परंतु यही की प्रभु जब देवलोक से लौट रहे थे तो देवराज ने उन्हें पारिजात का एक पुष्प भी तो भेंट किया था। यह सुनकर सत्यभामा कहती है पारिजात का पुष्प? तब नारदजी कहते हैं- हां प्रभु की लीला भी बड़ी ही विचित्र है। कभी असमानता नहीं रखते। उन्होंने आपको चिरयौवना होने का आशीर्वाद दिलवा दिया और देवी रुक्मिणी को पारिजात पुष्प भेंट कर दिया..नारायण नारायण। 
 
यह सुनकर सत्यभामा अचंभित होकर पूछती है- द्वारिकाधीश ने पारिजात का पुष्प दीदी को भेंट किया? तब नारदमुनि कहते हैं- हां पारिजात का महत्व जानती हैं देवी? ये पुष्प जिसके पास रहता है उसे संसार के हर वैभव, सुख, संतान, मान, यश और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। चिरयौवना का आशीर्वाद तो उसे सहज ही मिल जाता है देवी। यह सुनकर सत्यभामा सन्न रह जाती है।... फिर आगे नारदमुनि कहते हैं कि द्वारिकाधीश ने वह पुष्‍प स्वयं रुक्मिणी को भेंट किया है। इस तरह प्रभु ने अपनी दोनों पटरानियों को चिरयौवना बना दिया है। आपको चिरयौवना होने की बधाई हो देवी। वाह प्रभु वाह..नारायण नारायण। यह कहकर नारदमुनिजी चले जाते हैं। 
 
सत्यभामा के मन में तो जैसे आग लग जाती है। उसके मन में कई तरह के विचार आते हैं। वह सोचती है कि द्वारिकाधीश सबसे अधिक मुझसे प्रेम नहीं करते हैं फिर वह सोचती है नहीं यदि ऐसा होता तो वह मुझे अपने साथ युद्ध पर नहीं ले जाते। वह इस उलझन में पड़ जाती है कि द्वारिका सबसे अधिक रुक्मिणी से या सबसे अधिक मुझसे प्रेम करते हैं? फिर वह तय करती है कि उन्होंने तो रुक्मिणी को एक ही पुष्प दिया है मैं तो उनसे पारिजात का वृक्ष पृथ्‍वी पर ले कर रहूंगी। 
 
फिर सत्यभामा अपने शयनकक्ष में बाल खोलकर कोपित होकर लेट जाती है। पलंग के आसपास सबकुछ बिखरा-बिखरा रहता है। श्रीकृष्‍ण उसके पास पहुंचकर पूछते हैं- ये मैं क्या सुन रहा हूं सत्यभाम कि तुम्हें पारिजात का वृक्ष चाहिए। सत्यभामा क्रोधित होकर कहती हैं- हां पारिजात का वृक्ष चाहिए। तब श्रीकृष्ण उसके पास बैठकर कहते हैं- परंतु पारिजात का वृक्ष तो देवलोक के नंदनवन में है। यह सुनकर सत्यभामा कहती हैं- हां उसी पारिजात के वृक्ष को देवलोक से आपको पृथ्‍वीलोक पर लाना पड़ेगा मेरे लिए। 
 
यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि सत्यभामा मैं तुम्हें प्रसन्न देखना चाहता हूं परंतु... तब सत्यभामा कहती है कि परंतु-वरंतु कुछ नहीं बस मुझे पारिजात का वृक्ष चाहिए। मैं आपकी मधुर मुस्कान के वश में नहीं आने वाली हूं। आपने मेरे साथ अन्याय किया है। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं अन्याय? मैंने तुम्हारे साथ अन्याय किया है? तब सत्यभामा कहती हैं- हां आपने अन्याय ही नहीं छल कपट भी किया है।
 
यह सुनकर श्रीकृष्ण हंसते हुए कहते हैं- छल कपट और तुमसे। यह सुनकर सत्यभामा कहती हैं- देखिये वासुदेव मुझे और ना चिढ़ाइये। कहीं क्रोध में आकर मैं ऐसा-वैसा ना कह दूं। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- मैं जानता हूं तुम्हारे क्रोध को तभी तो मैं समझाने आया हूं। यह सुनकर सत्यभामा कहती है कि मुझे समझाने की कोशिश मत कीजिये। मैं सब समझ गई हूं आपको भी और आपके झूठे प्रेम को भी। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसका तो अर्थ ये हुआ कि तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है। यह सुनकर सत्यभामा कहती है- विश्वास है तभी तो आपने मेरे विश्वास पर आघात किया है। 
 
यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- विश्वासघात किया है? अच्छा तो तुम ये बताओ की तुम्हें ये सब ज्ञान किसने दिया है महारानी। मैंने तो सदैव धर्म का ही पालन किया है और तुम मेरी धर्मपत्नी हो। फिर तुम्हारे साथ अधर्म का व्यवहार मैं कैसे कर सकता हूं? यह सुनकर सत्यभामा कहती है- आप वाक् चातुर्य में मुझे नहीं बहला सकते। बातों-बातों में दूसरों को प्रभावित कर लेने की कला में आप बड़े चतुर हैं और आपकी इन सब बातों में आकर मैं अपने इस प्रण से नहीं मुकर सकती, इतना जान लीजिये द्वारिकाधीश। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि अच्छा तो अब बताओं की मुझे करना क्या होगा? तब सत्यभामा कहती हैं- यही कि पारिजात का वृक्ष लाकर केवल मुझे ही भेंट करना होगा। जय श्रीकृष्णा।  
 
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