पुण्यतिथि विशेष: गुरु हरि किशन कौन थे, जानें 'बाल गुरु' का सिख धर्म में योगदान

WD Feature Desk

बुधवार, 1 अप्रैल 2026 (10:03 IST)
Guru Har Krishan Sahib life history: गुरु हरि किशन जी सिख धर्म के आठवें गुरु थे और उन्हें सिखों में करुणा और सेवा का प्रतीक माना जाता है। उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन और योगदान को याद करना बेहद महत्वपूर्ण है। जब चेचक यानी Smallpox और हैजे की महामारी फैली हुई थी, तब उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना पीड़ितों की सेवा की। आइए विस्तार से जानें:ALSO READ: Hanuman Jayanti 2026 Remedies: हनुमान जयंती पर करें ये प्रमुख 5 अचूक उपाय, चमत्कार होगा
 
 

यहां उनके जीवन और सिख धर्म में उनके अद्वितीय योगदान का विवरण दिया गया है:

 

* गुरु हरि किशन/ गुरु हरिकृष्ण साहिब जी: संक्षिप्त जीवन परिचय

 
जन्म: 1656 ई. (कीरतपुर साहिब)
 
पिता: गुरु हर राय जी (सातवें गुरु)
 
माता: माता किशन कौर जी
 
गुरु काल: सिर्फ 5 साल की उम्र में, 1661 से 1664 ई.
 
ज्योति जोत (पुण्यतिथि): 1664 ई. (दिल्ली), उम्र मात्र 8 साल 
 

सिख धर्म में योगदान

 

1. करुणा और सेवा का प्रतीक

गुरु हरि किशन जी ने बहुत ही कम उम्र में ही मानवता और सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने लाहौर और दिल्ली में रोगियों की सेवा की, खासकर चमड़ी के रोग (smallpox) और पानी से होने वाले रोगों के समय। 
 

2. सिख धर्म में शिक्षा और अनुशासन

उनके समय में उन्होंने सिखों को सच्चाई, नैतिकता और करुणा का पाठ पढ़ाया।
 

3. समाज सेवा

गुरु हरि किशन जी ने गरीबों और बीमारों के लिए सिख सेवा-आधारित अस्पताल और जलाशय (water wells) बनवाए, ताकि लोगों को राहत मिल सके। दिल्ली में जिस स्थान पर वे रुके थे, आज वहां भव्य 'गुरुद्वारा बंगला साहिब' स्थित है। माना जाता है कि उस समय उनके स्पर्श और अरदास से बीमार लोग ठीक होने लगे थे।
 

4. शांति और धर्म की रक्षा

उन्होंने समाज में शांति और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया और लोगों को भेदभाव से दूर रहने की शिक्षा दी।
 

5. अगले गुरु का संकेत

अपने अंतिम समय में, जब संगत ने अगले गुरु के बारे में पूछा, तो उन्होंने केवल 'बाबा बकाला' कहा। इसका अर्थ था कि अगले गुरु (गुरु तेग बहादुर जी) बकाला गांव में मिलेंगे। इस तरह उन्होंने सिख पंथ को सही मार्गदर्शन दिया। जब दूसरों की सेवा करते-करते गुरु जी स्वयं चेचक की चपेट में आ गए। उन्होंने हंसते-हंसते इस कष्ट को स्वीकार किया ताकि मानवता का भला हो सके। मात्र 8 वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया, जो इतिहास में बलिदान की एक अनूठी मिसाल है।
 

विशेष मान्यता

सिखों की दैनिक अरदास में एक बहुत प्रसिद्ध पंक्ति आती है
:
'श्री हरिकृष्ण ध्याइये, जिस डिट्ठे सब दुख जाए।'
अर्थात: गुरु हरिकृष्ण जी का ध्यान करो, जिनके दर्शन मात्र से ही सारे दुख दूर हो जाते हैं।
 

विशेष ध्यान देने योग्य बात

 
* गुरु हरि किशन जी की उम्र बहुत कम थी, फिर भी उन्होंने मानवता और सेवा का ऐसा उदाहरण पेश किया कि आज भी सिख धर्म में उनका स्मरण आदर के साथ किया जाता है। उन्हें सिखों में 'छोटा गुरु, बड़ा साहस' के रूप में याद किया जाता है।
 
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