ऑल इंडिया मुशायरा-2013 : कुछ नम भी रही अदब की कामयाब महफ़िल

उज्जैन। हर बरस की तरह इस दफ़ा भी सहने-उज्जैन ने अपनी गोद में अदब की महफ़िल आरास्ता करने की पूरी तैयारी कर ली थी। मुक़द्दस क्षिप्रा की मौजों ने भी तरन्नुम में पिरोए नग़मों और ग़ज़लों के नशेबो-फ़राज़ पर बेतहाशा झूमने के लिए अपने कनारों से इजाज़त ले ली थी। मौसम भी कई रोज़ पहले से ख़ुशगवार रहने का अहद कर चुका था। लिहाज़ा, चांद की सरपरस्ती में सितारे भी लुत्फ़ अंदोज़ होने को बेक़रार थे।

सर्द रात की नमी से नम मिट्टी भी अपनी तहों में दिलकश ख़ुशबू का समंदर दबाए बैठी थी। मगर...मगर सारी तैयारियों को जैसे ऐन रोज़ गहन लग गया। इसी रोज़ अदब की इमारत का एक मज़बूत सुतून मेराज फैज़ाबादी की शक्ल में मुनहदिम हो गया था। अपने कुनबे के इस मुहतरम और मुश्तहर साथी के चले जाने से अदबी हल्क़ा ख़ासे सदमे में था।

हालांकि प्रोग्राम मुक़र्रर था, सो हुआ और हर तरह से कामयाब भी रहा। क्षिप्रा की मौजें झूमीं, मौसम साज़गार भी रहा। चांद-सितारों ने भी पलकें झपक-झपक कर मुशायरे का लुत्फ़ उठाया। पता नहीं इन्होंने शौअरा इकराम का भरम रक्खा या सचमुच प्रोग्राम की सताईश की लेकिन प्रोग्राम के इख्तिताम तक आते-आते शब से रहा न गया और वो अश्क बार हो गई। लोगों ने शायद अश्कों को ओस का क़तरा समझा हो, लेकिन शिकस्ता दिल ख़ूब समझता है फ़र्क़, ओस और अश्क में।

ये तमाम मंज़रकशी है उज्जैन के कार्तिक मेला मैदान में नगर निगम की जानिब से मुन्अक़िद ऑल इंडिया मुशायरे की। इंतिज़ामात का ज़िम्मा सम्हाल रहे शायर अहमद रईस निज़ामी की गुज़ारिश पर मक्बूल शायर डॉ. नवाज़ देवबंदी ने सदारत का सेहरा क़ुबूल किया। वहीं निज़ामत के फ़राइज़ की डोर कुंवर जावेद के हाथ दी गई। रस्मन आगाज़ नात शरीफ़ से हुआ, जिसे पढ़ने का शरफ़ डॉ. देवबंदी को हासिल हुआ। उन्होंने पढ़ा कि-

'अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम शाहे ज़ीशान को, शाने कुरआन को, रूहे ईमान को, रब के मेहमान को अस्सलाम...'


जयपुर के शायर रज़ा शैदाई को यह शरफ़ मिला। उन्होंने ख़ुदावंदा करीम की परस्तिश यूं कि-

'वो क्यूं ना मांगे ख़ुदा से दुआ मदीने की,
के जिसकी रूह को छू ले हवा मदीने की...'

फिर मुशायरे का आगाज़ करते हुए निज़ामत सम्हाल रहे कुं. जावेद ने अमरावती के ख़ालिद नय्यर को दावते सुख़न दी। नय्यर ने हिदायत देता हुआ कलाम पढ़ा कि-

'उसी से मांगो जो क़िस्मत उजाल देता है,
अमीरे शहर तो बहला के टाल देता है
वो आज़माता है इंसां को ऐशो-ग़म देकर,
कभी उरूज, कभी ज़वाल देता है।'

इस बार आवाज़, स्टेज की सबसे कमसिन शायरा फतेहपुर की गुले सबा के नाम थी। उन्होंने तरन्नुम में पढ़े अपने कलाम से सबको चौंका दिया। उन्होंने कहा कि-

'इन चांद सितारों में उजाले न रहेंगे,
जिस रोज़ तेरे चाहने वाले न रहेंगे
पथरीला मेरे घर का बहुत रस्ता है लेकिन,
तुम आओगे तो पांव में छाले न रहेंगे'

और यह पढ़कर भी ख़ूब दाद बटोरी कि-

'दिल में कभी अपने उतरने नहीं देते,
मरना भी अगर चाहूं तो मरने नहीं देते
जो मेरे लिए रहते थे बेचैन हमेशा,
अब अपनी गली से वो गुज़रने नहीं देते
क्या दर्द है सीने में, सबा किसको बताएं,
वो दर्द का इज़हार भी करने नहीं देते।'

इसके बाद एक गीत पढ़कर उन्होंने अपनी जगह ली।

उनकी जगह सम्हाली भोपाल से तशरीफ़ लाए विजय तिवारी ने और आते ही छा भी गए। उन्होंने फ़रमाया कि-

'वहमो गुमां का अक्ल पे पर्दा पड़ा तो है,
वर्ना कुरआने पाक में सबकुछ लिखा तो है
रखता हूं मैं भी ख़ाना-ए-काबा की आरज़ू,
मोमिन नहीं तो क्या हुआ, दिल में ख़ुदा तो है।'

और इस शेर पर सद्रे मुहतरम डॉ. नवाज़ देवबंदी ने हार पहनाकर विजय तिवारी की हौसला अफ़्ज़ाई की। बाद इसके उन्होंने कई कलाम पेश किए और सामिईन को दीवाना कर दिया। कई कलाम पढ़ने से पहले उन्होंने लोगों को मश्विरा भी दिया कि इसे एसएमएस बना लीजिए, काम आएंगे। देखिए एक बानगी-

'अगर आपको दिल लगाना नहीं था,
हमें देखकर मुस्कुराना नहीं था
तुम्हें सब मेरे नाम से छेड़ते हैं,
जो ये बात थी, तो बताना नहीं था
वो आए भी तो सिर्फ़ इतना बताने,
ना आने का कोई बहाना नहीं था'

तिवारी के इस कलाम ने भी ख़ासा माहौल बना दिया कि-

'सीने में तूफ़ान दबाना पड़ता है,
आंखों को अंजान बनाना पड़ता है
उनका क्या है निकल पड़े हैं बेपर्दा,
हमको तो ईमान बचाना पड़ता है।'

इसके बाद भी तिवारी काफी देर तक जमे रहे।

अबकी बार माइक पर नक्हत अमरोहवी के नाम की सदा आई। इस ख़ूबसूरत शायरा ने अपने कलाम, अपनी पुरकशिश आवाज़ और ग़ज़लसराई के अंदाज़ से अदब के मैयार को सम्हाले रक्खा। मुलाहज़ा कीजिए-

'ग़मे हयात, ग़मे दिल, ग़मे फ़िराक़ नहीं,
बिछड़ गए हैं, तो मिलने का इश्तियाक़ नहीं
मेरी गली से गुज़रते हो अजनबी की तरह,
ये इंतिक़ाम की साज़िश है, इत्तिफ़ाक़ नहीं
तुम्हारी याद का दीपक कहां करूं रौशन,
मेरी हयात के कमरे में कोई ताक़ नहीं
क़दम बढ़ाओ मुहब्बत में एहतियात के साथ,
तमाम उम्र का बंधन है ये, मज़ाक नहीं
क़ुबूल कर लो ऐ नक्हत ख़ुलूस के साथ,
तुम्हारे प्यार का तोहफ़ा है ये, तलाक नहीं।'

इजाज़त लेने से क़ब्ल भी नाज़िम-ए-मुशायरा और सामिईन के पुरज़ोर इसरार पर नक्हत ने अपना मशहूर गीत भी सुनाया, जिस पर मजमा झूम-झूम गया। मुखड़ा देखिए-

'मैं तुझको सिखाऊं प्यार, अरे रे बाबा ना बाबा,
कोशिश है तेरी बेकार, अरे रे बाबा ना बाबा...'

इस बीच कलाइयों पर कसी घड़ियों ने नीम रात होने का इशारा किया और इसी वक्त डाइज़ के इकलौते मज़ाहिया शायर, जनाब मशहूर शाजापुरी माइक पर पहुंचाए गए। उनकी आवाज़ और लहजे से भी समझा जा सकता है कि वो मज़ाहिया कलाम ही पेश करेंगे। अपनी परेशानियों से भी उन्होंने हंसाने की काविश की। उन्होंने कहा कि-

'तेल से मिट्टी के क्या बेकार गाड़ी हो गई,
हमको भी आड़ा कर दिया और ख़ुद भी आड़ी हो गई
लड़की पैदा होने पे नाराज़ वो बीवी से थे,
भैंस से वो ख़ुश हुए जब उसका पाड़ी हो गई।'

तंज़-ओ-मिज़ाह् के फौरन बाद जिन्हें दावते-सुख़न दी गई, उन्होंने अपनी बलंद आवाज़ से सारा आलम जगा दिया।

इस बार माइक पर थे शहरे-अदब लखनऊ के शाइर सैफ़ बाबर। कई ज़बरदस्त कलाम सुनाए उन्होंने। उसमें से एक-

'तुम समझते हो के हम ज़ुल्म से डर जाएंगे,
ज़ुल्म का सर ही कुचल देंगे, तो घर जाएंगे
मेरे ईमान की ताक़त का है कुछ अंदाज़ा,
फूंक देंगे तो तेरे जैसे बिखर जाएंगे।'

रंजना सिंह 'हया' ने ग़ज़ल के हवाले से जो मिसरे पढ़े, उस पर उन्हें ख़ूब दाद मिली। आप भी लुत्फ़अंदोज़ होईए-

'बात बिगड़े तो बनाने को चली आऊंगी,
किसको इंकार है आने को, चली आऊंगी
उम्रभर साथ निभाने का तू वादा कर ले,
छोड़कर सारे ज़माने को, चली आऊंगी।'

और इस पर भी नज़र डालिए कि-

'मलाल दिल को तेरे होगा मेरे जाने से,
ना छुप सकेगा तेरा दर्द मुस्कुराने से
बिछड़ के तुझसे कभी फिर कहीं मिलूं न मिलूं,
मुझे तू रोक ले नादां किसी बहाने से।'

अबकी बार बारी थी, 2004 में इसी तारीख़ी शहर उज्जैन से अपने सफ़र का आगाज़ करने वाले दिल्ली के शायर आदिल रशीद की। उन्होंने भी अपने कलाम से महफ़िल को गर्माए रक्खा और बारहा दाद-ओ-तहसीन हासिल करते रहे। उन्होंने ये कह कर आग लगाई कि-

'हम जो एक पल को किसी ग़ैर के शाने लग जाएं,
तो मेरी जान तेरे होश ठिकाने लग जाएं
उससे कहना कि निगाहें भी नहीं उठ सकतीं,
हम जो अपने कभी एहसान गिनाने लग जाएं।'

और इस चालबाज़ी के भी क्या कहने, कि-

'कितना मुश्किल सवाल पूछ लिया,
तुमने फिर हालचाल पूछ लिया
हम भी उस्ताद थे सरे महफ़िल,
आंखों-आंखों में हाल पूछ लिया।'

अब सादगी की ये इंतिहा भी देखिए। वो कहते हैं कि-

'जाते हुए मुझसे निगाहें न बदल,
कल तुझे मुझसे कोई काम भी पड़ सकता है,
दर्द तो तय है, मेरे साथ ही जाएगा मगर,
तुम चले आओ तो आराम भी पड़ सकता है
तुम तो तफ़रीह में कह देते हो पागल मुझको,
रफ़्ता-रफ़्ता ये मेरा नाम भी पड़ सकता है।'


अब सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए गुलाबी शहर, जयपुर के शायर रज़ा शैदाई को पुकारा गया। बा-कमाल तरन्नुम के इस शाइर ने क्लासिकल अंदाज़ में ग़ज़ल पढ़कर दौरे-माज़ी की याद दिला दी-

'हुस्न वो क्या जो लाजवाब न हो,
इश्क़ वो क्या जो कामयाब न हो
हम उसे मैकदा नहीं कहते,
जिसमें मस्ती भरी शराब न हो।'

अपनी परेशानियों का मुज़ाहरा भी उन्होंने किया और वो भी शायरी के लहजे में। यूं किया कि-

'मेरी रूदाद सुनकर क्यूं किसी को इतनी हैरत है,
कहानी फिर कहानी है, हक़ीक़त फिर हक़ीक़त है
बक़ैदे होश तो मुमकिन नहीं फ़ुर्सत ज़माने में,
ज़रा दीवाना हो जाऊं, तो फिर फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है।'

फ़ेहरिस्त में अगला नाम बुरहानपुर से तशरीफ़ लाए कम्माल के शायर नईम अख्तर का था। लिहाज़ा, सद्रे मुहतरम की सदा पर इस मर्तबा वो रूबरू थे। बहुत देर तक सुनाया उन्होंने। कुछ ख़ास कलाम आपकी नज़्र हैं-

'उसे हर रुख़ से तोड़ा जा रहा है,
मगर आईना हंसता जा रहा है
हम अपनेआप में सूरज हैं फिर भी,
अंधेरा हम में ढूंढा जा रहा है
ज़माने पर भरोसा करने वालों,
भरोसे का ज़माना जा रहा है
तेरे चेहरे में ऐसा क्या है आख़िर,
जिसे बरसों से देखा जा रहा है।'


दराज़उम्र शाइर हैं, लिहाज़ा शायरी में पिरोकर तज़्रुबा भी इश्तिराक करते चले। कहा, यूं कि-

'तरक्कियों की दौड़ में उसी का ज़ोर चल गया,
बना के अपना रास्ता जो भीड़ से निकल गया
सुलग उठेंगे जाने कितने दिल हसद की आग में,
अगर हवा के रूबरू मेरा चराग़ जल गया।'

अबकी बार खड़ी हुईं डॉ. नुसरत मेहंदी, जिन्होंने भोपाल से शिरकत की थीं। उन्होंने भी बड़ी देर तक ख़िदमात को अंजाम दिया। उन्हीं में से एक कलाम-

'कतरा के ज़िंदगी से गुज़र जाऊं, क्या करूं,
रुस्वाइयों के ख़ौफ़ से मर जाऊं, क्या करूं
मैं क्या करूं के तेरी अना को सुकूं मिले,
गिर जाऊं, टूट जाऊं, बिखर जाऊं, क्या करूं

इसी बीच अब बारी उनकी थी, जिन्हें छोटे माइक से उठकर बड़ा माइक सम्हालना था। लिहाज़ा, निज़ामत कर रहे कुँ. जावेद अब अपने दूसरे फ़र्ज़ के लिए मंज़रे-आम पर थे। उन्होंने अर्ज़ किया कि-

'दिया बनूं तो पतंगा नसीब हो मुझको,
नहाना चाहूं तो गंगा नसीब हो मुझको
मेरी तमन्ना अगर कोई है, तो बस ये है,
मैं यूं मरूं के तिरंग नसीब हो मुझको।'

'वफ़ा की डोर के बस छूटने से होती है,
किसी अजीज़ के फिर से फिर रूठने से होती है
के मौत अमीरों की होती है दिल के दौरे से,
ग़रीब लोगों की दिल टूटने से होती है।'

इसके बाद भी फ़र्माइशें तो ख़ूब थीं लेकिन वक्त की नज़ाकत को देखते हुए नाज़िम-ए-मुशायरा ने सद्र-ए-मुहतरम डॉ. नवाज़ देवबंदी को बाअदब दावते-सुख़न दी।

डॉ. देवबंदी, जो आलामक़ाम, पाएदार और मानीख़ेज़ शायरी का दूसरा नाम हैं। उनके बेशुमार शेर लोगों को ज़बानी याद हैं। इस बार डॉ. देवबंदी ने बिल्कुल नए शेर सुनाए। हालांकि चाहने वालों की फ़र्माइशें भी वो टाल नहीं सके। कुछ आज़ाद शेर-

'माना के गुनाह मेरे बहुत है मेरे मौला,
लेकिन तेरी रहमत से ज़ियादा तो नहीं है।'

'जिन पर लुटा चुका था मैं दुनिया की दौलतें,
उन वारिसों ने मुझको कफ़न नाप कर दिया।'

'ये करम भी कम नहीं हम तेरा रब्बे करीम,
बरहना पैदा हुए, मल्बूस दफ़नाए गए।'

'हवा ख़िलाफ़ चली, तो चराग़ ख़ूब जला,
ख़ुदा भी होने के क्या-क्या सुबूत देता है।'

फ़क़ीराना तबीयत के शायर डॉ. देवबंदी की शायरी के साथ-साथ उनकी आवाज़ में भी जैसे कोई फ़ल्सफ़ा निहां होता है। वो शेर कहते हैं तो लगता है, जैसे आबेरवां की सूरत में शेर बह-बह के दिलों के समंदर में ग़र्क़ हो रहे हों। लीजिए, पढ़िए छोटी बहर की एक ग़ज़ल-

'सब्र को दरिया कर देते हैं,
आंसू रुस्वा कर देते हैं
ज़ख्म पे मरहम रखने वाले,
ज़ख्म को गहरा कर देते हैं
हम जिस जंगल से भी गुज़रें,
उसको रस्ता कर देते हैं
रोटी महंगी करने वाले,
ज़हर को सस्ता कर देते हैं।'

इसके बाद भी काफ़ी देर तक शायरी का दरिया बहता रहा। आख़िर क़रीब 3.15 के आसपास महफ़िल तमाम हुई। इस बीच ज़िया टोंकवी और कशिश वारसी मुरादाबाद ने भी कलाम पेश किए। हर शाइर ने डूबकर और टूटकर सुनाया। कोई शक़ नहीं कि जब तक महफ़िल रही, लफ़्ज़ों के उजाले रहे, महफ़िल में हरारत रही। दाद-ओ-तहसीन के सिलसिले भी रवां-दवां रहे। लेकिन, जैसे किसी जांसोज़ की हालत को जांसोज़ ही समझता है, उसी तरह हिज्र के अलम में डूबी रात भी, दिलों में पोशीदा ग़मों के सारे राज़ ख़ूब समझती है और फिर चुपके-चुपके रोती है। जी हां, मेराज फैज़ाबादी के दुनिया-ए-फ़ानी से गुज़र जाने का ग़म रात ने रो-रोकर मनाया। शौअरा इकराम ने तो उनके नाम ख़िराज़े अक़ीदत पेश कर कुछ हद तक अपना जी हल्का कर लिया लेकिन रात वहीं खड़ी-खड़ी देर तक अपना ग़म रोती रही। और यक़ीनन लोग उसके ंसुओं को शबनम समझते रहे होंगे


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