हमने एक आदर्शवाद ओढ़ रखा है, जबकि हमें प्रकाशकों के आतंक से मुक्‍त होना चाहिए

सोमवार, 14 अगस्त 2023 (18:25 IST)
77th Independence Day: मनीषा कुलश्रेष्‍ठ हिंदी साहित्‍य जगत का चर्चित और लोकप्रिय नाम हैं। वे फिक्‍शन से थोड़ा- सा दूर हटकर शोधपरक उपन्‍यास रचती हैं। वे साफतौर पर कहती भी हैं कि उन्‍हें कविताओं से ज्‍यादा गद्य पसंद हैं। (कविताएं कम पढ़ती हैं) इसीलिए उनके विचारों में भी एक स्‍पष्‍टता, एक साफ़गोई है और उनकी बातें सच के करीब नजर आती हैं। मनीषा साहित्‍य जगत में एक पुल की तरह भी हैं, जहां वे क्‍लासिक्‍स को भरपूर तवज्‍जों देती हैं, वहीं वे सोशल मीडिया से चर्चित हो रहे नए लेखकों को न तो पढ़ने से परहेज करती हैं और न ही उन्‍हें खारिज करती हैं। साहित्‍य के स्‍त्री लेखन, दलित लेखन जैसे खांचों में बंटने को भी वे गलत कहती हैं तो लेखकों पर प्रकाशकों के दबाव के खिलाफ आवाज उठाने को भी जरूरी मानती हैं। इन सारे सवालों के जवाब देते समय वे बेहद मुखर हैं तो बहुत ग्रेसफुल भी।
 
'स्‍वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्‍य पर वेबदुनिया ने लेखिका मनीषा कुलश्रेष्‍ठ से आज के दौर के साहित्‍य पर विशेष चर्चा की। आइए पढ़ते हैं उनका विस्‍तृत साक्षात्‍कार।'
 
सवाल : आप अतीत के साहित्‍य और आज के वतर्मान साहित्‍य में क्‍या अंतर देखती हैं?
जवाब : बहुत सारी सकारात्‍मक और नकारात्‍मक चीजें मुझे मिलती हैं, जैसे हम प्रेमचंद और अज्ञेय के समय के साहित्‍य की बात करें या अन्‍य क्‍लासिक्‍स की बात करें तो वहां भाषा का एक सधाव था, हालांकि वहां प्रयोगशीलता कम थी। मनोवैज्ञानिक ग्रंथियां इतनी उलझी नहीं थी तो उस तरह मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी नहीं थे। न ही तब वर्तमान की तरह क्रूर और तटस्थ  दृष्टिकोण रहता था। तब के साहित्‍य और कलाओं में थोड़ी कोमलता थी। इसलिए मुझे वहां एक भावुक सधाव नजर आता है। भाषा को लेकर एक सधाव और संयम भी दिखता है। वर्तमान में देखें तो उस नॉस्‍टेल्‍जिक संयम से हमने निजात पा ली है। अब हम खुलकर किसी भी कॉम्‍पलिकेटेड विषय पर भी लिख लेते हैं, मनोवैज्ञानिक तौर पर बहुत ही क्रूर विषय पर भी लिख लेते हैं। प्रयोग भी ज्‍यादा हो रहे हैं, जैसे आज एक प्रयोग के तौर ‘रेत समाधि’ हमारे सामने हैं। हालांकि कृष्‍ण बलदेव वैद और कृष्‍णा सोबती तब भी अलग तरह से प्रयोग करते थे। वहीं मैं जिस पीढ़ी की हूं तो मुझे नॉस्‍टेल्‍जिया को लेकर पुराने साहित्‍य से मोह है। वहीं नए लेखकों की नई किताबें आती हैं तो वो भी पढ़ती हूं।
 
सवाल : तो नए लेखकों में कोई नाम बताइए, जिन्‍हें अभी आप पढ़ना पसंद करती हैं?
जवाब : मैं पोएट्री तो ज्‍यादा नहीं पढ़ती हूं, हां, मेरी रुचि प्रोज में ज्‍यादा है, इसलिए मैं नीलेश रघुवंशी को पढ़ती हूं। प्रत्‍यक्षा को, अनघ को पढ़ती हूं, (मुस्‍कुराते हुए) तुम्‍हें पढ़ती हूं, अंबर को पढ़ती हूं। तुम सबको पढ़ती हूं तो लगता है, भाषा के तौर पर तुम सब अच्‍छा प्रयोग कर रहे हो। नई तरह की बात आती है तुम लोगों के लेखन में, पुराने साहित्‍य में जिन चीजों से बचकर निकला जाता था और जो संयम बरता जाता था, वो अब नहीं है। यह जरूरी भी है।
 
सवाल : आप दोनों तरफ दृष्‍टि रखती हैं, क्‍लासिक्‍स पर भी और इन दिनों भी जो लिखा जा रहा है उसे भी देखती हैं, आप एक पुल की तरह दोनों के बीच में हैं तो भविष्‍य के साहित्‍य को आप कैसे देखती हैं, साहित्‍य का भविष्‍य क्‍या होगा?
जवाब : मुझे लगता है आकलन तो एक लंबे अरसे के बाद ही हो पाता है, इसलिए तुरंत तो इस बारे में कुछ कह नहीं सकते हैं। लेकिन हां, नए लोग जो पुरानी भाषा शैली को तोड़ रहे हैं, पुराने परंपरागत फॉर्म को तोड़ने का आग्रह आया है, वो मुझे बहुत रूचिकर लगता है। मुझे लगता है कि जब मैं एक ब्रिज की तरह देखती हूं दोनों तरफ तो मुझे महसूस होता है कि मेरे बाद की पीढ़ी ज़रूर कुछ बेहतर करेगी। हालांकि बहुत लिखा जा रहा है, हर कोई लेखक हैं, लेखकों की एक भीड़ आएगी, लेकिन उनमें से हम अपने पसंद के लेखकों को चुन सकेंगे कि किसे पढ़ना है किसे नहीं।
 
सवाल : सोशल मीडिया के लेखन को आप कैसे देखती हैं, क्‍या ये उल्‍लेखनीय है?
जवाब : जैसे नवीन तुम्‍हें, अंबर को, अनघ को मैंने सोशल मीडिया पर ही सबसे पहले पढ़ा, फिर मैं उन्‍हें खोजकर पढ़ूंगी। मुझे तुम्‍हारी भाषा ने, कहने के ढंग और अलग अंदाज ने आकर्षित किया है, तो मैं सोशल मीडिया को पूरी तरह से खारिज नहीं करूंगी। दरअसल, सोशल मीडिया एक खिड़की खोलता है, जहां हम लिखने वाले नए लोगों से जुड़ सकते हैं। उनके मिजाज और उनके सरोकार समझ में आते हैं तो फिर हम उन्‍हें खोजकर पढ़ने लगते हैं।निश्चय ही सोशल मीडिया के चलते एक बड़ा समूह लेखन में आ रहा है। हमें भूसे के ढेर से अपनी पसंद का धान चुनना होगा।
 
सवाल : कुछ और भी जगहों पर इन दिनों फिल्‍टर नहीं है, जैसे प्रकाशन, संपादन आदि, इसे आप कैसे देखती हैं?
जवाब : इन दिनों पूरे प्रकाशन जगत से फिल्‍टर गायब हुआ है, पत्रिकाओं के जगत से भी गायब हुआ है, संपादक नाम का फिल्‍टर अब नहीं है। अब किताब अच्‍छी एडिटिंग के साथ नहीं आती है। प्रूफ रीडिंग की गलतियां रहती हैं। हालांकि एक समय के बाद अगर मूल्‍याकंन करेंगे तो संभवत: अच्‍छे लेखक सामने आएंगे।
 
सवाल : पिछले दिनों विनोद कुमार शुक्‍ल का रॉयल्‍टी को लेकर विवाद सामने आया, आपको नहीं लगता लेखकों के ऊपर प्रकाशकों की मनमानी या दबाव बढ़ गया है?
जवाब : इस बारे में मैं क्रूर सत्‍य कहूंगी। जिस प्रकार प्रकाशक हावी हुए हैं उसके पीछे हमारा शुचितावाद है। हमने इस शुचितावाद के तहत इस धारणा को जन्‍म दिया कि हमें साहित्‍य से पैसे नहीं कमाने हैं, साहित्‍य और संपत्‍ति का कोई संबंध नहीं है। इस शुचितावाद की वजह से हम धीरे- धीरे टाट के कपड़ों में आने लगे हैं, और प्रकाशकों के हाथों में नीलम की अंगुठियां नजर आने लगी हैं। इसमें हमारी ही गलती है। हम मजदूरों के लिए लड़े, लेकिन हम अपनी कलम की मजदूरी के लिए कभी नहीं लड़े। विनोद जी के साथ कई लेखक नहीं आए। किसी ने प्रकाशकों और संपादकों को विरोध नहीं किया। हमने एक आदर्शवाद ओढ़ रखा है। लेकिन श्रम का मूल्‍य तो मिलना चाहिए। मैं तो अपनी रॉयल्‍टी के लिए लड़ती हूं। हमें बात उठाना चाहिए, प्रकाशकों के आतंक से मुक्‍त होना चाहिए, आखिर विनोद जी के लिए भी तो मानव कौल ने बात उठाई थी न।
सवाल : आप एक बड़ी और लोकप्रिय लेखिका होने के साथ महिला लेखक भी हैं। इस दौर की दूसरी महिला लेखिकाओं को आप कैसे देखती हैं, उनके बारे में क्‍या कहेंगी?
जवाब : मैं बड़ी लेखिका तो नहीं हूं, मैं सिर्फ एक लेखक हूं, इतना जानती हूं कि मुझे पढ़ा जा रहा है, पसंद किया जा रहा है। मेरे पाठक हैं, उससे कोई छोटा बड़ा नहीं होता। लेकिन मेरी समकालीन लेखिकाओं में मुझसे पहले की जया जादवानी, मधू कांकरिया गीतांजलि श्री हैं, ये सब बहुत जहीन लेखिकाएं रहीं हैं, अपनी भाषा और कथ्‍य के साथ खेलते हुए बहुत अच्‍छा लिखती रहीं हैं। दरअसल, मुझे लगता है कि हमारी पीढ़ी में सब पढ़कर और तैयार होकर आए हैं। लेकिन बाद में कुछ लोग बिना तैयारी के साहित्‍य में आई हैं। मैं जज नहीं कर रही हूं, लेकिन मुझे लगता है कि अगर वे पढ़कर, थोड़े अभ्‍यास के साथ आती तो और बेहतर काम करतीं। हालांकि कुछ नई लेखिकाएं हैं जो 40 से कम उम्र की हैं, लेकिन बहुत रिमार्केबली लिख रही हैं। मुझे जसिंता केरकेट्टा बहुत प्रिय हैं।
 
सवाल : इन दिनों स्‍त्री लेखन है, दलित लेखन है। लेखक इस तरह से खांचों में बंटा हुआ है, ये कितना सही है?
जवाब : स्‍त्री लेखन पर तो मुझे लगता है कि कुछ लोगों का महिलाओं को मुख्‍य धारा में नहीं आने देने का कोई षड़यंत्र था। इसलिए उन्‍होंने महिलाओं से कहा कि वो एक गोला बना रखा है, जाओ, उसमें जाकर खेलो। यही दलितों के साथ लेखन में हुआ। हालांकि वहीं मनु भंडारी की बात करें तो उन्‍होंने ‘महाभोज’ लिखकर किसी भी मुख्‍यधारा के बड़े लेखक से बहुत बेहतर राजनीतिक उपन्‍यास लिखा है। मृदुला जी को किसी स्‍त्री लेखन में नहीं बांट सकते, वहीं नासेरा जी, चित्रा मुगदल जी की बात करें। स्‍त्रियों को यह मान लिया गया कि वो बस दांपत्‍य के आसपास, अपने अस्‍तित्‍व को खोजने और अपने संकटों पर कहानियां लिखने के लिए बनी हैं। मेरा अपना पहला उपन्‍यास ‘शिगाफ़’ कश्‍मीर और उसकी राजनीति पर है। मुझे लगता है लेखन को खांचों में बांटना गलत है।
 
सवाल : अब आगे आप क्‍या लिख रही हैं, कौनसा नॉवेल या किस विषय पर लिख रही हैं?
जवाब : मेरे पति के वायुसेना में होने की वजह से मैं कई जगहों पर रही हूं। हम शिलांग मेघालय में रहे, जहां खासी जनजाति समुदाय के लोग हैं, जहां मातृ-सत्‍तात्‍मक समाज है। त्रिवेंद्रम रही तो वहां- नायर समाज को जाना, पढ़ा शोध किया। इस पर मैं एक बड़ा उपन्‍यास या तीन भागों में मातृ-सत्‍तात्‍मक समाज पर एक उपन्‍यास लिखने की कोशिश कर रही हूं। मेरे उपन्‍यास पर बहुत शोध होता है, मैं साइंस की स्‍टूडेंट रही हूं तो मुझे किसी अंधेरी दिशा में प्रवेश कर के लिखना अच्‍छा लगता है। हालांकि मैं ये जताना नहीं चाहती, ये मेरी अपनी निजी संतुष्‍टि का विषय है, इसलिए जिन विषयों में शोध होता है, मैं ऐसे विषय ही चुनती हूं।
 
मनीषा कुलश्रेष्‍ठ, हिंदी साहित्‍य में चर्चित और लोकप्रिय उपन्‍यासकार हैं। उन्‍होंने शिगाफ़, मल्‍लिका और शालभंजिका जैसे लोकप्रिय उपन्‍यास के साथ ही कई कहानियां लिखीं हैं।

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