परनिंदा में परमानंद है

विष्णु नागर
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हम में से जो मनुष्य हैं और जो देवता बनने की व्यर्थ कोशिश में लगे हुए नहीं हैं,वे परनिंदा रस अवश्य ग्रहण करते हैं। इसका कारण है। इसमें जो आनंद है, वह दुनिया की कम ही चीजों में है। कभी-कभी तो इससे परमानंद की प्राप्ति हो जाती है। दरअसल, परनिंदा करना मनुष्य के लिए इतना सहज और स्वाभाविक है जितना कि दैनिक कर्म करना। जैसे दैनिक कर्म को टाला नहीं जा सकता, वैसे ही परनिंदा को भी अपनी दैनंदिनी से बाहर निकालना प्रायः असंभव है।

जीवन के वे दिन सबसे उदास और सबसे गमगीन दिन होते हैं जब हमें किसी की निंदा करने का उचित अवसर नहीं मिल पाता। हम तड़प जाते हैं, बेकल हो जाते हैं, मन होता है कि सिर को दीवार से टकरा दें। जो देवता बनने की कोशिश में किसी की निंदा नहीं करते हैं वे अवश्य कुछ लोगों की नजर में वंदनीय होते होंगे लेकिन मेरी नजर में उनका समाज में उतना ही महत्व है जितना कि सच्चे ब्रह्मचारियों का होता है।

उन्हें कितनी विकट और कितनी व्यर्थ साधना करनी पड़ती है मगर उससे ज्ञान कुछ प्राप्त होता नहीं! आपने-हमने भी औरों की तरह परनिंदा करने में जीवन के न जाने कितने हजार घंटे नष्ट किए होंगे। अगर हम इसका हिसाब लगाने चलें तो यह संपूर्ण जीवन ही व्यर्थ लगने लगेगा और यह प्रतिज्ञा करने का मन होगा कि अगला जन्म मिला तो हम कम से कम इस बुराई से तो अवश्य छुटकारा पा लेंगे।

अतः हिसाब-किताब करने की दीर्घ, प्राणघातक और बेवकूफी भरी साधना से बचने के लिए मैं स्वयं भी उन घंटों के बारे में सोचना पसंद नहीं करता। परनिंदा को जीवन का अभिन्न और अनिवार्य अंग मानकर, इसे आनंद और रस का एकमात्र स्थायी स्रोत मानकर परनिंदा करने तथा सुनने में जीवन का काफी समय मैं भी खर्च करता हूँ। और मुझे खुशी होती है कि मेरे आसपास भी मेरे जैसे ही सहज-साधारण-स्वाभाविक लोग हैं बल्कि कुछ तो मुझसे आगे-बहुत ही आगे हैं यह जानकर मुझे दुख होने के बजाय खुशी ही होती है। अपनी अधमता का जो अकारण अहसास कभी-कभी मुझे होने लगता है, उससे मुक्ति मिल जाती है!

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परनिंदा करने-सुनने की पतियों की गजब की क्षमता से चकित-थकित होकर अक्सर पत्नियाँ, पतियों को यह कहकर शर्मिंदा करने का प्रयास करती रहती हैं कि हम औरतें भले ही बदनाम हों मगर हम कभी आपस में मिलने पर इतनी परनिंदा नहीं करतीं, जबकि तुम पुरुष लोग नियमपूर्वक निंदा करते हो, फिर भी तुम लोगों का पेट इससे नहीं भरता। रोजे, भूखे के भूखे! उम्र बढ़ने के साथ वैसे तो तुम लोग हर दिन कहते हो कि हमारा हाजमा खराब रहता है लेकिन निंदा करने का हाजमा तो तुम लोगों का दिनोदिन बेहतर ही होता जाता है।

जिस दिन तुम लोग किसी की निंदा पर्याप्त कर और सुन लेते हो, उस दिन बहुत प्रफुल्ल रहते हो। वैसे यह बात सच भी है। कई मित्रों को मैंने देखा है कि उनकी खराब तबीयत सिर्फ इसी वजह से सुधर गई है और कई बार परनिंदा में लीन होने के पश्चात खुद मुझमें भी इतना जोश आ गया है कि जितना जोश आना, उम्र के इस मोड़ पर ठीक नहीं होता।

इससे स्वास्थ्य को नुकसान पहुँच सकता है लेकिन मैं क्या करूँ, मुझसे भी तो रहा नहीं जाता। इसी से अहसास होता है कि अभी तो मैं जवान हूँ! मैंने नौकरी के अपने सुदीर्घ जीवन में पाया है कि बॉस की निंदा करना मातहतों का प्रिय शगल और परम कर्तव्य होता है, भले ही बॉस अयोध्यावाले, दशरथनंदन स्वयं राम तुल्य ही क्यों न हों। जिन्होंने कभी नौकरी नहीं की, जो अपने बॉस स्वयं रहे, उनके जीवन पर कभी-कभी मुझे तरस आता है!

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लगता है कि इन बेचारों को जीवन के भले ही बाकी सब आनंद मिले होंगे मगर यह आनंद नहीं मिला तो फिर उन्हें वास्तव में मिला क्या ! कई बार इच्छा होती है उनसे यह कहने की कि आप इस जीवन में ईश्वर से प्रार्थना करें कि अगले जन्म में आपको नौकरी करने तथा बॉस को झेलने का सुअवसर अवश्य दे! फिर आप जानेंगे कि जीवन का असली आनंद! लेकिन क्या करूँ मैं थोड़ा संकोची हूँ, शर्मिला हूँ, डरपोक हूँ, अपने मन की बात कहने से कई बार डर जाता हूँ। जैसे अपनी जवानी में भी डर गया था और कई लड़कियों से 'आई लव यू' कहने में मैं नाकामयाब रहा था।

इस वजह से मैं जूते खाने से जीवनभर बचा भी रहा मगर क्या पता इसी कारण उन लड़कियों को पत्नी बनाने से भी बच गया हूँ, जिन्हें तब बनाना चाहता था! हाँ तो बॉस की निंदा करने का अपना ही एक आनंद है और यह काम मातहत सोमवार से शनिवार तक ही नहीं करते बल्कि रविवार को ज्यादा आराम से और सुकून से करना पसंद करते हैं बल्कि जितना काम वे दफ्तर में करते हैं, उससे ज्यादा समय वे बॉस की निंदा करने में व्यतीत करते हैं।

मैं भी कुछ बरस एक छोटा-मोटा बॉस रहा । मैंने अपने मातहतों से कह रखा था कि मैं जानता हूँ कि तुम पीठ पीछे मेरी निंदा अवश्य करते हो मगर मैं इसका बुरा नहीं मानता क्योंकि यह काम मैं स्वयं भी बहुत कर चुका हूँ लेकिन उनमें से कुछ इतने 'बेईमान' निकले कि उन्होंने कहा कि सर, हम आपकी निंदा कभी करते ही नहीं ! इसके बाद मैंने अपनी 'उदारता' के इस प्रदर्शन को हमेशा के लिए स्थगित कर दिया, ताकि मन पर बिना किसी किस्म का बोझ लिए वे बॉस की यानी मेरी प्रेमपूर्वक निंदा कर सकें। कहते हैं कि जो बॉस अपने मातहतों की नजर में जितना ही निंदनीय होता है, वह अपने बॉस या बॉसों की नजर में उतना ही प्रशंसनीय भी होता है और वह कतई नहीं चाहता कि उसके बॉस उसके प्रति प्रशंसा का यह भाव रखना छोड़ दें !

निंदा करने के अनेक तरीके होते हैं। एक तरीका यह भी होता है कि किसी की तारीफ के पुल बाँधने के लिए आप किसी और की घनघोर निंदा करने लगें और जिसकी तारीफ में आपको बोलना हो, उसकी तारीफ में मात्र एक पंक्ति बोलकर आगे बढ़ जाएँ। अगर आयोजक, श्रोता तथा जिसकी प्रशंसा करने के लिए आप बुलाए गए हैं, वे स्वयं इससे ऊब जाएँ, ऊबासी लेने लगें तो फट से दो पंक्तियाँ पुन: उन सज्जन की तारीफ में बोलकर अपने मूल एजेंडे पर लौट आएँ।

ऐसे निंदकों को मैंने बड़ी तादाद में देखा है और कई के बारे में तो भविष्यवाणी भी कर सकता हूँ कि आज ये किसकी निंदा में कितनी देर तक और किसकी तारीफ में कितनी कम देर तक बोलेंगे। तो जिसकी निंदा करनी हो, जी खोलकर कीजिए। इससे उसका कुछ बिगड़ता नहीं मगर आपका सब कुछ सुधर जाता है।

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पटरी से बार-बार उतरने वाले जीवन को राहत देना हो तो प्रतिदिन नियमपूर्वक, किसी न किसी की निंदा देर तक और दूर तक अवश्य कीजिए। दरअसल, जो पैदा होता है, वह निंदनीय होने की पात्रता के साथ ही पैदा होता है। और याद रखिए कि निंदा करने का सुख धरती पर सिर्फ मनुष्य नामक प्राणी को ही प्राप्त है, पशु-पक्षियों को नहीं। एक भैंस, दूसरी भैंस को या एक बकरी, दूसरी बकरी को कितना ही नापसंद करे,उसकी निंदा नहीं कर सकती। जबकि मनुष्य के लिए तो यह भी जरूरी नहीं कि वह जिसकी निंदा कर रहा हो, उसे नापसंद भी करता हो।

ईश्वर ने परनिंदा करने का यह गुण हमें दिया है, यह रस हमें दिया है, तो हमें इसे प्रेमपूर्वक ग्रहण भी करना चाहिए। और मानकर चलिए कि इस दुनिया में कहीं न कहीं उसी समय आपकी भी निंदा हो रही होगी। उसमें वे भी शामिल होंगे जो अक्सर आपके सामने आपकी प्रशंसा करके आपका और अपना वक्त बर्बाद किया करते हैं।

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