यूक्रेन युद्ध में पुतिन को 'महासंग्राम' की ओर ले जा रही रूस की दक्षिणपंथी ताक़तें कौन हैं?

BBC Hindi

बुधवार, 12 अक्टूबर 2022 (07:52 IST)
जुलेस सर्गेई फ़ेदिउनिन, द कन्वर्सेशन
इस साल 24 फ़रवरी को यूक्रेन पर रूस के हमले की शुरुआत के बाद से ही मॉस्को की ये कोशिश रही है कि वो युद्ध की असलियत को कम से कम करके पेश करे। रूस ने इस हमले को 'स्पेशल ऑपरेशन' का नाम दिया और देश में जिस किसी ने भी इसे किसी और नाम से बुलाने की कोशिश की, उसे सत्ता की नाराज़गी का सामना करना पड़ा।
 
रूस का सत्ता प्रतिष्ठान 'क्रेमलिन' इस संघर्ष को एक अस्थाई लड़ाई के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा था जिसका एक सीमित लक्ष्य था। ऐसा लग रहा था जैसे रूस युद्ध और शांति के बीच की विभाजन रेखा को धुंधला करने की कोशिश कर रहा है।
 
21 सितंबर को जब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने भाषण में रिज़र्व सैनिकों को ड्यूटी पर वापस बुलाने का एलान किया तो उनकी ये कोशिश साफ़ महसूस हो रही थी। लेकिन यूक्रेन ने जिस तरह से रूस का प्रतिरोध किया है, उससे हालात बदल गए हैं।
 
एक तरफ़ कुछ रूसी लोग यूक्रेन पर हमले का विरोध कर रहे हैं और उन्होंने रिज़र्व सैनिकों को ड्यूटी पर वापस बुलाने के फ़ैसले के विरोध में सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शन भी किया है।
 
दूसरी तरफ़, देश की दक्षिणपंथी ताक़तों को ऐसा लगता है कि रूस ज़रूरत से ज़्यादा हिचक दिखा रहा है और उनका कहना है कि उसे यूक्रेन के ख़िलाफ़ पूरी ताक़त झोंक देनी चाहिए।
 
वे चाहते रहे कि रूस यूक्रेन के शहरों पर भीषण बमबारी कर दे और यहां तक कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से भी न हिचकिचाए।
 
रूस की युद्ध नीति को समझने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि रूस की ये 'अति राष्ट्रवादी ताक़तें' कौन हैं और देश में उनकी क्या हैसियत है?
 
रूस-यूक्रेन युद्ध: रविवार और सोमवार का घटनाक्रम
 
यूक्रेन की राजधानी कीएव पर हुए रूस के मिसाइल हमलों की दुनिया के कई देशों ने निंदा की है। अमेरिका ने कहा कि रूस ने असैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, इनमें यूनिवर्सिटी और बच्चों के प्लेग्राउंड भी शामिल हैं। अमेरिका ने यूक्रेन को मदद जारी रखने का भरोसा दिया है।
 
रूस की धुर दक्षिणपंथी ताक़तें
हालांकि रूस में कोई भी ख़ुद के 'धुर दक्षिणपंथी' होने का दावा नहीं करता है। लेकिन व्लादिमीर पुतिन की हुकूमत में ऐसे कई तत्व शामिल हैं जिनका आपस में कोई तालमेल नहीं है।
 
इनमें कट्टरपंथी, नेशनल डेमोक्रेट्स से लेकर नव नाज़ीवादी राष्ट्रवादी, खुद को 'राष्ट्रभक्त' कहने वाली मिलिशिया, मिलिट्री ब्लॉगर्स और डोनबास के रूस समर्थक अलगाववादी लड़ाके शामिल हैं। इनमें एक नाम डोनबास पीपल्स मिलिशिया के नेता इगोर गिरकिन का भी है जिन्हें 'स्ट्रेलकोव' या 'शूटर' के नाम से जाना जाता है।
 
इगोर गिरकिन साल 2014 में थोड़े समय के लिए स्वयंभू 'दोनेत्स्क पीपल्स रिपब्लिक' के रक्षा मंत्री भी रहे थे। इन राजनीतिक ताक़तों का रूस की संसद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
 
व्लादिमीर ज़िरिनोव्स्की की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के बारे में निस्संदेह ये माना जाता रहा कि वो नब्बे के दशक की 'अल्ट्रानेशनलिस्ट फोर्स' थी, लेकिन बाद में उसने भी कम्युनिस्ट पार्टी से हाथ मिला लिया और 'कठपुतली विपक्ष' का हिस्सा बन गई।
 
'रूस की महानता'
रूस ने अतीत में ऐसे कई दक्षिणपंथी आंदोलनों पर प्रतिबंध लगाए हैं जिन्हें वो ख़तरनाक और हिंसक मानता था। कई विपक्षी राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों को औपचारिक रूप से रजिस्टर किए जाने की भी इजाजत नहीं दी गई।
 
लेकिन पुतिन के शासनकाल में ऐसी ताक़तों को बढ़ावा नहीं दिया गया तो कम से कम इन ताक़तों को रूसी मीडिया में अपनी उपस्थिति बनाए रखने की छूट ज़रूर दी गई, लेकिन एक शर्त भी रखी गई कि वे क्रेमलिन के लिए वफ़ादार रहेंगे।
 
हालांकि इन राष्ट्रवादी ताक़तों में से एक छोटा-सा तबका आज यूक्रेन पर हमले का विरोध कर रहा है तो दूसरी तरफ़ इन्हीं दक्षिणपंथी शक्तियों के बीच रूस की महानता को पुनर्स्थापित करने की आवाज़ भी उतने ही ज़ोर से बुलंद हो रही है।
 
ज़्यादातर दक्षिणपंथी ताक़तों ने रिज़र्व सैनिकों को ड्यूटी पर वापस बुलाने के पुतिन के एलान का स्वागत किया तो कुछ ने इसे 'दूरदर्शिता भरा क़दम' बताया और कुछ ने इसे बहुत देरी से उठाया गया बहुत छोटा क़दम बताया।
 
चौतरफ़ा मोर्चे पर युद्ध की मांग
मार्च, 2022 में कीएव के पास से रूसी सैनिकों को पीछे हटना पड़ा और उसके बाद कई मोर्चों पर मिली सैन्य नाकामी से मिलिट्री कमांड की कमियां उजागर हो गई थीं।
 
रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु और देश के राजनीतिक नेतृत्व को इन नाकामियों के लिए कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इसका नतीजा ये हुआ कि रूस की राष्ट्रवादी ताक़तें पुतिन की हुकूमत से यूक्रेन पर ज़ोरदार हमले की अपील करने लगी। उनकी नज़र में 'स्पेशल ऑपरेशन' ख़त्म करके 'पूर्ण युद्ध' शुरू करने का सही समय आ गया है।
 
रूसी राष्ट्रवाद को विचारधारा के स्तर पर दो मुख्य शाखाओं में बांटा जाता है। पहली शाखा साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा से जुड़ी हुई है। इसे मानने वाले लोग रूसी राज्य की महानता पर ज़ोर देते हैं।
 
साम्राज्यवादी विचारधारा
उनकी राय में रूस को अपनी सीमाओं का विस्तार करना चाहिए और जिसकी हद पूर्व सोवियत संघ की सीमाओं तक जाती है।
 
रूसी राष्ट्रवाद की दूसरी शाखा 'रशियन फ़ेडरेशन' को एक 'रूसी राष्ट्र' में बदलना चाहती है। इस विचारधारा के लोग भी ये चाहते हैं कि रूस उन क्षेत्रों को अपने में मिला ले जिन्हें वो अपना मानता है। हालांकि ये लोग शांतिपूर्ण तरीके से ऐसा करना चाहते हैं, लेकिन अगर इसके लिए ताक़त का इस्तेमाल करना पड़ा तो इसके लिए भी उन्हें कोई गुरेज़ नहीं है।
 
यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के अभियान में इन दोनों विचारधाराओं की झलक देखी जा सकती है। साम्राज्यवादी विचारधारा रूस की सीमा विस्तार की नीति का हिमायती है, जबकि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करने वाले लोग यूक्रेन के रूसी भाषा बोलने वाले यूक्रेनी लोगों के मुद्दे पर भी ज़ोर दे रहे हैं।
 
परमाणु हथियारों का विकल्प
लेकिन मतभेदों के बावजूद विचारधारा के ये दोनों खेमे एक बात पर सहमत हैं और वो ये है कि इस युद्ध में हर हाल में जीत हासिल होनी चाहिए, भले ही यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस को परमाणु हथियारों का ही इस्तेमाल क्यों न करना पड़े।
 
रशिया टुडे के स्तंभकार येगोर खोल्मोगोरोव कहते हैं, "अगर यूक्रेन पर जीत और वैश्विक परमाणु युद्ध के बीच किसी एक को चुनना हो तो न्यूक्लियर वॉर को तरजीह दी जाएगी।"
 
येगोर खोल्मोगोरोव भी साम्राज्यवादी विचारधारा के हिमायती पत्रकार हैं। वे क्रेमलिन और विपक्ष के राष्ट्रवादियों के बीच सुलह के लिए मध्यस्थता कर चुके हैं।
 
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के हिमायती और एक्टिविस्ट एलेक्ज़ेंडर ख्रामोव के शब्दों में कहें तो अगर यूक्रेन पश्चिमी देशों के समर्थन से ये युद्ध जीत लेता है तो रूस कई छोटे-छोटे राज्यों में बिखर जाएगा और रूसी क़ौम पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी।
 
इस युद्ध से अभिभूत ये लोग रूसी समाज के पूर्ण शुद्धिकरण की बात कर रहे हैं और ये व्लादिमीर पुतिन के निज़ाम के लक्ष्यों से मेल नहीं खाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुतिन युद्ध के लिए उठ रहे इस शोरशराबे पर क्या लगाम रख पाएंगे।
 
रूस की धुर दक्षिणपंथी ताक़तें और यहां तक कि पुतिन के कुछ सहयोगी भी जिस तरह से कठोर कदम उठाने की बात कर रहे हैं, उससे तो ऐसा नहीं लगता है। इस युद्ध का चाहे जो भी नतीजा निकले, लेकिन ये तय है कि रूस की आंतरिक स्थिरता पर इसके दूरगामी नतीजे होंगे।

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