लिज़ ट्रस के इस्तीफ़े के बाद ब्रिटेन में अब आगे क्या होगा

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022 (08:15 IST)
ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस ने गुरुवार को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय 10 डाउनिंग स्ट्रीट के सामने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि जिस मैन्डेट के तहत उनका चुनाव हुआ था उसे वो पूरा नहीं कर सकेंगी।
 
उन्होंने कहा कि जिस दौर में उनका चुनाव प्रधानमंत्री के पद पर हुआ वो "आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्थिरता का दौर" था। उन्होंने कहा, "मैं मानती हूं कि जिस तरह की स्थिति है उसमें कंज़र्वेटिव पार्टी ने जिस मैन्डेट के तहत मेरा चुनाव किया था, उसे मैं पूरा नहीं कर सकूंगी।
 
ट्रस ने कहा कि उन्होंने किंग चार्ल्स III से बात कर उन्हें इस बात की जानकारी दी है कि कंज़र्वेटिव पार्टी के प्रमुख के तौर पर वो इस्तीफ़ा दे रही हैं। लिज़ ट्रस ने ये भी कहा कि उन्होंने गुरुवार को अपनी पार्टी के संसदीय दल के चेयरमैन सर ग्राहम ब्रैडी से मुलाक़ात की है।
 
उन्होंने कहा कि दोनों में इस बात की सहमति बनी है कि पार्टी नेता का चुनाव अगले सप्ताह होगा और जब तक उनका उत्तराधिकारी नहीं चुना जाता, वो बतौर कार्यकारी प्रधानमंत्री, पद पर बनी रहेंगी।
 
लिज़ ट्रस ने 44 दिन पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के तौर पर सत्ता संभाली थी। पद से हटने के बाद वो सबसे कम समय तक सत्ता संभालने वाली ब्रितानी प्रधानमंत्री बन जाएंगी।
 
लिज़ ट्रस के एलान के बाद लेबर पार्टी के नेता सर कीर स्टर्मर ने तुरंत आम चुनाव कराने की मांग की है। लिज़ ट्रस का इस्तीफ़ा गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन के पद छोड़ने और कंज़र्वेटिव पार्टी के सांसदों के बग़ावत के बाद हुआ है।
 
अगले सप्ताह कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता के लिए चुनाव होने हैं। ट्रस ने कहा कि जब तक नया नेता नहीं चुन लिया जाता वो कार्यकारी प्रधानमंत्री के पद पर बनी रहेंगी।
 
इस्तीफ़े के बाद ब्रिटेन में अब क्या हो रहा है, और नए प्रधानमंत्री के चुनाव से भारत से रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा, बीबीसी के दिनभर कार्यक्रम में बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक और राजनीतिक विशेषज्ञ शिवकांत शर्मा ने इसपर विस्तार से बात की। पढ़िए उन्होंने क्या कहा:
 
ब्रिटेन में क्या है हलचल?
प्रधानमंत्री इस्तीफ़ा देंगी इसकी अटकलें तो दो दिनों से लगाई जा रही थीं, अब माहौल असमंजस का है क्योंकि अगले नेता का चुनाव एक हफ़्ते के अंदर किया जाना है।
 
सवाल ये है कि जो प्रक्रिया इससे पहले पांच हफ़्तों में नहीं पूरी हो पाई थी, वो एक हफ़्ते में कैसे पूरी हो पाएगी। इसे लेकर कोई सही जवाब नहीं दे पा रहा है।
 
इसकी एक वजह ये हो सकती है कि या तो नेतृत्व पद के लिए एक ही उम्मीदवार होगा या दो उम्मीदवारों की बात चल रही है। अगर एक उम्मीदवार हुआ तो ऋषि सुनक का नाम सामने आने की संभावना है। दो उम्मीदवार होंगे तब भी सुनक उनमें से एक हो सकते हैं, ऐसा लोगों का मानना है।
 
हालांकि जेरेमी हंट का भी नाम सामने आ रहा था लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। इसके अलाव पेनी मोर्डेंट का नाम भी है। कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि अगर सर्वसम्मित की बात आए, तो मुमकिन है कि बोरिस जॉनसन फिर से अखाड़े में आ जाएं।
 
इसके अलावा सोहेला ब्रेवरमैन के नाम की भी चर्चा है लेकिन मुझे नहीं लगता उन्हें वैसा समर्थन मिलेगा जैसा पहले मिला था। ये भी मुमकिन है कि कन्सर्वेटिव पार्टी के आम सदस्य इस प्रक्रिया में हिस्सा न लें और केवल सांसद ही नए प्रतिनिधि का चुनाव कर ले, तभी ये प्रक्रिया एक हफ़्ते में पूरी हो पाएगी, क्योंकि सभी एक लाख साठ हज़ार लोगों तक पहुंचने में बहुत समय लग जाएगा।
 
लिज़ ट्रस का कार्यकाल: कब-कब क्या-क्या हुआ?
 
अगले पीएम के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
लिज़ ट्रस अपने वादों पर ख़री नहीं उतर पाईं, ये कहा जा सकता है कि उनके वादे बहुत किताबी थे, कि अर्थव्यव्स्था का विकास करो, टैक्स कम करो। सैद्धांतिक तौर पर ये सही है, लेकिन हर चीज़ का एक वक्त होता है। ऋषि सुनक कह रहे थे कि ये सब बातें हम करना चाहते हैं लेकिन अभी इसका सही वक्त नहीं है। अभी महंगाई और मंदी का दौर है।
 
ब्रिटेन के लोग परेशान है, उन्हें लग रहा है कि अगर सिस्टम अलग होता तो आम चुनाव हो जाते और लेबर पार्टी आ जाती। लेकिन समस्या उनके सामने भी यही होती, ये अंतरराष्ट्रीय समस्या है, अब एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो संयम से काम ले, बड़े बड़े वादे न करे, लोगों का भरोसा जीते और धीरे धीरे आगे बढ़े।
 
लेबर पार्टी को लगता है कि पूरी सरकार को बदलने की ज़रूरत आ गई है, लेकिन यहां कि व्यवस्था और आंकड़ों पर नज़र डालें तो कन्ज़र्वेटिव पार्टी के पास 650 के सदन में 357 सांसद हैं और जबतक पार्टी एकजुट है और वो चुनाव नहीं चाहती तो चुनाव नहीं होंगे।
 
1992 में जब ब्रिटेन इआरएम (यूरोपियन एक्सचेंज रेट मेकैनिज़म) से निकलने पर मजबूर हुआ था, उस समय ठीक इसी तरह का आर्थिक संकट था। उस समय भी दो सालों तक कन्ज़र्वेटिव पार्टी की सरकार चली थी, लेकिन जो साख उस समय उन्होंने खोई, उसकी भरपाई नहीं हो पाई। इस बार भी मुझे ऐसा ही होता नज़र आ रहा है।
 
भारत के लिए क्या हैं मायने?
जब बोरिस जॉनसन आए थे तो कुछ व्यापार समझौते हुए थे, उनको काफ़ी वक्त बीत चुका है। भारत को बहुत परेशान होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि भारत से ज़्यादा व्यापार के लिए ब्रिटेन को भारत की ज़रूरत है। तो जो भी नई सरकार आएगी, वो भारत के हिसाब से काम करेगी बशर्ते भारत सरकार अपने पत्ते अपने पास रखे और शातिरता से खेले।
 
भारतीय मूल का कोई प्रधानमंत्री बन सकता है, लेकिन आमतौर पर ये देखा गया कि वो निष्ठावान बनने के चक्कर में कठोर नीतियां अपनाने लगता है, इसलिए भारत को कोई बहुत बड़ा फ़ायदा नहीं होगा। भारत को लेकर कोई बुनियादी बदलाव होंगे, ऐसा लगता तो नहीं है।
 
यहां जो हो रहा है वो हास्यास्पद है लेकिन एक बड़ी बात जो भारत को सीखनी चाहिए कि लोकतंत्र तब होता है जब पार्टी के भीतर भी लोकतंत्र हो। ये देखिए कि कन्सर्वेटिव पार्टी में अगर वो किसी नेता को सही नहीं मानते तो वो बोलते हैं, विचारधारा को लेकर अगर मतभेद होते हैं, तो वो ज़ाहिर करते हैं।
कॉपी - शुभम किशोर

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