माय नेम इज ‘शाहरुख’ खान : जब तक है जान लड़ता रहेगा ये पठान

कमबैक। ये शब्द आमतौर पर बॉलीवुड में उपयोग में लाया जाता है। ये उन फिल्मस्टार्स के लिए लिखा जाता है जिन्होंने कुछ वर्षों के लिए फिल्मों से दूरी बना ली या फिर जिनकी फिल्में लगातार फ्लॉप होती हैं और उसे डूबा हुआ माना जाता है, फिर वह एक फिल्म के जरिये वापसी करता है और उस फिल्म की सफलता-असफलता पर करियर निर्भर करता है। हाल ही में एक सुपरस्टार ने कमाल का कमबैक किया है, जिसका नाम है शाहरुख खान। पिछले कुछ समय से शाहरुख ने फिल्मों से भी दूरी बना ली थी और उनकी पिछली कुछ फिल्में भी फ्लॉप रही थी। पठान के पहले उनकी फिल्म 'ज़ीरो' वर्ष 2018 में रिलीज हुई थी। 4 वर्ष तक वे सिल्वर स्क्रीन से गायब थे। ब्रेक ले लिया था उन्होंने। ब्रेक लेना भी हिम्मत का काम होता है क्योंकि लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है और आप दिखे नहीं तो भूलने में देरी नहीं लगाई जाती। दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने भी अपने करियर में ब्रेक लिया था। उनके सामने भी यही स्थिति उत्पन्न हो गई थी जो शाहरुख के सामने हुई थी। क्रिकेटर विराट कोहली ने भी हाल ही में ब्रेक लिया था। दिलीप और अमिताभ की तरह शाहरुख ने भी सफल वापसी की। 
 
ब्रेक लेने की एक वजह ये भी थी कि शाहरुख की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा परफॉर्म नहीं कर पा रही थीं। उनकी आखिरी बड़ी हिट मूवी 'हैप्पी न्यू ईयर' थी जो वर्ष 2014 में रिलीज हुई थी। पिछले 9 साल में शाहरुख की बतौर हीरो दिलवाले, फैन, रईस, जब हैरी मेट सेज़ल और ज़ीरो रिलीज हुईं और सभी उस स्तर का प्रदर्शन नहीं कर पाई जो एक सुपरस्टार की फिल्में करती हैं। कुछ तो बुरी तरह फ्लॉप रहीं। यह मान लिया गया कि बॉलीवुड के बाद्शाह का सितारा अब अस्त होने को है, शाहरुख का करियर खत्म हो गया है। ब्रेक लेकर शाहरुख तरोताजा हुए, हालांकि काम न करने के बावजूद विवाद उनके साथ चलते रहे, लेकिन किंग खान अलग मिट्टी के बने हुए हैं। उन्होंने सबको किनारा करते हुए अपने कमबैक को ब्लॉकबस्टर बनाया है।  
 
बढ़ती उम्र और गलत फैसले 
आखिर शाहरुख खान के लिए पिछले कुछ साल क्यों भारी पड़े? क्यों उनका नंबर वन का सिंहासन डोलता नजर आया? क्यों पिछला एक दशक उन पर भारी पड़ा। इसके लिए थोड़ा पीछे चलना होगा। फिल्म 'हैप्पी न्यू ईयर' के रिलीज के बाद वर्ष 2015 में शाहरुख खान की उम्र 50 बरस हो गई थी। यह आंकड़ा किसी भी सुपस्टार को अंदर ही अंदर डराता है। चूंकि शाहरुख खान की सफलता का महल रोमांटिक फिल्म और छवि की नींव पर खड़ा था इसलिए वे ज्यादा घबराए हुए थे। युवा हीरोइनों के साथ रोमांस करते समय उम्र का अंतर कैमरे की बारीक निगाह पकड़ लेती है। शाहरुख अपनी रोमांटिक इमेज से बेहद मोहब्बत करते हैं और उससे वे अलग नहीं होना चाहते थे। उस दौर में सुधीर मिश्रा, हंसल मेहता जैसे निर्देशकों ने कहा भी शाहरुख अच्छे एक्टर हैं, लेकिन रोमांटिक फिल्मों से अलग तरह की फिल्में भी उन्हें करना चाहिए।

'हैप्पी न्यू ईयर' भले ही बॉक्स ऑफिस पर सफल रही थी, लेकिन उसमें शाहरुख के लिए 'हैप्पी' होने वाले कोई बात नहीं थी। शाहरुख के चुनाव पर सवाल खड़े हो गए थे कि आखिर वे इस तरह की फूहड़ फिल्मों का हिस्सा बन कर अपने स्टारडम के साथ क्यों खिलवाड़ कर रहे हैं। 2015 में शाहरुख ने रोहित शेट्टी के साथ 'दिलवाले' की। इस फिल्म के बनते-बनते शाहरुख और रोहित के संबंध खराब हो गए थे। शाहरुख की जरूरत से ज्यादा दखलअंदाजी रोहित बर्दाश्त नहीं कर पाए। कड़वाहट का असर फिल्म पर भी नजर आया। दिलवाले के साथ बाजीराव मस्तानी भी रिलीज हुई और शाहरुख जैसे सितारे की फिल्म रणवीर की फिल्म से मार खा गई जिसकी चोट निश्चित रूप से शाहरुख के अहंकार पर लगी।



शाहरुख ने अपने घरेलू बैनर जैसे यश राज फिल्म्स की 'फैन' वर्ष 2016 में की, लेकिन इस फिल्म में साफ नजर आया कि इस फिल्म बनाने का प्रयास सौ प्रतिशत नहीं हुआ है। इसे महज एक प्रोजेक्ट की तरह हैंडल किया गया। 2017 में शाहरुख ने रईस में एंटी हीरो का किरदार किया। बातें तब 300 करोड़ की होने लगी थीं तो शाहरुख जैसे स्टार की रईस का सवा सौ करोड़ का कलेक्शन करना मामूली ही माना जाएगा। 
 
शाहरुख को कॉमेडी, एक्शन, ड्रामा में सफलता नहीं मिली तो वे इम्तियाज अली की फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' के जरिये रोमांटिक फिल्मों की ओर लौटे। उनकी पुरानी अदाओं को बासी करार दिया गया और यह फिल्म शाहरुख के करियर की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्मों में से एक रही। शाहरुख के फिल्मों के चुनाव और निर्देशकों के साथ काम करने के फैसले गलत साबित हो रहे थे। ज़ीरो (2018) करने का उनका फैसला भी गलत रहा और इस फिल्म ने उन्हें नीचे ला पटका। इन फिल्मों की असफलता से शाहरुख का आत्मविश्वास हिल गया। जिस तरह से वे बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे वो बंद हो गईं क्योंकि असफल फिल्में मुंह चिढ़ा रही थीं। शाहरुख के सामने ऐसा वैक्यूम पैदा हो गया जिससे बाहर निकलने का रास्ता उन्हें सूझ नहीं रहा था। यथास्थिति को कायम रखने के लिए उन्होंने कैमरे से दूरी बना ली।    
 
यश चोपड़ा की खली कमी 
फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा, शाहरुख के लिए पिता तुल्य रहे। शाहरुख अक्सर अपने करियर संबंधी सलाहें भी उनसे लिया करते थे। शाहरुख का करियर गढ़ने में यशराज फिल्म्स ने अहम भूमिका निभाई है। जब यशराज फिल्म्स भी बुरे दौर से गुजर रहा था तब शाहरुख ने आदित्य चोपड़ा के साथ 'रब ने बना दी जोड़ी' कर बैनर की साख को फिर जमाया था। 2012 में यश चोपड़ा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। यह शाहरुख के लिए निजी क्षति थी। शाहरुख के करियर में आदित्य चोपड़ा और करण जौहर जैसे निर्देशकों ने भी अहम भूमिका निभाई है। ये दोनों बतौर प्रोड्यूसर सक्रिय हो गए। रणबीर और रणवीर जैसे युवा सितारों के साथ फिल्म बनाने लगे। 


 
दूसरी ओर शाहरुख ने आनंद एल राय, मनीष शर्मा, राहुल ढोलकिया, इम्तियाज अली जैसे निर्देशकों के साथ काम किया जिन्होंने कभी बड़ी हिट मूवी नहीं दी है। साथ ही शाहरुख जैसे सुपरस्टार को वे ठीक तरह से हैंडल नहीं कर सके। इसलिए फिल्में ठीक नहीं बनी और असफल रहीं। शाहरुख जैसा सितारा होने के बावजूद ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर ठीक से शुरुआत नहीं कर सकी और इससे शाहरुख का स्टारडम सवालों के घेरे में आ गया। यह दौर शाहरुख का बतौर अभिनेता भी सबसे बुरा था। एक भी फिल्म वे ऐसी नहीं दे पाए जो उनको बतौर एक्टर आगे ले जा सके। इन फिल्मों में वे अपने आपको दोहराते नजर आए। यह शाहरुख के करियर का सबसे खराब दौर था। ऐसे में यश चोपड़ा की कमी खली, जो होते तो शाहरुख का सही मार्गदर्शन करते। 
 
दुष्प्रचार का शिकार 
इधर शाहरुख खान की फिल्में असफल हो रही थीं तो दूसरी ओर उनके खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हो गया। शाहरुख को लेकर कई झूठी बातें सोशल मीडिया पर प्रचारित की गईं। उनकी सोच को दूषित बताते हुए ऐसे कई मैसेज वायरल हुए जिसकी सत्यता की जांच किए बिना लोगों ने सच मान लिया। सोशल मीडिया की ताकत से सभी परिचित हैं। इस तरह की निराधार बातों ने शाहरुख की इमेज को भारी धक्का पहुंचाया। मानो या न मानो, लेकिन इससे भी शाहरुख की फिल्मों के प्रदर्शन पर असर हुआ। शाहरुख बड़बोले हैं। आत्मविश्वास ओवरफ्लो हो जाता है। इससे भी कई लोग उनके आलोचक हैं और उन्होंने दुष्प्रचार मुहिम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 
 
निजी जीवन में भी उथल-पुथल 
कहते हैं कि वक्त बुरा हो तो मुसीबत चारों ओर से आने लगती है। शाहरुख की फिल्में नहीं चल रही थीं। दुष्प्रचार चल रहा था। ब्रेक लिए शाहरुख घर पर वक्त बीता रहे थे। ऐसे में उनके बड़े बेटे आर्यन खान ड्रग्स मामले को लेकर फंस गए। आर्यन के पास कुछ मिला नहीं, लेकिन सुपरस्टार के बेटे होने की कीमत चु्काते हुए उन्हें कुछ दिन सलाखों के पीछे बिताने पड़े।



शाहरुख ने अपने सुपरस्टार होने का कोई भी नाजायज फायदा नहीं उठाया और एक आम आदमी की तरह कानून का सहारा लेकर अपने बेटे के लिए लड़ाई लड़ी। शाहरुख को इस तरह से चोट पहुंचाने वाले भूल गए कि आखिर वो एक असली ‘पठान’ है। 
 
पठानी कैरेक्टर 
शाहरुख खान अपने आपको आधा हैदराबादी और आधा पठान मानते हैं, लेकिन पठान वाले गुण उनके अंदर ज्यादा सक्रिय हैं। एक पठान कभी हार नहीं मानता। कितनी भी कोशिश कर लो, उसे गिरा दो, अधमरा कर दो, वह फिर खड़ा होता है। शाहरुख खान का करियर ग्राफ देखा जाए या फिर उनका व्यक्तित्व पढ़ा जाए, वे कभी भी झुके नहीं। अडिग रहे चाहे सामने कितनी बड़ी ताकत न हो। 2018 में ब्रेक लेने के बाद उन्होंने अपने अंदर शक्ति का फिर संचार किया और तीन बेहतरीन फिल्में चुनीं, जिसमें से एक पठान है। वे साबित करना चाहते हैं कि किंग खान अभी जिंदा है। पठान की रिकॉर्डतोड़ सफलता से यह बात उन्होंने साबित भी कर दी है। 


 
व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान मुसीबत में ही होती है और शाहरुख ने अपना कैरेक्टर दिखाया। पठान के रिलीज के पहले ही फिल्म की हवा बिगाड़ने की कोशिश शुरू हो गई थी। बॉयकॉट बॉलीवुड की आग को भड़काने के लिए बिकिनी के रंग को धर्म के चश्मे से देखा गया और फिल्म को रिलीज नहीं होने की धमकी दी गई। शाहरुख ने इस पर चुप्पी बांध ली जिससे साफ इशारा था कि वे इस बार भी नहीं झुकेंगे क्योंकि पहले भी उनकी फिल्म को रिलीज से रोकने की कोशिश की गई थी। 
 
उन्होंने अपनी बात रखने बेहतरीन मंच चुना कोलकाता फिल्म फेस्टिवल। वहां शाहरुख ने कहा इससे फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया क्या करती है, हमारे जैसे लोग हमेशा सकारात्मक रहेंगे। इस मंच से की गई यह गंभीर बात सीधे लोगों के दिल को छू गई और वहां से परिदृश्य बदलने लगा। हालात यह हो गए कि पीएम को एक बैठक में इस तरह की बातें करने वालों को इससे बचने के लिए कहना पड़ा। यही से परिदृश्य बदलने लगा। पठान को रिलीज के पहले से ही दर्शकों का समर्थन मिलने लगा और फिल्म पहले शो से ही ब्लॉकबस्टर हो गई। 
 
माय नेम इज़ खान, जीतना मेरा काम 
ऐसा नहीं है कि शाहरुख खान का मुकाबला विपरीत परिस्थितियों से पहली बार हुआ। पहले भी कई बार वे घिर चुके हैं, लेकिन इस बार यह युद्ध इसलिए अलग था क्योंकि फिल्में भी नहीं चल रही थी इसलिए किंग खान का सिंहासन कमजोर हो चला था। अपने एटीट्यूड और बड़बोलेपन के कारण शाहरुख पहले विवादों का शिकार हो चुके हैं। जब इंडस्ट्री में कदम रखा था तो आईएम बेस्ट का नारा बार-बार बुलंद करते रहना लोगों की नाराजगी का कारण बना। लगातार पुरस्कार मिले तो दाल में काला जैसे आरोप लगे। वानखेड़े स्टेडियम में गॉर्ड से भिड़ लिए। माय नेम इज़ खान के प्रदर्शन के दौरान भी फिल्म की रिलीज को अड़चनों का सामना करना पड़ा। सलमान खान से पार्टी में विवाद हुआ। फरहा खान के पति शिरीष कुंदर से जा भिड़े थे। लेकिन इन विवादों से वे विजेता की तरह उबरे। कभी भी झुके नहीं।



कई बार कैरेक्टर निभाते-निभाते रीयल लाइफ में स्टार रील लाइफ जीने लग जाता है। डॉन करने के बाद शाहरुख इस कैरेक्टर में इतना रम गए थे कि रियल लाइफ में भी उनमें अकड़ आ गई थी। उसी दौरान उनके ज्यादातर विवाद हुए। उस समय वे ऐसे लोगों से भी घिरे थे जिन्होंने उनका अहित किया। लेकिन रील लाइफ में जिस तरह हीरो परेशानी झेलते हुए अंत में सब पर काबू पाता है उसी तरह शाहरुख खान रियल लाइफ में भी हीरो हैं। वे जुझारू हैं और आसानी से हार नहीं मानते। गिर के उठ खड़े होने की उनमें आदत है इसलिए तमाम विवादों के बावजूद भी लोकप्रिय बने रहे और पूरे दम के साथ उन्होंने मुकाबला किया। 
 
एक शाहरुख कई इंडस्ट्री के बराबर 
शाहरुख खान की मां ने कहा था कि यदि खर्चे कमाई से ज्यादा होने लगे तो खर्चे कम करने की बजाय कमाई बढ़ाने की सोचो। यह बात शाहरुख ने गांठ बांध कर रख ली और सदा उस पर अमल किया। शाहरुख ने कमाई के मामले में कई प्रयोग किए और दिखाया कि फिल्मों के अलावा भी लोकप्रियता को भुना कर कमाई की जा सकती है। इस मामले वे ट्रेंड सेटर और गेम चेंजर कहे जा सकते हैं। छोटे परदे की ताकत को उन्होंने समझा और इस पॉवरफुल माध्यम से उन्होंने दर्शकों को सिनेमाघरों की ओर खींचा। साथ ही उन्होंने शहर दर शहर घूम कर फिल्मों की पब्लिसिटी का सिलसिला शुरू किया। सोशल मीडिया के जरिये उन्होंने विभिन्न प्लेटफॉर्म्स को भी अपनाया और फिल्म का प्रचार किया। फिल्मों के अलावा विज्ञापन उन्हें पैसा कमाने के लिए बहुत ही अच्छा माध्यम लगा। कह सकते हैं कि फिल्मों से ज्यादा तो शाहरुख ने विज्ञापन के जरिये कमाया।



शाहरुख ने किसी भी उत्पाद करने का विज्ञापन से परहेज नहीं किया। वे कार से लेकर तो बनियान तक बेचते नजर आए। ज्वेलरी से लेकर तो हेयर आइल का विज्ञापन उन्होंने किया। फिल्म और विज्ञापनों के अलावा भी शाहरुख ने कमाई के नए तरीके खोज निकाले। वे शादियों में शिरकत करने के बदले में पैसा लेने लगे। ज्यादा पैसे मिले तो डांस भी कर लिया। शाहरुख ने फिल्म पुरस्कार समारोह में एंकरिंग और परफॉर्मेंस कर पैसे कमाने का नया रास्ता दिखाया। दुकान की ओपनिंग हो, कंपनी की वार्षिक मीटिंग हो, किताब का विमोचन हो या कॉलेज का समारोह। हर जगह शिरकत करने के बदले में शाहरुख ने पैसा लिया और दिखाया कि बिना फिल्म किए भी करोड़ों रुपये कमाए जा सकते हैं।

शाहरुख को जो लोकप्रियता विदेश में प्राप्त है वो किसी भी बॉलीवुड स्टार को नहीं मिली है। आप अमेरिका चले जाएं या अफगानिस्तान, बर्लिन चले जाएं या दुबई, हर जगह आपको किंग खान का फैन मिलेगा। शाहरुख ने डॉलर सिनेमा को पहचान दी और बढ़ाया। विदेश में उनकी बनी पहचान ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय सितारा बनाया। खाड़ी देशों में तो उन्हें बहुत पसंद किया जाता है और वे राजनीतिक निर्णय बदलवाने की हैसियत भी रखते हैं। एक शाहरुख कई इंडस्ट्री के बराबर हैं। रेड चिलीज़ नामक बैनर तले वे फिल्में और ओटीटी कंटेंट का निर्माण कर रहे हैं। वीएफएक्स यूनिट भी है। कई जगह किंग खान का पैसा लगा हुआ है। वे जब सोते हैं तब भी उनके लिए कंपनियां पैसा कमाती हैं। कई हॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ से शाहरुख धन कमाने के मामले में आगे हैं।  

 
पठान की सफलता के मायने
पठान की रिकॉर्ड तोड़ सफलता दर्शाती है कि अभी भी शाहरुख खान लोगों के दिलों पर राज करते हैं। अभी भी उनमें दम है। उन्हें चूका हुआ मानने वाले चुप्पी साधे हुए हैं। इस फिल्म की सफलता दर्शाती है: 
शाहरुख खान की जवान और डंकी इस वर्ष प्रदर्शित होने वाली 2 अन्य फिल्में हैं। 'जवान' में उनका एक्शन अवतार फिर देखने को मिलेगा। फिल्म का निर्देशन एटली ने किया है। डंकी के निर्देशन की बागडोर राजकुमार हिरानी ने संभाल रखी है। शाहरुख-हिरानी का कॉम्बिनेशन क्या गजब ढाएगा, कल्पना नहीं की जा सकती है। तभी तो शाहरुख के फैंस कहते हैं: 
 
"पठान" तो झांकी है। 
अभी ''डंकी'' और "जवान" बाकी है।। 

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