रोजे रखने का कारण
मुस्लिम धार्मिक मान्यताओं अनुसार साल 610 में हजरत मोहम्मद साहब को लेयलत उल-कद्र के मौके पर कुरान शरीफ का ज्ञान प्राप्त हुआ था। कहा जाता है कि तभी से रमजान को इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र महीना माना जाने लगा। ऐसे में नौवें महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग अल्लाह के नाम का रोजा रखते हैं। मान्यता है इस महीने में जो कुरान की पवित्र पुस्तक को पढ़ता है उसे खुदा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस्लामी मान्यताओं के अनुसार रोजे का अर्थ भूखे या प्यास रहना नहीं है। असल में रोज के माध्यम से इंसान अपनी इच्छाओं पर काबू रखना सीखना है। रमजान का महीना सब्र और सहनशीलता के साथ आध्यात्मिक शुद्धि का महीना होता है।
यह भी मान्यता है कि 624 ईस्वी में पैगंबर हजरत मुहम्मद ने बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी। तब अपनी सफलता की खुशी में उन्होंने लोगों का मुंह मीठा कराया था और पहली बार पैगंबर मुहम्मद ने ही ईद मनाई थी।
रमजान समाप्त होने के बाद ईद का जश्न इस बात का भी प्रतीक है कि रोजे रखने वाले अपने संयम की परीक्षा में कामयाब हुए। ईद के दिन इस्लाम धर्म के लोग अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और करीबियों के साथ खुशियां बांटते हैं।
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