तमिलनाडु में पिछले 8 सालों में कम-से-कम 20 नीट प्रतियोगी आत्महत्या कर चुके हैं। राज्य की मुख्य पार्टियां भी नीट को हटाना चाहती हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल रही है। आखिर तमिलनाडु में नीट का इतना विरोध क्यों है? तमिलनाडु में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा ने हाल ही में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक छात्रा ने साल 2021 में 12वीं की परीक्षा पास की थी। वह पिछले 3 सालों से नीट-यूजी की परीक्षा दे रही थी, लेकिन सफल नहीं हो पा रही थी। इस साल 4 मई को होने वाली नीट की परीक्षा को लेकर वह तनाव में थी।
इस घटना के बाद तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके (ऑल इण्डिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम) के महासचिव के. पलानीस्वामी ने सत्ताधारी पार्टी डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कषगम) को घेरा है। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, 'डीएमके ने यह कहकर कि अगर वह सत्ता में आई तो तमिलनाडु में नीट नहीं होगा, झूठ बोला है और छात्रों को धोखा दिया है। क्या नीट की वजह से लगातार होती मौतें डीएमके के लिए चिंता का विषय नहीं है?'
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु में पिछले 8 सालों में 20 नीट प्रतियोगी आत्महत्या कर चुके हैं। इस वजह से यह राज्य में एक बड़ा मुद्दा है। राज्य की दोनों बड़ी पार्टियां 'डीएमके' और 'एआईएडीएमके' नीट का विरोध करती हैं। दोनों पार्टियां राज्य विधानसभा में नीट के खिलाफ प्रस्ताव भी पारित करवा चुकी हैं।
सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत
एमबीबीएस और बीडीएस जैसे अंडर ग्रेजुएट मेडिकल कोर्सों में दाखिले के लिए होने वाली 'नीट-यूजी' यानी 'राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा' में कक्षा 12वीं पास करने के बाद बैठा जा सकता है। इसके जरिए युवा विद्यार्थियों को देश के सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों में दाखिला मिलता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले दशक में मेडिकल सीटों के लिए होने वाली परीक्षा के प्रारूप में काफी बदलाव हुए। साल 2013 से पहले मेडिकल सीटों पर दाखिले के लिए कई अलग-अलग परीक्षाएं होती थीं। कई राज्य और मेडिकल कॉलेज अपनी अलग परीक्षाएं करवाते थे, वहीं केंद्रीय स्तर पर ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट लिया जाता था।
साल 2013 में पहली बार नीट परीक्षा करवाई गई। इसके बाद के कुछ सालों में कई बदलाव और विवाद हुए जिसके बाद 2017 से हर साल नीट की परीक्षा करवाई जाने लगी। मेडिकल सीटों पर दाखिले के लिए नीट को अनिवार्य कर दिया गया। तमिलनाडु ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी गुहार लगाई गई लेकिन कोर्ट ने कोई राहत देने से इंकार कर दिया।
तमिलनाडु में कैसे होता था दाखिला?
'जर्नल ऑफ मेडिकल एविडेंस' में छपे एक रिसर्च आर्टिकल के मुताबिक तमिलनाडु में भी मेडिकल सीटों पर दाखिले के लिए राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षा हुआ करती थी। लेकिन साल 2006 में एक विशेषज्ञ कमेटी बनाई गई जिसने प्रवेश परीक्षा को खत्म करने की सिफारिश की। कमेटी ने बोर्ड परीक्षा और प्रवेश परीक्षा में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों के प्रदर्शन का विश्लेषण किया। कमेटी ने कहा कि प्रवेश परीक्षा ग्रामीण इलाकों में अपनी भाषा में पढ़ाई कर रहे गरीब बच्चों के लिए मुकाबले को कठिन बना देती है और इससे छात्रों पर तनाव पड़ता है।
कमेटी ने यह भी पाया कि प्रवेश परीक्षा में कोचिंग लेने वाले विद्यार्थियों को ज्यादा सफलता मिलती है और इससे कोचिंग संस्कृति को बढ़ावा मिलता है। इससे वे ग्रामीण और गरीब बच्चे पिछड़ जाते हैं, जो कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते। इसके बाद राज्य में प्रवेश परीक्षा को खत्म कर दिया गया और 12वीं के अंकों के आधार पर मेडिकल सीटों पर दाखिला होने लगा।
तमिलनाडु को नीट से क्या है परेशानी?
नीट के अनिवार्य होने के बाद तमिलनाडु की पुरानी व्यवस्था खत्म हो गई। मेडिकल कोर्स में दाखिले के लिए नीट में सफल होना जरूरी हो गया। इससे राज्य के विद्यार्थियों पर दबाव बढ़ा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2017 में एक दलित लड़की अनिता ने राज्य की बोर्ड परीक्षाओं में 1200 में से 1176 अंक हासिल किए। लेकिन वह नीट में सफल नहीं हो सकीं। उनका कहना था कि वह नीट को समझ नहीं पाई, क्योंकि यह सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रम पर आधारित होता है और गरीब परिवार से आने के चलते वह कोचिंग नहीं ले सकतीं।
अनिता सुप्रीम कोर्ट में नीट को चुनौती देने वाले एक मामले में याचिकाकर्ता भी थीं। जब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि नीट के अलावा किसी और तरीके से मेडिकल सीट पर दाखिला नहीं दिया जाएगा तो इस फैसले के 9 दिन बाद अनिता ने आत्महत्या कर ली। घटना के बाद राज्य में नीट का विरोध तेज हो गया। अभी भी तमिलनाडु में नीट को पसंद नहीं किया जाता है।
आलोचकों का कहना है कि नीट के सीबीएसई के पाठ्यक्रम पर आधारित होने की वजह से इसमें तमिल बोर्ड के विद्यार्थियों को नुकसान उठाना पड़ता है। वे यह भी कहते हैं कि तमिलनाडु में बड़ी संख्या में विद्यार्थी तमिल भाषा में ही पढ़ाई करते हैं और वे नीट परीक्षा में अपनी पूरी क्षमता से प्रदर्शन नहीं कर पाते। इसके अलावा यह तर्क भी दिया जाता है कि नीट की वजह से राज्य की शिक्षा प्रणाली पर नकारात्मक असर हो रहा है।