यह गुरु सबसे न्यारा

मंगलवार, 15 जुलाई 2014 (16:18 IST)
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हिन्दी पत्रकारिता की दिग्गज हस्तियों में से एक प्रभाष जोशी का जन्म आज के ही दिन (15 जुलाई, 1937) को मध्यप्रदेश में हुआ था। इस मौके पर प्रभाष जी के शिष्य स्व. आलोक तोमर द्वारा 'प्रभाष जोशी-60' (शब्द और उनके सम्मान में कुछ और शब्द) पुस्तक में लिखा गया लेख वेबदुनिया के पाठकों के प्रस्तुत कर रहे हैं। यह पुस्तक 1997 में प्रकाशित हुई थी।

प्रभाष जोशी मेरे जन्मदाता नहीं हैं लेकिन जीवन में उन्हीं का दिया जी रहा हूं। जिन्हें यह उलट बाँसी लगे वे जनसत्ता के इतिहास पर नजरें डालें और याद करें कि कैसे चंबल घाटी के एक देहाती से कस्बे से आए एक बालक को प्रभाष जी ने पूरे एक दशक तक जीने के नियम-कायदे, सलीके और शिष्टाचार सिखाए और महानगर में जीने लायक बनाया। वे मेरे ऐसे गुरु हैं जिन्हें मैं कभी गुरु दक्षिणा नहीं दे पाया, देने का अवसर आया तब तक शिष्यत्व के औपचारिक दायरे से च्युत हो चुका था।

और लीजिए प्रभाष जी साठ के हो गए। उनके साथ, उनकी आत्मीय अंतरंगता में उनके व्यक्तित्व की एक गुत्थी मुझसे कभी नहीं सुलझी थी। प्रभाष जी जब जो करते हैं तब वे सिर्फ वही करते हैं। आत्मा की समस्त संचित शक्ति लगाकर। लेकिन अचानक रातोंरात या दिनोंदिन ऐसा होता है कि उनका मन कहीं और रम जाता है और फिर आपको लगता भी नहीं कि जो पिछला किया है वह इन्हीं का था। 'जनसत्ता' निकला तो अठारह-अठारह घंटे डेस्क पर जमे हुए हैं, आधी रात के बाद भी आ कर पहले पन्ने का ले आउट बदल रहे हैं- दिन-रात एक कर रहे हैं। जनसत्ता की सफलता का कीर्तिमान बना रहे हैं और पहले पन्ने पर छाप रहे हैं कि अब और कॉपी नहीं छाप सकते-आप मिल बांटकर पढ़िए। और फिर अचानक जयप्रकाश नारायण के गैर अंग्रेजी सरकार के अधूरे सपने को पूरा करने का पाखंड ही सही काम विश्वनाथ प्रताप सिंह ने हाथ में लिया तो प्रभाष जी लगातार जहाज में हैं। कभी पटना, कभी मुंबई, कभी लखनऊ तो कभी बैंगलोर। लालू यादव को समझा रहे हैं, देवीलाल को राजी कर रहे हैं। अटलबिहारी वाजपेयी के घर घंटों बंद कमरे में बैठे हैं।

अखबार में क्या हो रहा है। पता ही नहीं। लेकिन यह हमारी गलतफहमी होती थी क्योंकि पता नहीं देश के किस कोने से, किस माध्यम से ऐक पर्चीनुमा नोट आता था। भाषा होती थी- 'भैया, ऐसे तो नहीं होता।' या 'महामहिम, आप अपनी और अपने समाचार पत्र की सीमाओं को याद रखें - आपका अकिंचन संपादक।' प्रभाष जी के इस मेरे शब्दों में ही विभाजित व्यक्ति की गुत्थी सुलझाई उनकी पूज्या मां ने। इसी किताब में उन्होंने अपने बेटे के स्वभाव की याद करते हुए लिखा है- काम करेगा तो ऐसे जैसे दुनिया में इसके अलावा और कोई काम ही न हो। छोडूंगा तो ऐसे जैसे वह काम अभी किया ही नहीं हो। मौसम तो फिर भी लौटकर आ जाते हैं पर 'परभाष' की काम की दिशा दोबारा नहीं बदलती।

1983 में जब जनसत्ता के निकलने का ऐलान हुआ था तो अपन ने अर्जी नहीं दी थी। 'हिन्दी एक्सप्रेस' का असफल प्रयोग याद था और तब यह सोच रहा था कि एक पक्की (यूएनआई) की नौकरी छोड़कर इस प्रयोग में हिस्सा क्यों लूं। एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र बहुत कृपापूर्वक नौकरी के इम्तिहान में ले गए थे, अर्जी भी वहीं भरवाई थी और फिर परीक्षा और इंटरव्यू हुए थे और धुप्पल में अपन पास भी हो गए थे। सच तो यह है कि बहुत अनमने भाव से काम शुरू भी कर दिया था।

तब यह पता नहीं था कि प्रभाष जोशी नाम का यह व्यक्ति अपने आपको पूर दांव पर लगाकर 'जनसत्ता' का सपना पूरा करने जा रहा है। मैंने एक्सप्रेस समूह के सूत्रधार स्वर्गीय रामनाथ गोयनका को लिखी गई प्रभाष जी की वह चिट्‍ठी देखी है और वह मुझे उन्होंने नहीं दिखाई है, जिसमें एक्सप्रेस समूह के प्रधान संपादक बनने का प्रस्ताव उन्होंने विनम्रतापूर्वक लेकिन पक्केपन से ठुकरा दिया था और कहा कि निकालेंगे तो वे जनसत्ता ही। गीता की एक पंक्ति भी खाँटी टकसाली अंग्रेजी में लिखी उस चिट्‍ठी में लिखी थी- 'सम दु:खे, सम सु:खे लाभाम् लाभौ जया जयौ'

भाषा को लेकर प्रभाषजी के सरोकारों की पवित्रता में तो शायद ही कभी किसी को संदेह रहा हो। तब तक वो संपादक आज कल के बापुओं की मुद्रा में विराजकर प्रवचन देते थे। कोई हाड़ मांस की प्राण संपन्न भाषा में बोलता ही नहीं था। प्रभाष जी ने हिन्दी पत्रकारिता को एक नया मुहावरा दिया, वाचिक परंपरा को लिखे हुए शब्दों की परंपरा से जोड़ा और तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों को छोड़ भी दिया जाए तो दर्जनों क्षेत्रीय अखबारों ने भाषा के इस मुहावरे को अपनी शक्ति बनाया और सफल भी हुए।

लेकिन प्रभाष जोशी नाम की इस घटना का आशय क्या सिर्फ उनकी भाषाई प्राथमिकताएं और भाषा के एक सामाजिक मानक की स्थापना करना ही है। है लेकिन सिर्फ वही नहीं। प्रभाष जी के जीवन की यात्रा को ध्यान से देखिए तो उसमें फटाफट लिए गए और जीवन भर व्याप्त रहे परिणामों वाले फैसले ज्यादा हैं। लेकिन इतनी प्रहर हड़बड़ी के बीच उनमें दिशा की सुनिश्चितता और लक्ष्य पर नजर सदा साफ रही है। राजनीति के इतने घाटों पर इतने अधिकारपूर्वक उनका आना-जाना रहा है कि छोटे-मोटे नहीं, अच्छे खासे मठाधीश तो वे हो ही सकते थे। लेकिन जेपी से साथ, विश्वनाथ प्रताप सिंह से दोस्ती, नरसिंहराव से अपनापन और चंद्रशेखर से नितांत अनौपचारिक रिश्तों के बावजूद उन्होंने राजनीति की जगत गति को अपने ऊपर व्याप्त नहीं होने दिया। कहने को बहुत लोग कहते हैं कि राज्यसभा का सदस्य नहीं बनाए जाने से नाराज होकर वे भाजपा के खिलाफ हो गए थे लेकिन वे प्रभाष जोशी को और उनकी निस्संगता के प्रभामंडल को नहीं जानते। जिस तरह के आड़े-तिरछे बेसुरे लोग सत्ता की गलियों में पहुंच गए हैं वहीं पता नहीं कितनी बार प्रभाषजी के लिए लाल कालीन बिछाए गए हैं लेकिन प्रभाष जी जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं और उसका फलित, उसकी निष्पत्ति क्या होती है।

ठेठ मालवा के आष्टा में जन्मे प्रभाष जी ने मैट्रिक तक पढ़ाई की और छोड़ दी। वे पड़ोस के एक गांव में, पढ़ाने चले गए और फिर भूदान यात्रा पर निकले, विनोबा के काफिले में शामिल हो गए। इस बीच छोटी-मोटी नौकरी भी की, जिनमें एक चपरासी की भी थी। लेकिन सर्वोदय और भूदान से उनकी लिखे हुए शब्दों से दोस्ती हुई और सर्वोदय के वे सरोकार अब भी उनमें जीवित हैं। और जीवन शैली में भी दम-दमाल की नहीं। क्या आपने कभी सुना है कि चौबीस साल से ज्यादा, इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता जैसे अखबारों की संपादकी-प्रधान संपादकी करने की हैसियत रखने वाला कोई भी पत्रकार बहुत बाद में एक काला सफेद टीवी खरीदे वह भी आधे उधार पर। बाद में रंगीन टीवी और वीसीआर तो उन्हें जबरन किस्तों पर खरीदवाया गया। अभी चार वर्ष पहले तक उनके पास अपना मकान नहीं था और फिर एक्सप्रेस की हाउसिंग सोसायटी का एक सादा सा फ्लैट उनके पूरे जीवन की भौतिक संचित निधि है। अपनी कार आज तक नहीं है। जिंदगी भर, अपेक्षाकृत दरिद्र माने जाने वाले दिल्ली के जमुनापार इलाके में रहे और आज भी रह रहे हैं।

इसी सिलसिले में एक मनोरंजक बन गया किस्सा भी याद आता है। एक बार प्रभाष जी का फोन आया कि पूरे परिवार को निजी यात्रा पर कहीं शायद कानपुर जाना है और वे कंपनी की ओर से मिलने वाले जहाज के, या एयर कंडीशंड क्लास के टिकट पर नहीं जाना चाहते। वे पूछ रहे थे कि क्या मैं उनको और परिवार को सादा दूसरे दर्जे के टिकट दिलवा सकता हूं। उसके बाद झमेला शुरू हुआ। वेटिंग लिस्ट में टिकट खरीदे गए। जनसत्ता के तीन रिपोर्टरों को उन्हें कन्फर्म करने पर लगाया गया। पूर दिन भागदौड़ चली। टिकट फिर भी कन्फर्म नहीं हुआ और प्रभाष जी को शताब्दी के, उन्हीं के शब्दों में, रईस टिकट पर जाना पड़ा। सरोजनी नायडू कहा नहीं करती हैं कि महात्मा गांधी को गरीब रखने में बहुत पैसा और बहुत मेहनत खर्च करनी पड़ती है। प्रभाष जी का तो गांधी से मन और आत्मा का रिश्ता है, वे जरूर यह जानते होंगे।

अखबारी दनिया के बाशिंदों को प्रभाष जी कई बार अजूबा लगते होंगे। सामाजिक कर्मकांडों में उनका विश्वास कई बार विस्मय की सीमा तक पहुंच जाता है। अवसर के अनुरूप धोती कुर्ता से लेकर तीन पीस का सूट टाई के साथ, कभी भी आप उन्हें पहने देख सकते हैं। कभी वे आपको फाइव स्टार होटल में खाना खिलाने ले जाएंगे तो कभी आपको बड़े होटल में ठहरने को लेकर एक 'निजी' नोट भेज देंगे या एयर कंडीशनर खरीदने की खबर सुनकर कहेंगे कि इसकी क्या जरूरत थी। उतने ही पांव पसारो, जितनी लंबी चादर हो। खुद भी एसी बाईपास सर्जरी के बाद ही काफी मनाने के बाद लगाने दिया। टकसाली अंग्रेजी लिखेंगे, उसे विलायती उच्चारण से बोलेंगे भी और फिर अपने जैसे लोग खोटी अंग्रेजी लिखने या बोलने की कोशिश करें तो उसे 'गेल्या' कहेंगे।

अपने बेटे को, बगैर उनके कहे, एक केंद्रीय मंत्री से कहकर नौकरी दिलवाने की सर्वथा तार्किक सिफारिश पर उस मंत्री से ही सुनकर आपको झाड़ लगाएंगे और फिर तब वे मानव संसाधन मंत्री अर्जुनसिंह के पास यह कहने चले जाएंगे कि विष्णु चिंचालकर के लिए इंदौर में एक संस्था बननी चाहिए। जिंदगी भर विदेश नहीं जाएंगे और विश्वकप क्रिकेट को कवर करने के लिए दुनिया घूमने जाएंगे। कुमार गंधर्व के निरगुनी भजन सुनकर सम्मोहित हो जाएंगे, आंखों की कोरें गीली हो जाएंगी और उसी शाम लॉन टेनिस के मैदान में पीट सम्प्रास के खेल पर कविता की भावुवकता वाला लेख लिख रहे होंगे।

संघ परिवार को 'सकल पाप का मूल' मानने और मनवाने का अभियान छेड़ेंगे और मुरली मनोहर जोशी के तत्वावधान में स्वदेशी के पक्ष में ऐसे भाषण देंगे कि संघ परिवार के लोग ही उसके कैसेट बेचते नजर आएं। आपको प्यार करेंगे, प्रोत्साहन देंगे, पदोन्नतियां देंगे, सारे गुनाह माफ करेंगे तो ऐसे कि जैसे दुनिया मेरे ठेंगे पर। लेकिन फिर अचानक एक दिन आप से कह देंगे (मैं अपनी बात कर रहा हूं) कि अब यहां तुम्हारी समाई नहीं होगी। इस्तीफा मंजूर करने के बाद सोलह पन्ने की सलाह देने वाली भावुक सी चिट्ठी लिखेंगे और पिर लाख रुपए की फैलोशिप दिलवा देंगे और बार-बार पूछेंगे कि फैलोशिप पर लिखी किताब कप छप रही है?

प्रभाष जोषी हिन्दी पत्रकारिता के आखिरी महान संपादक हैं। या शायद महान नहीं, संपूर्ण मनुष्य। महान होते हैं तो मनुष्य नहीं रह जाते। प्रभाष जी मनुष्य हैं, यही काफी है लेकिन संपादक नाम की संस्था को संपूर्ण बनाने का उक्त योगदान कम नहीं है। अनुवाद से लेकर शीर्षकों की सही-सही परख और रचना तक, खुद पेज बनवाने और ले आउट बनाने से लेकर बाबरी मस्जिद पर ठाठ से छक्का मारने वाले संपादकीय लिखने तक की दम क्षमता और दुस्साहस। यह सब एक साथ किसी और संपादक में नहीं मिलता। मेरे संपादक जी, अर्थात प्रभाष जी में है। मुझे उन पर मान भी है और एक सर्वथा निजी शिकायत भी जैसा शुरू में कहा, पत्रकारिता का यह जीवन में, उन्हीं का दिया जी रहा हूं। मुझसे उन्हें बहुत थोडा संतोष भी मिला होगा लेकिन मेरी करनी-अकरनी से वे बहुत आहत भी हुए हैं।

प्रभाष जी ने तो मेरे लिए समुद्र खोल दिया था पर मैं अंजुरी ठीक से बांध ही नहीं पाया। अंजुरी बांधने का होश जब तक आया तब तक समुद्र का उद्दाम ज्वार उतर चुका था और तट पर केवल शंख सीपियां बिखरे रह गए थे। प्रभाष जी, आपके इस पथ भ्रष्ट, लक्ष्य च्युत, दिशा भूले शिष्य ने मन में एक सपना जिंदा रखा था कि इसी समुद्र की एक सार्थक लहर बनकर अपना होना सिद्ध करूंगा। उसी सपने के सहारे अपने आपको गति में रखा था। लेकिन आपने वह सपना पूरा होने के पहले नींद तोड़ दी। और लहर का क्या हुआ? एक लहर सागर से मिलकर गाना भूल गई। (साभार)

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