लोक की दिवाली पर बाजार का कब्जा

दीपावली का पर्व अमावस्या को मनाया जाता है और इस मौके पर रात में दीये जलाए जाते हैं। इससे यह प्रतीक बेहद लोकप्रिय हो गया है कि यह अंधकार पर प्रकाश की और असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है। इस प्रतीकवाद की पुष्टि के लिए ही संस्कृत की उक्ति 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' पेश की जाती है। यह एक ऐसा प्रतीकवाद है, जो आधुनिक भारतीय चित्त को बहुत भाता है, क्योंकि इससे उसका राष्ट्रीय और सामाजिक गौरव बढ़ता है। 
 
ज्यादा सच तो यह आख्यान प्रतीत होता है कि 14 वर्ष का वनवास काटने और लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद राम के अयोध्या लौटने पर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था और खुशियां मनाई थीं तभी से दीपावली मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस लिहाज से यह सुशासन कायम होने का उत्सव है। भारत में सुशासन की कल्पना राम-राज्य से जुड़ी रही है। लेकिन हमारे देश ने इतने लंबे समय तक सुशासन ही नहीं, शासन का भी ऐसा नितांत अभाव देखा है कि राम-राज्य की कसक उसके अंतरमन में बैठ गई है। आम देशवासियों के इस स्वप्न को जिस व्यक्ति ने पुनर्जाग्रत किया था, उसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। 
 
आजादी के बाद देश की जनता को महात्मा गांधी की कल्पना के अनुरूप राम-राज्य नहीं मिला। उसे जो मिला था, वह शुद्ध कांग्रेसी राज था। लंबे समय तक चले कांग्रेसी राज के अलावा देश ने थोड़े-थोड़े अरसे के लिए गैर कांग्रेसी राज का स्वाद भी चखा। इसी दौरान तथाकथित 'रामभक्त सुशासकों' ने भी सत्ता के सूत्र संभाले और अभी भी वही जमात सत्ता पर काबिज है। लेकिन जिस सुशासन की कल्पना गांधी ने की थी उससे देशवासियों का परिचय होना अभी भी बाकी है। 
 
वैसे दीपावली खासतौर पर लक्ष्मी की पूजा-आराधना का पर्व है। लक्ष्मी यानी धन-धान्य और ऐश्वर्य की देवी। इस आधार पर हमारा देश जितना आध्यात्मिक है, उतना ही भौतिकवादी भी। हम ज्ञान के साथ-साथ ही समृद्धि की भी उपासना करते आए हैं, क्योंकि हमें अपने परलोक को ही नहीं, इहलोक को भी सुंदर और सफल बनाना है। 
 
लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। हमारे धर्म-शास्त्रों में विष्णु को इस सृष्टि का सूत्रधार माना गया है। वे ही सृष्टि का संचालन और पालन-पोषण करते हैं। जाहिर है कि इस दायित्व का निर्वाह वे अकेले नहीं कर सकते। इसमें उन्हें अपनी पत्नी लक्ष्मी का सहयोग चाहिए। इन पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से हमारे शास्त्र-रचयिता ऋषियों-मनीषियों ने संभवत: यह संदेश देना चाहा हो कि हमें धन की उपासना तो अवश्य करनी चाहिए लेकिन वह उपासना इस तरह हो, जैसे पूजा की जा रही हो अर्थात भौतिकता के साथ पवित्रता का भाव भी जुड़ा हुआ हो। 
 
अनैतिक साधनों से अर्जित किया गया धन जीवन में अभिशाप ही पैदा करता है। इसकी पुष्टि हमारे देश के मौजूदा हालात देखकर भी होती है। देश ने विदेशी दासता से आजाद होते ही धन की उपासना शुरू कर दी थी। देशी शासकों ने देशवासियों को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए तरह-तरह के यत्न शुरू किए। पंचवर्षीय योजनाएं बनाई जाने लगीं। बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाए गए। जीवनदायिनी नदियों का प्रवाह रोककर या मोड़कर बड़े-बड़े बांध बनाए गए। हरित क्रांति के जरिए देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना। आर्थिक असमानता दूर करने के लिए जहां जमींदारी प्रथा खत्म की गई तो वहीं सामाजिक गैरबराबरी खत्म करने के लिए दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर दिए गए। स्पष्ट तौर पर यह उपासना समाजवादी संपन्नता की थी।
 
लेकिन चूंकि इस संपन्नता के लिए अपनाए गए तौर-तरीके कतई समाजवादी नहीं थे इसलिए गरीबी के विशाल हिन्द महासागर में समृद्धि के कुछ टापू ही उभर पाए। बहुराष्ट्रीय वित्तीय सेवा कंपनी क्रेडिट सुइस की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट-2015 भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत का मध्यवर्ग दुनिया के कुल मध्यवर्ग का मात्र 3 फीसदी है, जबकि चीन में इस तबके की संख्या भारत से 10 गुनी ज्यादा है यानी दुनिया की कुल मध्यवर्गीय आबादी में एक-तिहाई हिस्सा चीन का है। 
 
जाहिर है कि देश में सपनों का सौदागर मध्यवर्ग अपनी हैसियत पर चाहे जितना इठला ले और कूद-फांद कर ले, पर दुनिया के पैमाने पर अभी उसकी कोई खास हैसियत नहीं बन पाई है। यह स्थिति तब है जबकि हम तथाकथित समाजवाद के रास्ते या कि मिश्रित अर्थव्यवस्था का पूरी तरह परित्याग कर चुके हैं। 
 
वर्ष 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार के खाली हो जाने से उपजे संकट से हमारी अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल गई। तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव और उनके वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की जोड़ी ने उदारीकरण यानी बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था का रास्ता अपनाया, जो कि पूंजीवाद का ही नया संस्करण है। इसे थोड़े कठोर शब्दों में इसे 'आवारा पूंजीवाद' भी कहा जा सकता है। 
 
भारतीय आर्थिक-दर्शन और जीवन-पद्धति के सर्वथा प्रतिकूल 'पूंजी ही जीवन का अभीष्ट है' के अमूर्त दर्शन पर आधारित इस नव उदारीकरण की अर्थव्यवस्था को लागू हुए दो दशक से भी ज्यादा समय हो चुका है और तब से लेकर आज तक हम एकाग्रभाव से बाजारवाद की ही पूजा-अर्चना कर रहे हैं। लक्ष्मी अब लोक की देवी नहीं, बल्कि ग्लोबल प्रतिमा बन गई हैं। उसकी पूजा में अब लोक-जीवन को संपन्न बनाने की इच्छा कम और खुद को समृद्ध बनाने की लालसा ज्यादा व्यक्त की जाती है। 
 
डिजाइनों और ब्रांडों के बोलबाले ने मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं और कुम्हार के कलाकार हाथों से ढले दीयों को भी डिजाइनर बना दिया है। डिजाइनर दीयों के साथ ही ब्रांडेड मोमबत्तियां और मोम के दीयों का भी चलन बढ़ गया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह अब ब्रांडेड मिठाइयों और मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चॉकलेटों ने ले ली है। 
 
दीपावली पर उपहारों और मिठाइयों के आदान-प्रदान का चलन पुराना है लेकिन पहले उनमें गहरी आत्मीयता होती थी। अब जिन महंगे उपहारों और मिठाइयों का लेन-देन होता है उनमें से आत्मीयता और मिठास का पूरी तरह लोप हो गया है और उनकी जगह ले ली है दिखावे और स्वार्थ ने यानी अब राजनीति के साथ-साथ हमारी संस्कृति और सामाजिकता भी बाजार के रंग में रंग गई है। दीपावली समेत हमारी लोक-संस्कृति से जुड़े तमाम त्योहारों, पर्वों और यहां तक कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले करवा चौथ और हरतालिका तीज जैसे व्रतों को भुनाने में भी बाजार अब पीछे नहीं रहता।
 
निस्संदेह बाजारवाद से देश में समृद्धि का एक नया वातावरण निर्मित हुआ है। महानगरों में एक बड़े वर्ग के बीच हमेशा उत्सव का माहौल रहता है, लेकिन उनके इस उत्सव में न तो बहुत ज्यादा सामाजिकता होती है और न ही इसके पीछे किसी प्रकार की कलात्मकता। उसमें जो कुछ होता है, उसे भोग-विलास या आमोद-प्रमोद का फूहड़ और बेकाबू वातावरण ही कह सकते हैं। 
 
यह सब कुछ अगर एक छोटे से तबके तक ही सीमित रहता तो कोई खास हर्ज नहीं था, 
लेकिन मुश्किल तो यह है कि 'यथा राजा-तथा प्रजा' की तर्ज पर ये ही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन पर हावी हो रहे हैं। जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनकी आमदनी सीमित है, उनके लिए बैंकों ने 'ऋणं कृत्वा, घृतम्‌ पीवेत' की तर्ज पर क्रेडिट कार्डों और कर्ज के जाल बिछाकर अपने खजाने खोल रखे हैं। लोग इन महंगी ब्याज दरों वाले कर्ज और क्रेडिट कार्डों की मदद से सुख-सुविधा के आधुनिक साधन खरीद रहे हैं। विभिन्न कंपनियों के शोरूमों से निकलकर रोजाना सड़कों पर आ रहीं लगभग 5 हजार कारों और शान-ओ-शौकत की तमाम वस्तुओं की दुकानों और शॉपिंग मॉल्स पर लगने वाली भीड़ देखकर भी इस वाचाल स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
 
कुल मिलाकर हर तरफ लालसा का तांडव ही ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। तृप्त हो चुकी लालसा से अतृप्त लालसा ज्यादा खतरनाक होती है। देशभर में बढ़ रहे अपराधों- खासकर यौन-अपराधों की वजह यही है। यह अकारण नहीं है कि देश के उन्हीं इलाकों में अपराधों का ग्राफ सबसे नीचे है जिन्हें बाजारवाद ज्यादा स्पर्श नहीं कर पाया है। यह सब कहने का आशय विपन्नता का महिमा-मंडन करना कतई नहीं है, बल्कि यह अनैतिक समृद्धि की रचनात्मक आलोचना है। ऐसी आलोचना नहीं होनी चाहिए क्या?

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