सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन का अंतरद्वंद

पिछले दिनों दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में आंदोलन के दौरान एक पोस्टर काफी प्रचारित हुआ। उसमें लिखा था - “एकलव्य शर्मिंदा है, द्रोणाचार्य जिंदा है।”
 
द्रोणाचार्य, एकलव्य, दोनों ही महागाथा, महाभारत के दो पात्र। यूं तो महाभारत के दो प्रमुख पात्र हमेशा से भगवान श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन ही माने जाते हैं। लेकिन जब भी बात एकलव्य की कहानी की आती है अर्जुन खलनायक बनकर उभरते हैं। हलांकि असली खलनायक होते द्रोणाचार्य हैं, लेकिन वजह अर्जुन बनाए जाते हैं। 
 
केवल एकलव्य ही नहीं सूतपुत्र कर्ण के सामने भी अर्जुन हमेशा से युवराज की भूमिका में रहे, जिसे सब बड़ी आसानी से मिला, जिसे महान धनुर्धर बनाने के लिए एकलव्य और कर्ण के अधिकार छीने गए। लेकिन क्या सच में अर्जुन उतना ही दोषी है? क्या ये अंतर्द्वंद अर्जुन को परेशान नहीं करता होगा? 
 
द्रोणाचार्य जो शिक्षक थे, उनका काम शिक्षा देना था फिर चाहे वो एक आदिवासी हो या सूत पुत्र, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अर्जुन को महान धनुर्धर बनाने की आड़ में जब दो काबिल योद्धाओं का अपमान हुआ होगा, तो क्या इस बात के लिए अर्जुन खुद को माफ कर पाया होगा? 
 
अर्जुन ने क्षत्रीय के घर जन्म लिया। इंद्र का बेटा था अर्जुन, लगनशील, धनुर्विद्या सीखने के लिए उसने कभी छोटा रास्ता नहीं अपनाया, चिड़िया की आंख भेदकर उसने जाहिर कर दिया था कि अर्जुन की एकाग्रता का जवाब नहीं। एकाग्रता और धनुर्विद्या में एकलव्य भी पीछे नहीं था, अभ्यास में बाधा बन रहे कुत्ते के मुंह को बाणों से भर देना वो भी उसे चोट पहुंचाए बिना, एकलव्य की एकाग्रता का ही परिणाम था, लेकिन इसमें अर्जुन की क्या गलती थी, कि द्रोण ने उसे सबसे बड़े धनुर्धर होने का आशीर्वाद दिया और एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिया। 
 
उस वक्त क्या महसूस किया होगा अर्जुन ने, वो केवल क्षत्रिय होने की वजह से तो अच्छा धनुर्धर नहीं था! मेहनत की थी, फिर जब सामने एक काबिल धनुर्धर एकलव्य आया होगा, तो क्या अर्जुन को हार का डर लगा होगा, नहीं एक काबिल प्रतियोगी को ऐसा डर क्यों सताएगा, वो तो हमेशा स्वस्थ प्रतियोगिता ही चाहेगा। 
 
लेकिन जब गुरुदक्षिणा में द्रोण की झोली में एकलव्य का अंगूठा देखा होगा तब अर्जुन की मनोदशा क्या होगी। क्या उसके मन में ये सवाल नहीं उठा होगा कि गुरु द्रोण को उनकी काबलियत पर शक है, तभी उसकी प्रतियोगिता ही खत्म कर रहे हैं वो? क्या खुद को कद में छोटा नहीं महसूस करने लगा होगा? जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने एकलव्य को हाथ के अंगूठे के बिना बाण चलाते देखा होगा, तो आत्मग्लानी नहीं हुई होगी उसे? 
 
अक्सर सिफारिशों की बैसाखियों का सहारा उन्हें चाहिए होता है जो काबिल न हों, लेकिन अर्जुन तो हर स्थिति से काबिल था। तभी तो भगवान श्रीकृष्ण ने भी पांचों पांडवों में से अर्जुन को अपना सखा बनाया, न युधिष्ठिर, न भीम न नकुल न सहदेव। सभी प्रिय भले रहे लेकिन मित्र अर्जुन ही बना। 
 
जब भी महाभारत में अर्जुन के सर्वश्रेष्ठ होने की बात आती है, कर्ण से उसकी तुलना होती है। जन्म से सूर्यपुत्र, कुल के पाण्डु पुत्र लेकिन नाम सूतपुत्र कर्ण। कर्ण, उसे भी शिक्षा देने से द्रोणाचार्य ने मना कर दिया, क्योंकि द्रोण केवल युवराजों को शिक्षा देते थे। कर्ण ने मजबूरन झूठ का रास्ता पकड़ा और परशुराम से शिक्षा ली। शिक्षा ने कर्ण को अंगराज तो बना दिया लेकिन ताउम्र अर्जुन और कर्ण कभी भाई बनकर नहीं हमेशा प्रतिद्वंदी बनकर रहे। 
 
कर्ण को तो पता भी चल गया था कि अर्जुन उसका भाई है, लेकिन अर्जुन तो कर्ण वध तक नहीं जान पाया था कि उसने अपने बड़े भाई की जान ली है। कथाएं कहती हैं कि कर्ण दानवीर था, महान योद्धा था तो इसमें अर्जुन की क्या गलती थी उसे कुल का नाम मिला और कर्ण को नहीं। दुर्योधन ने अपने मतलब के लिए कर्ण को अर्जुन के सामने खड़ा कर दिया, कर्ण ने भी कुंती को चार पांडवों को जीवित छोड़ने का वचन दिया लेकिन अर्जुन को नहीं। 
   
अर्जुन अपनी काबलियत से सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना। अगर असर केवल शिक्षा देने वाले का होता तो द्रोणाचार्य का बेटा अश्वथामा ज्यादा काबिल योद्धा बनता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कथाओं में कहानियों में अक्सर बताया गया है कि अर्जुन सबसे प्रिय शिष्य था द्रोणाचार्य का, उसे महान बनाने के लिए द्रोणाचार्य ने एकलव्य और कर्ण को शिक्षा नहीं दी। क्या सच में अर्जुन को अपने धनुष पर इतना यकीन नहीं था कि उसे अपनी मंजिल पाने के लिए दूसरों को रास्ते से हटाने की जरुरत पड़ती। अर्जुन दोनों हाथों से धनुष-बाण चलता था, तभी उसे सब्बेसाची कहा गया, ऐसी काबलियत किसी और में नहीं थी। 
 
लेकिन हकीकत तो ये है कि गुरु द्रोण पहले ही तय कर चुके थे अर्जुन ही द्रुपद नरेश से उनके अपमान का बदला लेगा। द्रुपद और द्रोण बचपन में दोस्त थे, तब द्रुपद ने उन्हें अपने राज्य का कुछ हिस्सा देने का वादा किया, बड़े होने पर जब द्रुपद राजा बने तो उन्होंने द्रोण को जमीन देने से मना कर दिया, एक ब्राह्मण को ये अपमान सहन नहीं हुआ और इसका बदला लेने के लिए उन्होंने अर्जुन को तैयार किया। इसमें अर्जुन का क्या दोष?
 
एक शिष्य ने वादा पूरा किया, द्रुपद को बंदी बनाकर गुरु द्रोण के चरणों में ला फेंका। हालांकि बाद में द्रुपद की बेटी द्रोपदी के स्वयंवर को भी अर्जुन ने ही जीता। अप्सरा मेनका का प्रणय निवेदन ठुकराकर एक साल तक नपुंसक बनकर अर्जुन रहा। उस वक्त अर्जुन की तुलना किसी से नहीं की, फिर आखिर कामयाबी के वक्त हमेशा अर्जुन के नाम के साथ कर्ण और एकलव्य का नाम क्यों जोड़ा गया?                       
 
कुरुक्षेत्र में जब कौरव और पांडव आमने-सामने थे, सब जानते थे कि उनका शत्रु कौन है, जीत के लिए हर दांव-पेंच छल-कपट, सब चले गए, उस दौरान अर्जुन ही था, जिसने श्रीकृष्ण से पूछा था कि मैं अपने परिवार के खिलाफ युद्ध क्यों करूं? पार्थ के सवाल पर श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया। निहत्थे कर्ण पर वार करते वक्त भी अर्जुन झिझका था, पीछे हटा था लेकिन कृष्ण के कहने पर उसने कर्ण पर वार किया। 
 
काबलियत रखते हुए हर बार खुद को साबित करने की अग्निपरीक्षा से गुजरा है अर्जुन, महान योद्धा होने के बावजदू एकलव्य और कर्ण के साथ हुए अत्याचार का बिना कुसूर कारण बना है अर्जुन। जिस कुरुक्षेत्र के युद्ध का महानायक बना अर्जुन, वो जीतकर भी हार गया, क्यूंकि उसके हिस्से ताज तो आया नहीं, जीत भी संदेह के पैबंद लिए हुए थी। संदेह, अगर एकलव्य का अंगूठा होता तो ऐसा नहीं होता, संदेह कि अगर कर्ण के साथ किस्मत खेल नहीं खेलती तो अर्जुन महान योद्धा नहीं होता। 

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