गांधी को किसने सुझाया था 'सत्याग्रह'

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018 (14:29 IST)
नई दिल्ली। देश की आजादी के साथ साथ सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ गांधी जी ने जिस रास्ते को अपनाया और दुनिया के लोगों के लिए जो विरोध का एक अहिंसक हथियार बन गया उसे ‘सत्याग्रह’ का नाम देने से पहले उन्होंने लोगों की राय ली थी।
 
बात उस समय की है जब महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों तथा अन्य अश्वेत लोगों के प्रति सरकारी भेदभाव के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। शुरु में इस आंदोलन को कोई नाम नहीं दिया गया। महात्मा गांधी ने स्वयं कहा था कि हममें से कोई नहीं जानता कि इसे क्या नाम दिया जाए। आरंभ में इसे पैसिव रेसिस्टेंस (निष्क्रिय विरोध) कहा जा रहा था लेकिन गांधी जी को यह नाम स्वीकार नहीं था।
 
उन्होंने ‘इंडियन ओपिनियन’ अखबार के पाठकों से इस संघर्ष के लिए बेहतर नाम सुझाने का आग्रह किया। एक पाठक ने 'सदाग्रह’ शब्द सुझाया जो उन्हें पसंद आया लेकिन यह पूरी तरह से उन विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था, जो वे व्यक्त करना चाहते थे। इसलिए गांधी ने इसे सुधार कर 'सत्याग्रह’ कर दिया और उनका संघर्ष 'सत्याग्रह’ के नाम से जाना जाने लगा।
 
सत्याग्रह अर्थात् वह शक्ति, जो सत्य, अहिंसा और प्रेम से उत्पन्न होती है। इसके बाद तो सत्याग्रह का जो सिलसिला शुरू हुआ वह गांधी जी की ताउम्र जारी रहा तथा इसे देश विदेश के अनेक नेताओं ने अपनाया। डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि 'सत्याग्रह' मानव जाति को गांधी का सबसे महत्वपूर्ण उपहार है।
 
देश में गांधी के सत्याग्रह की शुरुआत चंपारण से हुयी जिसके एक सौ साल पूरे हो गए हैं। इस सत्याग्रह की कामयाबी के बाद गांधी पूरे देश में जाने गए और देशवासियों को अहसास हो गया कि उन्हें एक ऐसा अहिंसक योद्धा मिल गया है, जिनके नेतृत्व में आजादी हासिल की जा सकती है।
 
गांधी जी ने चंपारण में साढ़े नौ महीने रहकर नील की खेती करने वाले किसानों को भयावह कठिनाइयों से मुक्त कराया और वहां के ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई, चिकित्सा और शिक्षा के कार्य भी शुरू किए, जिनमें उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी और अनेक सहयोगी भी शरीक हुए। पिछले दिनों केंन्द्र सरकार ने पूरे देश में साफ—सफाई की संस्कृति विकसित करने के मकसद से चंपारण से स्वच्छाग्रह शुरू किया है, जो गांधी जी की डेढ़ सौवीं जयंती दो अक्टूबर 2019 तक चलेगा।
 
चंपारण के बाद गुजरात के खेड़ा जिले में 1918 में गांधी के सत्याग्रह की शुरुआत हुई। वर्ष 1920 का असहयोग आंदोलन पहला राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह था, जिसमें विदेशी शासन का विरोध और एक वर्ष के भीतर स्वराज का लक्ष्य तय किया गया था। वर्ष 1930 में राष्ट्रव्यापी नमक सत्याग्रह हुआ और इसके लिए दांडी सहित कई यात्राएं की गई। इसने अंग्रेज हुकूमत को हिला कर रख दिया। गांधी जी का 1940 का व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।
 
गांधीजी का सत्याग्रह केवल उन तक सीमित नहीं रहा। उनके समकालीन खान अब्दुल गफ्फार, बाबा साहेब आंबेडकर, राममनोहर लोहिया, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण सहित कई नेताओं ने इसका अनुशरण किया। तिब्बत के दलाईलामा और म्यांमार की आंग सान सू की ने गांधी के सत्याग्रह को अपना कर पूरी दुनिया को प्रभावित किया।
 
दक्षिण अफ्रीका के स्वतंत्रता संग्राम में नेल्सन मंडेला और विशप टू टू ने भी सत्याग्रह के दर्शन को अपनाया। सत्याग्रह के आदर्श से संयुक्त राज्य अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी काफी प्रभावित हुए। उन्होंने इसका प्रयोग लोक अधिकार आंदोलन में किया। 
 
पोलैंड में साम्यवादी शासन के विरुद्ध अहिंसक आंदोलन लेच वलेसा के नेतृत्व में किया गया। शांति के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित वलेसा ने साबित किया कि जटिल से जटिल समस्या का समाधान संवाद के जरिए हो सकता है, युद्ध से नहीं। 
 
देश में आज भी कई नेता और संगठन सत्याग्रह और उपवास का रास्ता अपनाते हैं लेकिन कामयाबी उन्हें ही मिली जो अहिंसा के रास्ते पर चले। गांधी जब दांडी मार्च के लिए निकले थे तो उन्होंने अपने साथ चलने वाले 78 साथियों को पहले प्रशिक्षित किया था।
 
सामाजिक सुधारों और राजनीतिक कार्यों के अपने प्रयोगों में गांधी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अहिंसा एक अमोघ शक्ति है और अगर इसे ढंग से अपनाया जाए तो यह सारी सामाजिक बुराइयों को समाप्त कर एक नए समाज की रचना कर सकती है। सत्याग्रह की व्यापकता के बारे में गांधी कहते हैं कि उन्होंने सत्याग्रह के सिद्धांतों का अपने घरेलू, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के हर कदम पर प्रयोग किया। (वार्ता)

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