टैक्सी ड्राइवर से भारत-पाक राजनीति पर चर्चा

शुक्रवार, 12 सितम्बर 2014 (13:11 IST)
शिकागो से डॉ. मुनीश रायजादा   
 
 
भारतीय राजनीति के गिरते स्तर को लेकर देसी लोगों में रंज   
 
डॉ. मुनीश रायजादा
मैं भारत तथा अमेरिका के बीच अक्सर यात्रा करता रहता हूं। पिछले महीने मुझे एक बार फिर दिल्ली से शिकागो की यात्रा करनी पड़ी। जिस दिन मैं लौट रहा था, उस दिन मेरी एनेस्थेसिया (निश्चेतना) विशेषज्ञ पत्नी को अस्पताल जल्दी जाना था, तो अपने नौ साल के बेटे को स्कूल छोड़ने के बाद मैंने शिकागो के ओहएर एयरपोर्ट जाने के लिए येलो केब (टैक्सी)  मंगवाई। (यह एयरपोर्ट यात्री संख्या के हिसाब से अटलांटा व लास एन्जेलिस के बाद तीसरा अमेरिका का सबसे व्यस्ततम एयरपोर्ट है)। फोन करने के मात्र 4 मिनट बाद ही टैक्सी मेरे घर के सामने थी। ड्राइवर का रंग रूप और दाढ़ी से लग रहा था कि वह कोई देसी मुसलमान है (और मेरे अनुमान के मुताबिक ही वह पाकिस्तानी निकला)। हमने एक दूसरे का हिन्दुस्तानी भाषा में अभिवादन किया।
 
जब हम कार में बैठे थे तब हमारे बीच भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति को लेकर चर्चा होने लगी। पाकिस्तान में उस समय इमरान खान व उनके सहयोगियों द्वारा प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के खिलाफ़ राष्ट्रव्यापी धरने प्रदर्शनों का दौर चल रहा था। हुसैन (ड्राइवर) इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इन्साफ़ (पीटीआई) का समर्थक था। जब मैंने उसे बताया कि भारत में भी 'आम आदमी पार्टी' नामक इसी प्रकार की एक पार्टी राजनीति की गन्दगी को समाप्त करने के लिए संघर्षरत है, तो उसने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा कि हां इस पार्टी ने एक सूबे में चुनावों में शानदार प्रदर्शन भी किया है। हुसैन दिल्ली की बात कर रहा था, जहां दिसम्बर 2013 में हुए चुनावों  में पार्टी ने एतिहासिक प्रदर्शन करते हुए विधानसभा की 70 सीटों मे से 28 जीत ली थी, पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। 

उसने बताया कि शुरू-शुरू में  वह इमरान खान की राजनीति से बहुत अधिक प्रभावित नहीं था, पर बाद में उसके एक भारतीय मित्र ने समझाया कि किस प्रकार इमरान खान एक अनोखी लड़ाई लड़ रहे हैं, और उसने फिर इमरान खान के राजनैतिक उद्देश्यों का समर्थन करना प्रारंभ किया। उसने दुखी मन से बताया कि किस प्रकार पकिस्तान की राजनीति में भ्रष्ट और बेइमान नेता आ गए हैं जो इमरान खान जैसे क्रान्तिकारियों की राह में बाधक बन रहे हैं। उसके इस दुख मे शरीक होते हुए मैंने कहा कि भारत की राजनीति भी लगभग इसी प्रकार की अवस्था से गुजर रही है, और यही कारण है कि आज लोग आप और पीटीआई द्वारा दी जा रही वैकल्पिक राजनीति की जरूरत शिद्धत से महसूस कर रहे हैं। जब हुसैन ने कहा कि इमरान खान नेताओं की भीड़ में भले ही अकेला हो सकता है, परन्तु जनता उसके साथ है, तो उसने मुझे अरविन्द केजरीवाल का स्मरण करा दिया।
 
यदपि भारतीय व पाकिस्तानी राजनीति में बहुत फर्क है, तथापि विदेशों में बसे देसियों के मन में यह तड़प तो रहती ही है की उनके मूल देश में राजनीति व राजनेताओं का स्तर उठे। 

लेखक शिकागो में चिकित्सक (नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ) हैं, व सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। 

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