श्राद्ध पक्ष की 10 अनसुनी बातें

हिन्दुओं के प्रमुख 10 नियमों में से एक है श्राद्ध करना। ये 10 नियम हैं- ईश्वर प्राणिधान, संध्या वंदन, श्रावण माह व्रत, तीर्थ चार धाम, दान, मकर संक्रांति-कुंभ पर्व, पंच यज्ञ, सेवा कार्य, 16 संस्कार और धर्म प्रचार। श्राद्ध का पर्व भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण की अमावस्या तक कुल 16 दिन तक रहता है।


1. श्राद्ध का उल्लेख : श्राद्ध की महिमा एवं विधि का वर्णन ब्रह्म, गरूड़, विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य, मार्केण्डेय आदि पुराणों एवं कठोपनिषद, महाभारत, मनुस्मृति आदि शास्त्रों में यथास्थान किया गया है। वेदों के पंच यज्ञ में से एक पितृयज्ञ ही श्राद्ध है।
 
2. गीता पाठ : श्राद्ध के दिन भगवद् गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए एवं उसका फल मृतक आत्मा को अर्पण करना चाहिए। इसके अलावा नित्य मार्कण्डेय पुराणांतर्गत 'पितृ स्तुति' करने से पितृ प्रसन्न एवं तृप्त होकर अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
 
3. पितृदेव अर्यमा : श्राद्ध के दौरान पितृलोक के चार देवता काव्यवाडनल, सोम, अर्यमा और यम का आह्वान किया जाता है। इनमें से अर्यमा पितरों के अधिपति हैं। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि पितरों में प्रथान में अर्यमा हूं।
 
4. दिव्य पितर : अग्रिष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप, सोमेप, रश्मिप, उपदूत, आयन्तुन, श्राद्धभुक व नांदीमुख ये 9 दिव्य पितर बताए गए हैं। दिव्य पितृ ब्रह्मा के पुत्र मनु से उत्पन्न हुए ऋषि हैं।
 
5. श्राद्ध का समय : श्राद्ध करने का समय तुरूप काल बताया गया है अर्थात दोपहर 12 से 3 के मध्य। प्रात: एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। सुनिश्चित कुतप काल में धूप देकर पितरों को तृप्त करें।
 
6. श्राद्ध का भोजन : श्राद्ध का भोजन 4 लोगों को खिलाया जाता है। ब्राह्मण, कुत्ते, गाय और कौए। श्राद्ध के भोजन में बेसन का प्रयोग वर्जित है। सूतक में ब्राह्मण को भोजन नहीं कराना चाहिए। केवल गाय को रोटी दें।
 
7. श्राद्ध और तर्पण : पितरों के लिए किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध तथा तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। श्राद्ध के 12 प्रकार हैं- नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिंडन, गोष्ठ, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा और पुष्टि। उसी तरह तर्पण के 6 प्रकार हैं- 1. देव-तर्पण 2. ऋषि-तर्पण 3. दिव्य-मानव-तर्पण 4. दिव्य-पितृ-तर्पण 5. यम-तर्पण 6. मनुष्य-पितृ-तर्पण।
 
8. श्राद्ध में वर्जित : श्राद्ध पक्ष में व्यसन और मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है। पूर्णत: पवित्र रहकर ही श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। श्राद्ध कर्म में लोहे या स्टील के पात्रों का प्रयोग वर्जित है।
 
9. आमान्न दान : श्राद्ध में जो लोग भोजन कराने में अक्षम हों, वे आमान्न दान देते हैं। आमान्न दान अर्थात अन्न, घी, गुड़, नमक आदि भोजन में प्रयुक्त होने वाली वस्तुएं इच्छा‍नुसार मात्रा में दी जाती हैं।
 
10. पितृदोष की शांति : उचित रीति से श्राद्ध करने से पितृदोष शांत हो जाता है। पितृदोष के शांत होने से स्वास्थ बाधा, पारिवारिक बाधा और अर्थ बाधा दूर हो जाती है। अत: श्राद्ध कर्म करना चाहिए।

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