कैसे बने भगवान गणेश प्रथम पूज्य

ब्रह्मा जी जब 'देवताओं में कौन प्रथम पूज्य हो' इसका निर्णय करने लगे, तब यह तय किया गया कि जो पृथ्वी-प्रदक्षिणा सबसे पहले करके आएगा वही सबसे पहले पूज्य माना जाएगा। गणेश जी का मूषक कैसे सबसे आगे दौड़े। पुराणान्तर के अनुसार उन्होंने भगवान शंकर और पार्वती जी की प्रदक्षिणा की।
 
'चरण मात-पितु के धर लिन्हे,
तिनके सात प्रदक्षिणा किन्हे'
धनि गणेश कही शिव हिय हर्ष्यो,
नभ ते सुरण-सुमन बहु बरस्यो...
 
यानी माता-पिता को उन्होंने समूचा लोक माना और उनकी सात प्रदक्षिणा कर ली। शिवजी का ह्रदय यह देखकर गदगद हो गया और आकाश से पुष्पों की बरखा होने लगी। जाहिर है भगवान गणेश शेष देवताओं से सबसे पहले पहुंचे। उनका यह बुद्धि-कौतुक देखकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें प्रथम पूज्य बनाया। अत: प्रत्येक कर्म में उनकी प्रथम पूजा होती है।
 
वे भगवान शंकर के गणों के मुख्य अधिपति हैं। उन गणाधिप की प्रथम पूजा न हो तो कर्म के निर्विघ्न पूर्ण होने की आशा कम ही रहती है।
 
पंच देवोपासना में भगवान गणपति मुख्य हैं। प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ 'श्रीगणेश' अर्थात उनके स्मरण-वन्दन से ही होता है।
 
भगवान गणेश बुद्धि के अधिष्ठाता हैं। वे साक्षात ओंकार रूप हैं। उनका ध्यान, उनके पवित्र नाम का जप और उनकी आराधना वाक् और स्मरण शक्ति को तीव्र करती है। यदि वे आदि ग्रंथ महाभारत के लेखक न बनते तो भगवान व्यास के इस पंचम वेद से हम सभी वंचित रह जाते।
 
संगीत से भी जुड़ें हैं श्री गणेश :-
भगवान गणेश संगीत के स्वर 'धैवत' से भी मुख्य रूप से जुड़े हुए हैं।
 
कभी नहीं नाराज होते दो देवता :-
गणेश और हनुमान दो देवता ही कलयुग के ऐसे देवता हैं, जो अपने भक्तों से कभी रुठते नहीं, अत: इनकी आराधना करने वालों से गलतियां भी होती हैं, तो वह क्षम्य होती हैं। साधना चाहे सात्विक हो या तामसिक, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण या फिर मोक्ष की साधना हो प्रथम पूजा गणेश जी की ही होती है।

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