अगर बैंक डूबती है तो आपको कितनी राशि मिलेगी ?

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018 (18:58 IST)
नई दिल्ली। कुछेक सप्ताह पहले इस तरह की अफवाह फैली थी कि सरकार बैंकों में जमा रकम के बारे में ऐसा कानून बनाने जा रही है, जिसके तहत बैंकों में जमा आम आदमी के पैसों की गारंटी सरकार की नहीं होगी। 
 
हालांकि वित्त मंत्री, सरकार और उससे जुड़ी विभिन्‍न एजेंसियों द्वारा बार-बार सफाई दिए जाने के बाद लोगों का डर कम हुआ लेकिन पीएनबी की धोखाधड़ी ने इस डर को फिर सतह पर ला दिया है। लोगों को फिर डर सताने लगा है कि इस तरह के स्‍कैम से अगर बैंक डूब जाएं तो खून-पसीने के कमाए उनके पैसे का क्‍या होगा?
 
मात्र एक लाख ही सुरक्षित 
 
लोगों के सवाल और आशंकाएं एक प्रस्‍तावित फाइनेंशियल रेजॉल्‍यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस (FRDI)बिल, 2017 को लेकर हैं। जानकारों का कहना है कि बैंक में जमा राशि में से मात्र 1 लाख रुपए तक की रकम इंश्योर्ड होती है। इसके अलावा भी अगर आपके लाखों, करोड़ों जमा हैं तो वे किसी भी कानून के तहत गारंटीशुदा नहीं हैं। कहने का आशय है कि बैंक की देनदारी मात्र एक लाख तक ही सीमित होगी।
 
हालांकि बैंकों में जमा लोगों के पैसे को पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है क्योंकि कोई भी सरकार और रिजर्व बैंक किसी भी बैंक को डूबने नहीं देती है लेकिन अगर ऐसा होता है तो आपको केवल एक लाख रुपए ही मिलेंगे। वैसे छोटे बैंकों में जमा रकम की सुरक्षा करने की गारंटी भी सरकार की होती है। वैसे सरकार किसी बैंक को फेल नहीं होने दे सकती क्योंकि इसकी बड़ी राजनीतिक कीमत उसे चुकानी पड़ सकती है लेकिन फिर भी जरूरी है कि आप इस बिल (विधेयक) के बारे में जान लें। 
 
सरकार का कहना है कि फाइनेंशियल रेजॉल्‍यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल (एफडीआरआई) बिल 2017 का उद्देश्य एक रेजॉल्‍यूशन कॉर्पोरेशन का गठन करना है। यह वित्तीय कंपनियों की निगरानी करेगा और इन वित्तीय कंपनियों में बैंक भी शामिल होंगे। यह कॉरपोरेशन (निगम) इन कंपनियों का रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से वर्गीकरण करेगा।
 
कहा जा रहा है कि कंपनियों को यह अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों से अलग कर दिवालिया होने से रोकेगा। हाल ही में कई कंपनियों ने खुद को दिवालिया घोषित करने के लिए आवेदन दिया है। इस तरह इससे लोगों को एक तरह की सुरक्षा ही मिलेगी क्‍योंकि यह कॉरपोरेशन कंपनियों या बैंकों को दिवालिया होने से बचाएगा।
 
इस बिल के बेल-इन (जमानत देने संबंधी) प्रावधान को लेकर सबसे ज्यादा चिंता है। यह प्रावधान डूबने वाली वित्तीय कंपनी को वित्तीय संकट से बचाने के लिए उसे कर्ज देने वाली संस्था और जमाकर्ताओं की रकम के इस्तेमाल की इजाजत देता है। हालांकि, बेल-इन वित्तीय संस्था को नाकाम होने से बचाने के कई विकल्पों में से एक है। लेकिन 2008 में अमेरिकी बैंकों और साइप्रस की वित्तीय हालत को सुधारने के लिए इनका उपयोग किया गया।
 
नुकसान की भरपाई कर्जदारों, जमाकर्ताओं से पैसे से
 
बेल-इन का साधारण शब्दों में मतलब है कि बैंक या कंपनी अपने नुकसान की भरपाई कर्जदारों और जमाकर्ताओं के पैसे से कर सकती है। पर जब उन्हें लगेगा कि वे संकट में हैं और उन्हें इसकी भरपाई करने की जरूरत है तो वह आम आदमी के जमा पैसों का इस्तेमाल करते हुए अपने घाटे को पाटने की कवायद कर सकता है।जानकारों का कहना है कि इससे घबराने की जरूरत नहीं है और इसकी वजह यह है कि पिछले 50 साल में देश में शायद ही कोई बैंक दिवालिया हुआ है। हालांकि अलग-अलग बैंकों में अपना पैसा रखकर आप अपना जोखिम घटा सकते हैं। जबकि वित्त मंत्रालय का कहना है कि एफआरडीआई विधेयक में जमाकर्ताओं को अधिक पारदर्शी तरीके से अतिरिक्त संरक्षण दिए गए हैं। 
 
बैंकों में फिलहाल जमा एक लाख रुपए तक की राशि का बीमा होता है। इसी तरह का संरक्षण एफआरडीआई विधेयक में भी जारी रहेगा। वर्तमान में डिपॉजिटर्स इंश्योरेंस स्कीम के तहत 1 लाख रुपए तक आपका पैसा बैंक में सुरक्षित है। उसके तहत सभी बैंक, कमर्शियल, रीजनल, रूरल को-ऑपरेटिव बैंक भी आते हैं।

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