मौलिक अधिकार और कानून का इंसाफ

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जनहित याचिकाओं के द्वारा आमजन के हित यानी भले के कई काम संभव हो सके। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि स्वार्थी तत्व ऐसे कारआमद हथियार का दुरुपयोग न कर पाएँ। क्योंकि भारतीय अदालतों ने हमेशा कानून के शासन पर जोर दिया है

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का विशेष स्थान है। संविधान के भाग 3 में कुछ आधारभूत मानवाधिकारों की गारंटी दी गई है, जोकि मोटे तौर पर 1960 के नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र से मिलते-जुलते हैं। ये अधिकार विधि द्वारा संरक्षित एवं प्रवर्तनीय हैं।

संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों की व्याख्या की गई है। ये सिद्धांत सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के जैसे हैं। संविधान के अनुच्छेद 37 में स्पष्ट कहा गया है कि ये निदेशक सिद्धांत किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं मगर ये देश की शासन प्रणाली का आधार होंगे।

मूलभूत अधिकार अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अथवा अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाकर मुख्यतः राज्य तथा उसके विविध आनुषंगिक संस्थानों के विरुद्ध प्रवर्तित किए जाते हैं। सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार भी मूलभूत अधिकार के रूप में प्रतिष्ठित है।

मूलभूत अधिकारों के पीछे दर्शन यह है कि मानवाधिकार नस्ल, धर्म, जाति, रंग, लिंग एवं सामाजिक दर्जे के दायरों से परे साझी मानवीयता तथा प्रत्येक मनुष्य में अंतर्निहित गरिमा से प्रवाहित होते हैं। मानवाधिकार कोई राज्य द्वारा प्रदत्त उपहार नहीं हैं। अधिकारों का कोई विधेयक मानवाधिकारों का निर्माण नहीं करता, वह तो महज इन अधिकारों की पुष्टि करता है और इनकी रक्षा की गारंटी देता है।

हाँ, मौलिक अधिकार निर्द्वन्द्व नहीं हैं। संविधान में स्पष्ट किए गए शीर्षों के तहत जनहित में इन पर एक हद तक रोक भी लगाई जा सकती है। यह रोक यथोचित होना चाहिए।

संविधान के तहत न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा का अधिकार प्राप्त है। अनुच्छेद 13 में स्पष्ट किया गया है कि कोई भी कानून, जो किसी मौलिक अधिकार का हनन करता है, वह निष्प्रभावी है। कोई भी कानून अथवा कार्यपालक कार्य किसी मूलभूत अधिकार का हनन करता है या नहीं, इसका निर्णय भी अदालतें ही करेंगी। किसी मूलभूत अधिकार पर लगाई गई रोक तर्कसंगत है या नहीं, इस मामले में अदालतों का दृष्टिकोण कैसे निर्धारित हो, यह मद्रास राज्य बनाम वीजी राव मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तर्कसंगतता की कोई अमूर्त या सामान्य शैली निर्धारित नहीं की जा सकती, जिसे सभी मामलों में मान्य किया जा सके। भारतीय अदालतों ने हमेशा कानून के शासन के पालन पर जोर दिया है। कार्यपालिका का कोई भी निर्णय, जो कानून द्वारा अनुमोदित नहीं है और किसी व्यक्ति के खिलाफ जाता है, उसे अदालतों ने रद्द कर दिया है। राज्य कानून से ऊपर नहीं है। कानून के शासन को संविधान की एक अनिवार्य विशेषता के रूप में माना गया है।

संविधान के अनुच्छेद 21 में 'जीवन' की व्यापक व्याख्या की गई है। अदालत ने कहा है कि अनुच्छेद 21 में 'जीवन' से तात्पर्य मात्र भौतिक अस्तित्व नहीं है बल्कि इससे कहीं अधिक है। 'हम सोचते हैं कि जीवन के अधिकार में मानवीय गरिमा और उसके लिए जरूरी चीजों के साथ जीने का अधिकार शामिल है, जैसे उचित पोषण, कपड़े और आश्रय।' पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति के मामले में अदालत ने मानवाधिकारों के मामले में अपने उदारवादी रवैये को और आगे बढ़ाते हुए सामाजिक एवं आर्थिक पहलुओं को भी इसमें शामिल किया। उसने ठहराया कि लोगों को चिकित्सा सेवाएँ मुहैया कराना राज्य का एक अनिवार्य दायित्व है और इसे आर्थिक दिक्कतों का हवाला देकर टाला नहीं जा सकता। इस व्याख्या के माध्यम से अदालत ने वास्तव में कुछ निदेशक सिद्धांतों को कुछ मौलिक अधिकारों में समाहित कर दिया है और उन्हें प्रवर्तनीय बना दिया है।

वीरेन्द्र गौर मामले में अदालत ने ठहराया कि मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार में पर्यावरण की सुरक्षा तथा संरक्षण, जल एवं वायु प्रदूषण से मुक्त पारिस्थितिकी शामिल है और स्वास्थ्यकर पर्यावरण स्वस्थ जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है। इस व्याख्या के माध्यम से सुप्रीमकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान किया है।

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि अदालत ने कुछ ऐसे मौलिक अधिकारों को भी रेखांकित किया है जिनका मौलिक अधिकारों के अध्याय में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उदाहरण के लिए, संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता की गारंटी स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में नहीं दी गईहै। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक फैसलों में ठहराया है कि प्रेस की स्वतंत्रता भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अंतर्निहित है। इस प्रकार प्रेस की स्वतंत्रता को भी न्यायिक व्याख्या के कारण मौलिक अधिकार का दर्जा मिल गया है

इसी प्रकार अदालत ने निजता के अधिकार, विदेश यात्रा करने के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, अमानवीय सजा अथवा व्यवहार से मुक्ति को भी मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है। ऐसी सृजनात्मक व्याख्याओं के चलते अदालत ने मौलिक अधिकारों के क्षेत्र का खासा विस्तार कर दिया है। मौलिक अधिकारों की विवेचना के अलावा अदालतों ने न्यायिक विधान में भी दखल रखा है। इसके दो प्रमुख उदाहरण हैं। पहला है विशाखा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला।

मामला था कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना की दीर्घ स्थायी एवं व्यापक समस्या का। इससे निपटने के लिए कोई कानून नहीं था। इसे देखते हुए कोर्ट ने मानवाधिकारों संबंधी विविध अंतरराष्ट्रीय विधानों का संदर्भ लेते हुए कई निर्देश जारी किए। इनमें यौन प्रताड़ना की परिभाषा, संभावित प्रतिरोधक उपाय, यौन प्रताड़ना के खिलाफ की जा सकने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई और उसकी प्रक्रिया आदि शामिल हैं। कोर्ट ने शिकायतें प्राप्त करने के लिए तंत्र तथा शिकायत समिति का भी गठन किया। बेशक इसके पीछे कोर्ट का इरादा प्रशंसनीय तथा यौनप्रताड़ना की शिकार महिलाओं के लिए लाभप्रद था लेकिन यह अस्थायी एवं तदर्थ न्यायिक विधान का उत्कृष्ट उदाहरण है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि उसके द्वारा दिए गए निर्देश तब तक बंधनकारक एवं कानूनन प्रवर्तनीय होंगे जब तक इस विषय में कोई कानून नहीं बना लिया जाता।

अफसोस की बात यह है कि अब तक कोई कानून बना नहीं है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश ही कानून का काम कर रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून भारत की सभी अदालतों एवं प्राधिकारियों पर बंधनकारक होगा। सार्वजनिक विधान के क्षेत्र में अधिकारिता के नियमों के उदारीकरण से जनहित याचिकाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इन याचिकाओं में अदालतों की भूमिका की तीखी आलोचना भी हुई है। आरोप यह है कि न्यायपालिका सरकार चला रही है और उसने देश के प्रशासन को अपने हाथों में ले लिया है।
आलोचक इस बात को भूल जाते हैं कि जनहित याचिकाओं के अधिकांश मामलों में अदालतें सरकार को विधायिका द्वारा बनाए गए कानून लागू करने के ही आदेश दे रही हैं।

यह सच है कि जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए अदालतों ने कुछ ऐसे भी आदेश व निर्देश जारी किए हैं, जो न्यायिक कार्यक्षेत्र से बाहर थे और दिमाग से ज्यादा दिल को भाने वाले थे। इसमें शक है कि क्या न्यायपालिका प्रशासन को यह निर्देश दे सकती है कि वह सड़क व इमारतें बनाए, अमुक क्षेत्र में अमुक लोगों के आवास के लिए भूमि अधिगृहीत करे, कोर्ट द्वारा तय पारिश्रमिक पर प्रबंधकों की नियुक्ति करे या फिर अदालत बड़ी-बड़ी राशियाँ अदा करने के तदर्थ निर्देश दे। ऐसे आदेशों के गंभीर वित्तीय एवं बजट संबंधी परिणाम होते हैं और ये विधायिका तथा कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार में आते हैं।
इसमें शक नहीं कि जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग हुआ है और कुछ मामलों में तो ये 'प्रचार हित याचिका', 'व्यक्तिगत हित याचिका', 'राजनीतिक हित याचिका' और यहाँ तक कि 'धन हित याचिका' बदल गई हैं। इस मामले में न्यायमूर्ति श्री पसायत ने सावधान करते हुए कहा है-'जब यह मानने के लिए पर्याप्त आधार हो कि जनहित याचिका की आड़ में व्यक्तिगत दुश्मनी निकाली जा रही है, तो ऐसी याचिका को खारिज कर दिया जाना चाहिए...यदि इसका ठीक तरह विनियमन न किया गया और इसके दुरुपयोग को रोका न गया तो यह गलत लोगों के हाथों में बदला लेने का हथियार बन सकता है। याचिका का वास्तव में जनहित से संबंध होना चाहिए...।'

इस बात को अक्सर भुला दिया जाता है कि जनहित याचिकाएँ हर मर्ज की रामबाण दवा नहीं हैं। जनहित से जुड़ा प्रत्येक मसला जनहित याचिका का आधार नहीं हो सकता, जैसे प्याज के दामों में वृद्धि, हवाई यात्रा के भाड़े में परिवर्तन, रेलवे स्टेशनों की खस्ता हालत या फिर ट्रेनों का समय पर न चलना। अदालतों ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग की कड़ी निंदा की है तथा कई बार ऐसी याचिकाएँ दायर करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई भी की है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनहित याचिकाओं के चलते लंबे समय से जेल में पड़े विचाराधीन कैदियों को मुक्ति मिली है, गुलामी का जीवन गुजार रहे लोगों को आजाद कर उनका पुनर्वास किया जा सका है, संरक्षण गृहों एवं मनोचिकित्सालयों में रहने वाले लोगों के साथ मानवोचित व्यवहार किया जाने लगा है, पत्थर की खदानों व ईंट भट्टों पर काम करने वाले लोगों तथा खतरनाक पेशों में लगे छोटे बच्चों की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है। पर्यावरण से जुड़े मामलों में न्यायिक सक्रियता के चलते खतरनाक टेक्नोलॉजी के उपयोगमें जवाबदेहिता सुनिश्चित की जा सकी है और इसके अच्छे परिणाम भी मिले हैं। कम से कम कुछ निर्धन, वंचित, शोषित लोगों के लिए मौलिक अधिकार वास्तविकता बन गए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालतों ने मानवीय पीड़ा को गंभीरता से लेना शुरू किया है और इसके प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया है। यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। दृढ़ न्यायाधीश तथा जिम्मेदार वकील यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जनहित याचिकाएँ बेलगाम घोड़ान बन जाएँ बल्कि लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा व संवर्द्धन के लिए इस्तेमाल की जाएँ।

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