उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो, खर्च करने से पहले कमाया करो
ग़ज़ल का सदियों पुराना लिबास यूँ बदला,
कि फ़िक्र-ओ-फ़न की मोहज़्ज़िब रिवायतें भी गईं
क़तरा क़तरा आँसुओं में रफ़्ता रफ़्ता बून्द बून्द, बेह गया आँखों से आखिर एक दरिया बून्द बून्द
बेसबब रूठ के जाने के लिए आए थे,
आप तो हमको मनाने के लिए आए थे
शे'र का लफ़्ज़ अगर शऊर से मश्क़ है तो राहत इन्दौरी की ग़ज़ल हक़ीक़ी मानों में शायरी कहलाने की मुस्तहक़ है। क...
क्यों हमें मौत के पैग़ाम दिए जाते हैं, ये सज़ा कम तो नहीं है कि जिए जाते हैं...
सब की आँखों में नीर छोड़ गए
जाने वाले शरीर छोड़ गए
जो रिश्ता पाँच अनासिर का था निभाते रहे
उन्हीं के बल पे चली जब तलक चलाते रहे