मालवा निमाड़ में होगी राजनीतिक दावों की परीक्षा, भाजपा और कांग्रेस ने झोंकी पूरी ताकत

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018 (15:49 IST)
इंदौर। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में मालवा निमाड़ अंचल की जहां 66 सीटों पर जनता की राय भोपाल की राजगद्दी के दावेदारों का फैसला करने में सबसे अहम होगी। इस अंचल में किसानों और खेती को लेकर सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के दावों-प्रतिदावों की असल परीक्षा होनी है।


राज्य के पश्चिमी एवं दक्षिण-पश्चिमी भाग के 15 जिलों में कृषि भूमि अत्यंत ऊर्वर है और यहां के किसान देश के सर्वाधिक जागरूक एवं समृद्ध किसानों में गिने जाते हैं लेकिन इस क्षेत्र में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ज़मीन भी काफी उपजाऊ होने के कारण चुनावी बयार की दिशा अंतिम क्षणों में ही साफ हो पाएगी।

निमाड़ अंचल में खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर और बड़वानी जिले आते हैं जिनमें 16 विधानसभा सीटें हैं। इन 16 सीटों में से 11 पर भाजपा ने जीत हासिल की थी जबकि कांग्रेस महज 5 सीट ही जीत पाई थी। मालवा के 11 जिलों में 50 सीटों में से 45 पर भाजपा जीती थी जबकि कांग्रेस केवल चार सीटें ही जीत पाई थी। केवल थांदला सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी जो बाद में भाजपा में शामिल हो गया था।

मालवा-निमाड़ अंचल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक के कैडर की अच्छी खासी पकड़ है। संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैय्याजी जोशी सहित संघ के कई बड़े अधिकारी भी मालवा अंचल से ताल्लुक रखते हैं। भाजपा के ज्यादातर दिग्गज नेता इसी क्षेत्र से आते हैं। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष दिवंगत कुशाभाऊ ठाकरे, पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र सखलेचा, कैलाश जोशी, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत, पूर्व मंत्री सत्यनारायण जटिया, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान, पूर्व मंत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी यहीं से हैं।

कांग्रेस की ओर से आदिवासी नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया, दिवंगत पूर्व उप मुख्यमंत्री जमुनादेवी, सज्जन सिंह वर्मा, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव महेन्द्र जोशी, पूर्व मंत्री बाला बच्चन, सुभाष सोजतिया आदि हैं। उज्जैन के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू के कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने से वहां के समीकरण पर असर पड़ा है। कांग्रेस के स्टार प्रचारक ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का भी मालवा निमाड़ क्षेत्र में काफी प्रभाव है।

कांग्रेस मालवा निमाड़ को साधने की पूरी कोशिश में है। पूरे मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन का यदि कहीं जोर रहा तो वह मालवा निमाड़ क्षेत्र में ही था। एक साल पहले मंदसौर में हुए गोलीचालन में किसानों की मौत के बाद उपजे आक्रोश को भुनाने में कांग्रेस उस समय सफल रही थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की जनसभाओं में इसका असर भी दिखा था। कांग्रेस को उम्मीद है कि इस बार भी किसानों की नाराज़गी का लाभ उसे मिलेगा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र में नोटबंदी का असर इस क्षेत्र में किसानों पर अब तक बना हुआ है। किसानों को साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए दिए गए किसान क्रेडिट कार्ड से अगर कोई किसान पैसा निकालता है तो जैसे ही वह अपने खाते में कोई पैसा जमा करता है तो बैंक स्वत: ही ऋण की वसूली कर लेता है जिससे किसान खाली हाथ रह जाता है। किसानों को जबरन कैशलेस बनाने की कोशिशों के बीच यहां इन दिनों यहां बड़ी संख्या में बैंकों के एटीएम बंद किए जाने की अफवाह है। इससे भी किसानों में नाराज़गी बढ़ गई है।

इतना ही नहीं भाजपा को अपने ही लोगों की भी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। शिवराज सरकार पर उनकी ही पार्टी के लोग यह आरोप लगाते आए हैं कि मालवा-निमाड़ को इस शासनकाल में उपेक्षा का सामना करना पड़ा है। इस क्षेत्र के कई जिलों से इस बार एक भी मंत्री नहीं बनाया गया। किसानों की नाराज़गी और भाजपा के अंदर के लोगों का गुस्से से भाजपा के इस गढ़ की दीवारें दरकने लगी हैं।

कांग्रेस और भाजपा के अलावा मालवा निमाड़ में आदिवासियों के वोटों में सेंध लगाने वाला एक नया दल जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) की भी सक्रियता भी चर्चा में है। बताया जा रहा है निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में इस पार्टी ने अनेक सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

पिछले 15 साल से इसी अंचल में पकड़ के बल पर भाजपा मध्यप्रदेश में राज करती आ रही है। यहां कहा जाता है कि जो मालवा निमाड़ में जीत हासिल करता है उसे मध्यप्रदेश की राजगद्दी मिलती है। इस बार भाजपा ने करीब 14 सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे हैं और करीब 20 विधायकों के टिकट काटे हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) की गतिविधियों का प्रमुख गढ़ होने के कारण इस क्षेत्र में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ज़मीन भी काफी उपजाऊ है। बीते दिनों में अनेक ऐसी घटनाएं हुईं हैं। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का भी राजनीतिक असर चुनाव में दिखाई दे सकता है। दोनों पार्टियों ने अब अपनी पूरी ताकत इस क्षेत्र में झोंक दी है।

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